संसद से सड़क तक विपक्ष कहां है?

राजनीति , , रविवार , 05-08-2018


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गणेश कुमार

किसी लोकतांत्रिक  देश की सत्ता निरंकुश और मनमाने ढंग से काम न करे इस के लिए एक मजबूत, जागरूक और रचनात्मक विपक्ष की ज़रूरत होती  है जो सत्ता पक्ष का समुचित विरोध कर सके और सरकार को बाध्य करे कि सरकार की नीतियां जनता और देश के चतुर्दिक विकास के लिए बनें। परंतु इसका यह भी आशय नहीं कि वह विपक्ष में है तो विरोध ही उसका काम है।

वर्तमान सरकार के पिछले चार सालों का मूल्यांकन करें तो जनता के पक्ष में कहीं कोई कार्य ज़मीन पर दिखाई नहीं देते। किसान, छात्र, मध्य वर्ग, कर्मचारी, व्यापारी और उद्योग जगत परेशान हैं।  सरकार खुद अपनी पीठ थपथपा रही है वह अलग बात है। चूंकि चुनाव सिर पर है इसलिए सरकार का घूम -घूमकर अपने कागज़ी कामों का ढिंढोरा पीटना स्वाभाविक हैअब सवाल उठता है की यदि सरकार हर मोर्चे पर नाकाम रही तो विपक्ष ने उन मोर्चो पर क्या पहलकदमी ली। क्या वह जनता के बीच पहुंच कर  उनके दुख -दर्द को समझ पाया ?

क्या विपक्ष  उनके मुद्दों को संसद में रखकर या उनसे जुड़ कर सड़क पर ला पाया। इस बिंदु पर आप गौर करें तो छोटे-मोटे प्रतिरोधों को छोड़ कर विपक्ष कहीं खड़ा नहीं दिखता। सरकार वैसे ही, साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग कर  विपक्ष को बिखेरने के हर मुमकिन उपाय कर रही है। लालू यादव को जेल की सज़ा उसका एक जीता जागता उदाहरण है। उत्तर प्रदेश में उभरती हुई, नौजवान लीडरशिप चंद्रशेखर रावण की संगीन धाराओं में गिरफ्तारी, जिग्नेश मेवानी जैसे नेताओं की सभाओं और रैलियों पर प्रतिबंध आदि कितने उदाहरण इस कड़ी में मिल जाएंगे।

अभी हाल में मीडिया के जाने माने चेहरे दिलीप सी मंडल का कमेंट आया था कि अपनी तमाम नाकामियों के वावजूद मोदी शाह की जोड़ी शहर -शहर जाकर पसीना बहा रही है और कोशिश कर रही है कि अपनी तमाम नाकामियों के बावजूद सत्ता अपने हाथ में रहे। मगर विपक्ष अपने वातानुकूलित कमरों से निकलने की जहमत नहीं उठा रहा है। यह बहुत महत्वपूर्ण बात थी। पूरे विपक्ष का काम कुछ ऐसा ही रहा है। लगातार हमारे सामने ऐसे मुद्दे आते रहे जिनको लेकर जोरदार पहलकदमी हो सकती थी और सरकार को वाध्य किया जा सकता था।   

  • मध्य प्रदेश में किसान काफ़ी परेशान और आंदोलित रहे जिसमें किसान संगठनों के अतिरिक्त किसी राजनैतिक पक्ष की भूमिका नही रही। केरल से किसान आए और दिल्ली में अपनी परेशानियों को लेकर धरना प्रदर्शन करते रहे लेकिन कोई विपक्ष का राजनैतिक दल उनके बराबर नहीं खड़ा हुआ। महाराष्ट्र में किसानों ने अपने दम पर सरकार से अपनी कुछ मांगे मनवाई।
  • छात्रों की समस्याओं पर तो विपक्षियों ने कान में  तेल डाल कर चुप रहना उचित समझा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र आंदोलनरत रहे, रोहित वेमूला और दलित छात्रों के मसले पर दक्षिण में छात्र आंदोलित रहे। बनारस में कुलपति के खिलाफ छात्र आंदोलित रहे और  जेएनयू की घटना को कैसे भुला जा सकता है।
  • जीएसटी,नोट बदली पर आम आदमी, किसान, व्यापारी सब तंग रहे और अपने अपने हिसाब से विरोध करते रहे। विपक्ष केवल  टीवी चैनलों पर तू-तू मैं-मैं के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सका।
  • पेट्रोल,डीजल के दामों मे इज़ाफा जो हर छोटे बड़े को प्रभावित करता है और इसी को लेकर वर्तमान सरकार जो सत्ता में है, कभी सड़कों पर थी और उसका फ़ायदा भी उठाया। मगर यहां भी विपक्ष कहीं नहीं दिखा।
  • इसके अतिरिक्त भी बहुत सारे मुद्दे जैसे- उद्योगपतियों का कर्ज़ माफ़ करना, उन्हें बाहर के मुल्कों मे जाने देना आदि कई मुद्दे - मौके थे जिनपर काफ़ी कुछ किया जा सकता था।

    अब इतने सारे अवसरों के होते हुए यदि आप सो रहे हैं और सोच रहे हैं की सत्ता हाथ में आएगी तो यह टेढ़ी खीर है। दरअसल समस्या यह है कि विपक्ष में आपस में समझदारी नहीं है। और दूसरी बात इनमें और सत्ता पक्ष के चरित्र में बस थोड़ा बहुत फ़र्क है। जो कुछ हलचल नज़र आती है वह महज राजनैतिक स्वार्थ है। जनता तो इनके एजेंडे में नहीं है वरना इस तरह के अवसरों पर तो सत्ता की चूलें हिलनी चाहिए थी।

    विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी में नेतृत्व के बदलाव के वावजूद कुछ खाश काम नही दिख रहा है। उत्तर प्रदेश में थोड़ी समझ बसपा और सपा में दिखी थी मगर वह भी अभी तक ठंडे बस्ते में है। वक्त की ज़रूरत तो यह है कि कोई  एक पहल करता और अबतक सब को इकट्ठा करके  कोई साझा कार्यक्रम तैयार हो जाना चाहिए था मगर अभी तक तो बस ढाक के तीन पात ही दिखाई पड़ रहे हैं। जल्दी नहीं चेते तो ये जहां है वहीं रहेंगे।

     










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    Savita Maurya :: - 08-10-2018
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