गोरखपुर सांप्रदायिक हिंसा मामले में योगी के खिलाफ ठोस सबूत: असद हयात

उत्तर प्रदेश , , रविवार , 08-10-2017


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राजीव यादव

(2007 में गोरखपुर में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कल इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई होनी है। इस मामले में उनके साथ केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ला भी आरोपी हैं। इस मसले पर स्वतंत्र पत्रकार राजीव यादव ने मामले की कानूनी लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट और अवामी कौंसिल के महासचिव असद हयात से बात-चीत की-संपादक):

राजीव यादव: गुजरात हाईकोर्ट के जकिया जाफरी के केस में आए फैसले के बाद आप गोरखपुर मामले को कैसे देखते हैं? गुजरात हाईकोर्ट ने आपराधिक षड़यंत्र की विवेचना पर जकिया जाफरी के विरुद्ध निर्णय दिया है। योगी केस के संदर्भ में आपका क्या कहना है?

असद हयात: हर एक मामले की अपनी अलग-अलग पृष्ठभूमि होती है। यह आवश्यक नहीं होता कि आपराधिक षड़यंत्र रचने का कोई सीधा सबूत उपलब्ध हो। इन हालात में परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर ही अदालतें अपने फैसले लेती हैं। गोरखपुर सांप्रदायिक हिंसा के मामले में हिंसा भड़काने और आपराधिक षड़यंत्र रचने का सीधा सबूत योगी आदित्यनाथ द्वारा 27 जनवरी 2007 को सायंकाल दिया गया भड़काऊ भाषण है जिसकी सीडी मौजूद है। उन्होंने बंदी का ऐलान करते हुए अपने समर्थकों से इसकी सूचना सभी जगह पहुंचाने को कहा। यह भी कि ताजिया नहीं उठेगा, हम ताजियों के साथ होली मनाएंगे।

यहां तक कि उन्होंने आगजनी और हत्याएं भी करने के लिए प्रेरित किया। उनका यह भाषण़ अदालत के सामने है और यह आपराधिक षड़यंत्र का मजबूत साक्ष्य है। इस मामले में मैं अधिक नहीं कहना चाहूंगा क्योंकि मामला न्यायालय के समक्ष है। लेकिन इतना अवश्य कहूंगा कि व्यक्ति झूठ बोल सकता है परन्तु परिस्थितिजन्य साक्ष्य नहीं। इस मामले में ऐसे साक्ष्य मौजूद हैं। स्वयं योगी आदित्यनाथ ने टीवी शो आपकी अदालतमें अपने इस भड़काऊ भाषण को दिया जाना स्वीकार किया है। परन्तु जांच एजेंसी को यह तथ्य बताए जाने के बावजूद उन्होंने इस एक्सट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन को विवेचना में शामिल नहीं किया।

जहां तक जकिया जाफरी केस का ताल्लुक है तो शायद वहां कोई इस तरह का सीधा सबूत उपलब्ध नहीं है। गोरखपुर मामले से संबन्धित मामलों में कई हत्या, हत्या के प्रयास, मकानों-दुकानों, सरकारी बसों, रेलों और इबादतगाहों में आगजनी के हैं। योगी और शिव प्रताप शुक्ला के अलावा विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल, पूर्व मेयर अंजू चौधरी और पूर्व एमएलसी वाईडी सिंह सहित कई सौ लोग चिन्हित किए गए हैं जिनकी आपराधिक भूमिकाएं अन्य मामलों में सामने आई हैं।

असद हयात।

प्रश्न: योगी आदित्यनाथ के मामले में सरकारी एजेंसियों की क्या भूमिका रही है?

असद हयात: गोरखपुर निवासी परवेज परवाज और मुझे इस मामले की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाने के लिए लगभग डेढ़ साल का वक्त लगा। स्थानीय प्रशासन और तत्कालीन मायावती सरकार नहीं चाहती थी कि योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कोई अन्य बड़ा मामला दर्ज हो। इस मामले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में फरमान अहमद नकवी एडवोकेट ने पैरवी की और तब एफआईआर दर्ज हुई लेकिन उस पर सुप्रीम कोर्ट से स्थगन आदेश आ गया। दिसम्बर 2012 में रोक हटी तब जनवरी 2013 से विवेचना शुरू हुई। योगी आदित्यनाथ के आपराधिक षड़यंत्र के फलस्वरुप हुई हिंसा के अकेले गोरखपुर जनपद में ही 29 मुकदमे दर्ज हुए। वहीं जनपद कुशीनगर में 42, जनपद महराजगंज, बस्ती व अन्य जिलों में बीस से अधिक सांप्रदायिक हिंसा के मुकदमे दर्ज हुए।

जांच एजेंसियों ने संबन्धित सारा रिकार्ड हासिल तो किया मगर धारा 120 बी (आपराधिक षड़यंत्र) के अन्तर्गत जांच ही नहीं की। हम शुरू से ही कह रहे थे कि हमें राज्य सरकार के अधीन किसी जांच एजेंसी से निष्पक्ष विवेचना की उम्मीद नहीं है। अब न्यायालय के समक्ष मामला विचाराधीन है। इस बीच हुआ यह कि अखिलेश सरकार ने धारा 153 , 295 ए के तहत अभियोजन चलाने की अनुमति पत्रावली को अनावश्यक रुप से लंबित रखा और योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनते ही इस पत्रावली पर नामंजूरी की मुहर लगा दी। इस तरह अपने ही विरुद्ध लंबित आपराधिक मामले में खुद ही जज बन बैठे। प्राकृतिक न्याय सिद्धान्त के अनुसार योगी आदित्यनाथ अपने ही मामले के जज नहीं हो सकते। यह संवैधानिक शक्तियों व पद के दुरुपयोग का दुर्लभतम मामला है।

एक अन्य मामले में राज्य सरकार ने योगी आदित्यनाथ और उनके साथियों पर मुकदमा चलाने की स्वीकृति 2009 में ही दे दी थी और उस पर अदालत ने संज्ञान भी ले लिया था। लेकिन सरकारी वकीलों की उदासीनता और योगी आदित्यनाथ के प्रति उनके नरम रवैये के कारण इस मामले में आरोप तक निर्धारित नहीं हो सके। अभी कुछ सनसनीखेज जानकारियां भी मिल रही हैं।

शिव प्रताप शुक्ला।

प्रश्नयह अन्य मामला क्या है?

असद हयात: 27 जनवरी 2007 को दिन के समय योगी आदित्यनाथ अपने समर्थकों के साथ गोरखपुर शहर स्थित एक आस्तना (मजार) पर पहुंचे और वहां धार्मिक पुस्तकों का अपमान किया, तोड़फोड व आगजनी की। इस संबन्ध में उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ और आरोप पत्र भी दाखिल हुआ परन्तु अभी तक ट्रायल शुरू नहीं हो सका है। इस मामले में धारा 436 आईपीसी जैसी गंभीर धाराएं लगी हैं जिन पर सेशन कोर्ट में ही ट्रायल चल सकता है। इस धारा के अन्तर्गत दस वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। किसी आवासीय अथवा धार्मिक पूजा स्थल में यदि कोई आगजनी करता है तो वह इस धारा के अन्तर्गत दोषी होता है। चूंकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश है कि अदालतें सांसदों और विधायकों के विरुद्ध लंबित उन आपराधिक मामलों का निपटारा एक वर्ष के भीतर करें जिनमें आरोप निर्धारित हो गए हों। लिहाजा इस मामले को सरकारी वकील द्वारा अभी तक आरोप निर्धारित होने के लिए सेशन कोर्ट को कमिट (स्थानांतरण) भी नहीं होने दिया गया है। जबकि सरकार द्वारा अभियोजन चलाने की आवश्यक पूर्व स्वीकृति मिलने के बाद ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा इस पर संज्ञान 2009 में ही लिया जा चुका था।

प्रश्न: गोरखपुर मामले में आपकी अदालत से क्या प्रार्थना है?

असद हयात: इस मामले में हमने निष्पक्ष विवेचना की प्रार्थना माननीय हाईकोर्ट से की है। इस मामले की अगली सुनवाई 9 अक्टूबर को होनी है। न्यायालय को अभियोजन स्वीकृति के बिन्दु पर भी विचार करना है।

 

 










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