सत्ता के अपराधीकरण का हथियार है यूपीकोका

उत्तर प्रदेश , , बृहस्पतिवार , 14-12-2017


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जनचौक ब्यूरो

लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र आज से शुरू हो गया है। विधानसभा के शीतकालीन सत्र के ठीक एक दिन पहले यानी 13 दिसंबर को योगी कैबिनेट की एक बैठक में कई अहम प्रस्तावों के साथ यूपीकोका को मंजूरी दी गई है। प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का कहना है कि इस कानून से संगठित अपराधों को रोकने में कामयाबी मिलेगी। प्रदेश में बढ़ रहे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए कैबिनेट ने यह  फैसला लिया है। प्रदेश सरकार के इस फैसले से विपक्ष के साथ ही मानवाधिकार संगठनों एवं दलित,अल्पसंख्यक संगठनों की भृकुटि तन गयी है। यूपीकोका संगठित अपराधों की रोकथाम के लिए महाराष्ट्र के मकोका कानून की तर्ज पर लाया जा रहा है। यूपीकोका पर तकरार न हो इसके लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सर्वदलीय बैठक बुलाई।इसमें सभी पार्टियों के प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया गया। सदन को सुचारू रूप से चलाने में विपक्षी नेताओं ने सहयोग का आश्वासन दिया। लेकिन यूपीकोका को लेकर विपक्ष नाराज है। विपक्ष के नेता रामगोबिंद चैधरी ने सत्तापक्ष को इस काले कानून पर फिर से विचार करने को कहा है।

ऐसा पहली बार नहीं है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद यूपीकोका जैसा कानून लाया जा रहा है। पहले भी भाजपा की सरकारें टाडा, पोटा, यूएपीए, मकोका, गुजकोका जैसे गैर लोकतांत्रिक कानूनों को लाती रही है। ऐसे कानूनों की अगली कड़ी यूपीकोका है। सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकारें विपक्ष के साथ विरोध और प्रतिरोध की हर शक्ति का मुंह बंद कर देना चाहती हैं। यह अनायास नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देते हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह उससे एक कदम आगे बढ़ कर विपक्ष मुक्त भारतऔर अंत में विरोध मुक्त भारतबनाने का नारा देते हैं।  

योगी कैबिनेट की बैठक

रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनावाज आलम कहते हैं-

‘‘योगी सरकार दलितों, मुसलमानों और पिछड़ों को फंसाने के लिए यूपीकोका ला रही है। वह कहते हैं कि यदि योगी आदित्यनाथ सही अर्थों में कानून का राज स्थापित करना चाहते हैं तो पहले गोरखपुर दंगे में अपनी भूमिका की जांच का आदेश दें। जब मुख्यमंत्री पर ही अपराध का आरोप होगा तो  अपराध मुक्त प्रदेश कैसे बनेंगा।’’ 

योगी सरकार द्वारा यूपीकोका लाए जाने पर राजनीतिक हलकों में बहुतेरे सवाल उठ रहे हैं। कहा जा रहा है कि क्या 2007 में गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ के भाषण के बाद भड़की सांप्रदायिक हिंसा जैसी वारदातें इसके दायरे में आएंगी। सरकार की मंशा पर सवाल किया जा रहा है कि जब पहले से ही ढेर सारे कानून हैं तो यूपीकोका की क्या जरूरत है? आईपीसी, गैंगेस्टर एक्ट जैसे बहुतेरे कानून हैं जिसके तहत इन आपराधिक मामलों को हल किया जा सकता है। इसलिए यूपीकोका लाने का कोई औचित्य ही नहीं है सिवाए इसके कि इसके जरिए मुसलमानों को फंसाया जाए जैसा कि मकोका के तहत किया जाता रहा है। 

रिहाई मंच के नेता राजीव यादव कहते हैं कि टाडा, पोटा, यूएपीए, मकोका, गुजकोका जैसे गैर लोकतांत्रिक कानूनों की अगली कड़ी यूपीकोका है। योगी आदित्यनाथ जो घूम-घूमकर कानून व्यवस्था को सुधारने का दावा कर रहे हैं उन्हें बताना चाहिए कि जब सरकार बेहतर कर रही है तो यूपीकोका जैसे कानूनों की क्या जरुरत है। राजीव यादव कहते हैं,

‘‘प्रदेश में हुए खुलेआम फर्जी एनकाउंटर में सबसे अधिक मुस्लिम, पिछड़े, दलित समाज के लोग मारे गए। उन्होंने सवाल किया कि बुलंदशहर से लेकर शाहजहांपुर तक मुस्लिम पहचान को लेकर भीड़ द्वारा की जा रही हत्याओं के जो गुनहगार हिन्दू युवा वाहिनी के हैं उन पर क्या यूपीकोका के तहत कार्रवाई होगी? बलिया की मासूम रागिनी के हत्यारोपी प्रिंस तिवारी जो अपने को योगी सेवक कहता था उस पर क्या यूपीकोका के तहत कार्रवाई होगी? राह चलते सांप्रदायिक व जातीय हत्या करने वालों के खिलाफ क्या योगी सरकार इस कानून के तहत कार्रवाई करने की इच्छा शक्ति रखती है? सहारनुपर में दलितों के साथ जो संगठित हिंसा हुई क्या उसके गुनहगारों को ये कानून सजा दिला सकता है?’’

शाहनवाज आलम ने कहा कि लैंड माफिया, खनन माफिया के खिलाफ यूपीकोका को जिस तरह से भाजपा प्रचारित कर रही है उसे बताना चाहिए कि उसकी एंटी भूमाफिया टाॅस्क फोर्स कहां गई, क्या वो सिर्फ वसूली के लिए बनाई गई थी?

 

 

 

 










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