ढाई साल बाद सच के आईने में बकोरिया कांड यानी फर्जी मुठभेड़ों का दस्तावेज!

झारखंड , , बुधवार , 28-02-2018


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विशद कुमार

रांची। जिस तरह से पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में पिछले आठ जून 2015 को पुलिस के साथ कथित मुठभेड़ में मारे गये 12 लोगों को पुलिस माओवादी बताती रही अब वह आईने की तरह साफ हो गया है कि उनमें से एक डॉ. आरके उर्फ अनुराग को छोड़कर किसी का भी नक्सली होने का रिकॉर्ड पुलिस के पास उपलब्ध नहीं था।

हैरत की बात तो यह है कि मारे गये इन 12 लोगों में पांच नाबालिग थे जिनकी पहचान घटना के ढाई साल बाद अब हुई है, जबकि अभी तक केवल तीन नबालिगों का ही जिक्र होता रहा था, जिन्हें पुलिस अब तक नक्सली बताती रही थी।

वैसे तो यह कथित मुठभेड़ की कहानी शुरू से ही विवादों में घिरी रही है। भाकपा माओवादी ने भी पर्चा जारी कर इसे फर्जी मुठभेड़ करार दिया था।

 

वर्तमान समय में बकोरिया कांड को लेकर राज्य का राजनीतिक माहौल काफी गरम है। सरकार से विपक्ष भी इस घटना के दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने की पुरजोर मांग कर रहा है। विपक्ष और इस घटना से जुड़े तथ्यों के अनुसार इसे फर्जी नक्सल एनकांउटर माना जा रहा है। लोग इसके साजिशकर्ता पुलिस और डीजीपी को मान रहे हैं। बकोरिया कांड में मारे गये बच्चों के परिजनों के पास सीआईडी की टीम 30 महीने के बाद पहुंच सकी।

 

बताते चले कि घटना के दिन ग्रामीणों को अखबार के माध्यम से सूचना मिली थी। जिसमें गांव के बच्चों की तस्वीर भी मृतकों के रूप में छपी थी। घटना के बाद गांव में डर और भय का महौल बन गया था। भय के कारण गांव के पुरुष गांव से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा सके। परिजनों का भी रो-रो कर बुरा हाल था। ऐसे माहौल में परिजन भी अपने बच्चों की पहचान करने और उनका सच सामने लाने की हिम्मत नहीं जुटा सके थे। परिजन पुलिस के डर से मारे गये बच्चों की पहचान करने से बचते रहे। पहचान न करने के कारण अपने मृत बच्चों के अंतिम संस्कार भी  नहीं कर पाये। पुलिस ने बच्चों के शवों के साथ क्या किया उनके परिजन आज तक नहीं जान पाये।  

फर्जी नक्सली मुठभेड़ के नाम पर नाबालिगों की गई हत्या में महेंद्र सिंह खरवार, पिता कमलेश्वर सिंह खरवार, उम्र 15 वर्ष, गांव हरातु। चरकु तिर्की, भाई विजय तिर्की, उम्र 12 वर्ष, गांव अम्बाटिकर। बुद्धराम उरांव, भाई महिपाल उरांव, उम्र 17 वर्ष, गांव करूमखेता। उमेश सिंह खरवार, पिता पचासी सिंह खरवार, उम्र 16 वर्ष, गांव लादी। सत्येंद्र पहरहिया, पिता रामदास पहरहिया, उम्र 17 साल, गांव लादी के थे।

 

बकोरिया कांड के ढाई साल बाद 8 जनवरी 2018 को सीआईडी की एक जांच टीम गांव पहुंची और मारे गये बच्चों की तस्वीर दिखा कर परिजनों से पूछा गया - क्या यह आपका बच्चा है? घरवाले ने रोते-बिलखते हुए बताया — हां यह हमारा बच्चा है। परिजनों ने कहा कि हमारे बच्चे स्कूलों में पढ़ते थे। क्या पता कैसे वे डॉक्टर (डॉ. अनुराग जिसे पुलिस माओवादी मानती है उस दिन वह भी मारा गया था) के साथ चले गये और उसके अगले दिन खबर आयी कि बच्चे मारे गये। गांव में मातम का माहौल था। कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था। ऐसे में हम अपने बच्चे की पहचान करने से भी डरने लगे थे। 

 

हरातु पंचायत के मुखिया मुन्द्रिका सिंह बताते हैं कि हमारे पंचायत से इस कांड में मारे गये लोगों में तीनों नाबालिग थे। घटना के बाद अखबारों के माध्यम से हमलोगों को सूचना मिली थी। डर के कारण कोई भी अपने बच्चे का शव गांव नहीं ला सका। उनके शवों का क्या हुआ, आज भी किसी को जानकारी नहीं है। घटना के ढाई साल बाद भी जिला प्रशासन की ओर से कभी गांव में खोज खबर नहीं ली गयी।

मुखिया कहते हैं — परिजनों के साथ-साथ गांव के लोगों के मन में बच्चों के दाह संस्कार नहीं कर पाने का मलाल आज भी है। मारे गये तीनों बच्चे गरीब परिवार से थे। मेरी सरकार से गुजारिश है कि सरकार की ओर से मारे गये सभी बच्चों के परिजनों को आर्थिक सहायता दी जाये।

अखबारों में छपी तस्वीरें बच्चों की मां-पिता, भाई-बहनों ने देखी, पहचान भी लिया, पर डर से चुप रहे। उस मां-पिता, भाई-बहनों की इस आंतरिक पीड़ा की अनुभूति न तो झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास कर सकते हैं, न डीजीपी डीके पांडेय, न घटना का सच जानने के बाद चुप रहने वाले सरकार के बड़े अफसर और न ही  कोर्ट के न्यायाधीश। संवेदनहीनता का हद तो देखिए, घटना की सारी कहानी जानते हुए भी डीजीपी डीके पांडेय ने मासूमों के शव के सामने लाखों रुपये पुरस्कार के तौर पर सीआरपीएफ व पुलिस वालों के बीच बांटा। उसकी कल्पना मात्र से ही सिहरन पैदा होने लगती है।

फाइल फोटो: साभार

 

उमेश की मां पचिया देवी बताती है — उमेश गारू मध्य विद्यालय में पढ़ता था। गाय चराने जंगल गया था, लौट कर नहीं आया। दूसरे दिन कलेजे के टुकड़े के मारे जाने की खबर मिली, पर डर से शव लेने नहीं गए। कलेजे के टुकड़े को अंतिम बार देख भी नहीं सकें और न ही शव से लिपट कर रो भी सके।

 

एसपी अजय लिंडा को बकोरिया मुठभेड़ के बारे में कुछ भी पता नहीं था 

बताते चले कि सीआईडी जांच के दौरान चर्चित बकोरिया कांड के बारे में तत्कालीन लातेहार एसपी अजय लिंडा ने सीआईडी को दिये अपने लिखित बयान में साफ कहा है कि उन्हें घटना के बाद आधी रात को फोन ड्यूटी ने उठाया था और मुख्यालय बात करने को कहा था। कुछ देर बाद पलामू रेंज के डीआइजी हेमंत टोप्पो से बात हुई। डीआइजी ने मनिका थाना क्षेत्र में किसी तरह की नक्सली घटना होने संबंधी जानकारी मांगी थी। इसके बाद मनिका थाना प्रभारी से बात की, तो उसने अपने क्षेत्र में किसी तरह की नक्सली घटना होने से इनकार कर दिया था।

फिर कुछ देर बाद सीआरपीएफ के तत्कालीन आईजी ने जानकारी दी कि मनिका थाना क्षेत्र में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई है। लेकिन मैंने उन्हें बताया कि मनिका थाना प्रभारी ने अपने क्षेत्र में कोई भी मुठभेड़ की घटना होने से इनकार किया है। तब सीआरपीएफ आईजी ने बताया कि लातेहार के मनिका थाना क्षेत्र से सटे पलामू क्षेत्र में मुठभेड़ हुई है। आप अपनी फोर्स को सतर्क कर दीजिए और कट-ऑफ लगा दीजिए। इसके बाद मैंने मनिका थाना प्रभारी सहित अन्य को अलर्ट कट-ऑफ लगाने और घटनास्थल का लोकेशन पता करने को कहा था। 

एक लाइन से बहुत सारे शव पड़े थे  : जवानों को वहीं पर पुरस्कृत किया गया

अपने लिखित बयान में एसपी अजय लिंडा ने कहा है कि रात करीब ढाई बजे घटनास्थल पर पहुंचा। वहां पहले से ही तत्कालीन पलामू एसपी कन्हैया मयूर पटेल बैठे थे। उन्हीं के पास जाकर बैठ गया और उनसे पूछा कि 'क्या हुआ है सर?' उन्होंने बताया था कि उन्हें भी अभी मालूम नहीं है। घटनास्थल पर तत्कालीन आईजी, डीआईजी और सीआरपीएफ डीआईजी भी थे। अपने लिखित बयान में उन्होंने कहा है कि उजाला होने के बाद उन्होंने देखा कि एक लाइन से बहुत सारे शव पड़े थे। बगल में एक गाड़ी क्षतिग्रस्त हालत में पड़ी हुई थी। बाद में पुलिस मुख्यालय से डीजीपी और अन्य वरीय अधिकारीगण घटनास्थल पर पहुंचे और मुठभेड़ में शामिल अधिकारियों व जवानों को वहीं पर पुरस्कृत किया। 

तत्कालीन डीआईजी व पलामू सदर थाने के प्रभारी ने भी मुठभेड़ की जानकारी होने से किया था इनकार

अपने पूर्व में दिये बयान में पलामू के तत्कालीन डीआईजी हेमंत टोप्पो और पलामू सदर थाने के तत्कालीन प्रभारी हरीश पाठक ने भी अपने बयान में कहा था कि उनलोगों को भी मुठभेड़ के संबंध में कोई जानकारी नहीं थी। डीआईजी ने कहा था कि रात एक बजे डीजीपी ने उन्हें फोन कर मुठभेड़ की जानकारी दी थी। इसके बाद उन्होंने पलामू और लातेहार एसपी से बात की, लेकिन दोनों ने मुठभेड़ की जानकारी से इनकार किया था। इंस्पेक्टर हरीश पाठक ने भी कहा था कि उन्हें भी मुठभेड़ की जानकारी नहीं थी। पलामू एसपी ने उन्हें रात ढाई बजे एक दंडाधिकारी को मौके वारदात पर ले जाने को कहा था। वारदात में 12 लोग मारे गये थे। 

(जारी...घटना की अगली कड़ी पढ़ें गुरुवार, 1 मार्च को)

(विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)










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