यूपी निकाय चुनाव के नतीजों में दलित-मुस्लिम एकता का भ्रम

विश्लेषण , , रविवार , 10-12-2017


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हरे राम मिश्रा

उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव के नतीजे आने के बाद, प्रदेश की राजनीति में इस बात पर सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है कि आखिर मुस्लिम मतदाता किसके साथ खड़े हुए? कोई उन्हें समाजवादी पार्टी से नाराज़ बता रहा है तो किसी को यह लगता है कि मुसलमान बसपा के साथ चला गया है। कुछ लोग यह कयास लगा रहे हैं कि मायावती के पुराने दिन वापस लौट सकते हैं। उन्हें इन चुनाव परिणामों से दलित-मुस्लिम एकता की संभावना नज़र आने लगी है। भले ही मायावती इन चुनाव परिणामों से थोड़ा उत्साहित दिख रही हों, लेकिन अगर बारीकी से विश्लेषण किया जाए तो इन नतीजों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो यह साबित करे कि मुसलमानों ने इस बार किसी नए ’ट्रेंड’ पर वोटिंग की है और दम तोड़ते ’लोकतंत्र’ में यह ’ट्रेंड’ नया अध्याय लिख सकता है। 

दरअसल, पूरे निकाय चुनाव में केवल भाजपा ही ऐसी पार्टी थी जिसने ईमानदारी से चुनाव लड़ा और इसके लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। बाकी सपा, बसपा और कांग्रेस ने ठीक से चुनाव प्रचार तक नहीं किया। एक तरह से पूरा मैदान खाली था। ऐसी स्थिति में आधारभूत स्तर पर एक बात साफ हो जाती है कि मुसलमान मतदाता अपने मूल शत्रु ‘भाजपा’ को पहचानने और लोकतांत्रिक तरीके से उसे पराजित करने को लेकर ’ऐतिहासिक’ रूप से जागरूक था। अनुपस्थित विपक्ष की स्थिति में मुसलमानों के पास विकल्प के स्तर पर केवल स्वयं के स्तर से भाजपा विरोधी मजबूत प्रत्याशी का चयन और उसका समर्थन ही एकमात्र ’विकल्प’ था। इसलिए अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए मुस्लिम मतदाता केवल ’भाजपा’ हराओ अभियान का हिस्सा बने। पूरे चुनाव में जिस जगह पर उन्हें भाजपा के खिलाफ मजबूत प्रत्याशी मिला- वे उसी के साथ चले गए। यही वजह है कि उन्होंने समाजवादी पार्टी से लेकर कांग्रेस, बसपा और एआईएमआईएम तक के प्रत्याशियों को समर्थन दिया। कई जगहों पर मुस्लिम मतदाताओं के वोटों में गंभीर बिखराव दिखने की भी यही वजह रही।

बहरहाल, राजनैतिक गलियारे में दो नगर निगमों- मेरठ व अलीगढ़ में मेयर पद पर बसपा की जीत के जो मायने निकाले जा रहे हैं उनसे सहमत नहीं हुआ जा सकता। अति आत्मविश्वास में मायावती भले ही इसे मुसलमानों का बसपा के प्रति बढ़ा हुआ विश्वास बता रही हों, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है। दरअसल मुस्लिम बहुल इलाकों से चुनावी जीत पाए बसपा के ये दोनों प्रत्याशी सिर्फ इसलिए मुसलमानों का ध्यान आकर्षित कर पाए क्योंकि समाजवादी पार्टी ने यहां ठीक से चुनाव नहीं लड़ा और इस सीट पर बहुत ही कमजोर प्रत्याशी उतारा। चूंकि इन क्षेत्रों में मुसलमानों के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी के पास उसका अन्य पिछड़ा वर्ग का जातिगत वोट बैंक शून्य के समकक्ष था, लिहाजा मुसलमानों को यह ठोस रूप से पता था कि समाजवादी पार्टी के पास अपने प्रत्याशी के लिए मुसलमानों से इतर कोई वोटिंग आधार नहीं है। ऐसी स्थिति में सपा प्रत्याशी भाजपा का मजबूती के साथ सामना नहीं कर सकता था। हलांकि इस इलाके में दलित अच्छी खासी आबादी में हैं और ऐसी स्थिति में मुसलमानों को यह लगा कि बसपा का प्रत्याशी ही भाजपा को चुनावी शिकस्त दे सकता है। इसलिए वह थोक में बसपा की ओर शिफ्ट हो गए। यही इन दो सीटों पर बसपा की जीत का कारण बना। सच तो यह है कि इस जीत के लिए मायावती और बसपा कैडरों ने पार्टी के स्तर पर कोई खास मेहनत नहीं की थी। भाजपा के मुकाबले मायावती के चुनाव प्रचार नहीं करने के कारण वह निराशा में भी थे।

जहां तक इस नतीजे के आधार पर भविष्य में किसी दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावना का सवाल है- यह महज एक दिवास्वप्न है। जिन्हें यह लगता है कि बसपा के साथ मुसलमानों के खड़े होने से ’लोकतंत्र’ को फायदा होगा- उन्हें अपने इस नतीजे पर फिर से विचार करना चाहिए। ऐसा सोचने वालों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि आखिर पिछली दफा जब मायावती पांच साल के पूर्ण शासन में सत्ता में थीं तब उन्होंने ऐसा कौन सा काम किया जिसे मुसलमान आज सकारात्मक तौर पर याद करता है? हालांकि इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उस समय दलितों के साथ मुसलमानों ने भी मायावती को खुला समर्थन दिया था। लेकिन मुसलमानों को सिवाए धोखे के कुछ हासिल नहीं हुआ। 

वैसे इस पूरे चुनाव में कांग्रेस के लिए एक बात सकारात्मक देखी गई। जहां पर कांग्रेस के प्रत्याशी मजबूत स्थिति में थे वहां मुसलमानों ने उनका भरपूर साथ दिया। शहरी इलाकों के अलावा यह प्रवृत्ति ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखी गयी। यह सब कांग्रेस के लिए भले ही सुखद हो सकता है लेकिन बसपा और सपा के लिए मुसलमानों का ऐसा रुझान बेचैनी का कारण बनेगा। मुसलमानों के लिए जहां हिन्दुत्व के मसले पर समाजवादी पार्टी अपनी साख खत्म कर चुकी है वहीं बसपा भी उनके लिए भरोसेमंद नहीं है। इस अविश्वास की कई ठोस वजहें हैं जिन्हें नकारा नहीं जा सकता है।

वास्तव में दलित सांप्रदायिकता का उन्मूलन हुए बिना किसी दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावना न के बराबर है। दलित सांप्रदायिकता के खात्मे के लिए मायावती को अपनी राजनीति में बहुत बदलाव करने होंगे। लेकिन मायावती में ऐसा कोई लक्षण नहीं दिखता जिससे दलित सांप्रदायिकता कमजोर हो सके। अगर मुसलमान दलितों के नजदीक जाने का प्रयास भी करें तो भी उसे ’धोखा’ से ज्यादा कुछ हासिल नहीं होगा। अतीत के अनुभव मुसलमानों के लिए बहुत भयावह रहे हैं। कहने का मतलब यह है कि इस चुनाव में मुसलमानों का दलितों के साथ खड़ा होना केवल एक चुनावी ’रणनीति’ थी। इससे किसी नए समीकरण की संभावना राजनैतिक नासमझी भर है। बसपा की इस चुनावी जीत से भी मुसलमानों को कोई लाभ नहीं होगा। मायावती को इस भ्रम से भी बाहर आ जाना चाहिए कि विकल्पहीनता की स्थिति में मुसलमान बसपा की तरफ शिफ्ट होने को मजबूर हो जाएगा। क्योंकि 2014 का अनुभव यह बताता है कि अब मुसलमान ’रिस्क’ लेना सीख गया है। बिना उसके लिए कुछ ठोस किए उससे समर्थन की आशा बेमानी और खुद को धोखा देने जैसा है। लेकिन मायावती हास्यास्पद बयानबाजी से इतर जाने और कुछ ’ठोस पहल का साहस नहीं कर पा रही हैं। यही उनका असल संकट है कि उन्हे उस जीत का श्रेय लेने में भी कोई गुरेज नहीं है जिसके लिए एक दिन भी मेहनत नहीं की गई।

(लेखक राजनैतिक-सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)






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