पूर्व नौकरशाहों ने लिखा पीएम को पत्र, कहा-आजादी के बाद का यह सबसे काला समय

इंसाफ की मांग , , मंगलवार , 17-04-2018


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जनचौक ब्यूरो

देश के पूर्व नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक खुला पत्र लिखा है। इस पत्र के माध्यम से कठुआ और उन्नाव में हुए सामूहिक बलात्कार मामले में कार्रवाई करने का आग्रह किया है। सेवानिवृत्त नौकरशाहों ने कठुआ, उन्नाव सामूहिक बलात्कार मामले में आरोपियों पर फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाने और ‘‘देश को अराजकता की गिरफ्त में जाने से बचाने’’ का भी अनुरोध किया है। पत्र में यह चिंता व्यक्त की है कि, ‘‘देश के सभ्यतागत मूल्यों की मौत हो रही है।’’ सेवानिवृत्त नौकरशाहों का एक समूह देश के वर्तमान हालत से चिंतित है। कठुआ और उन्नाव मामले के संदर्भ में नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि ‘‘वे कुछ ऐसा करें जिससे देश को अराजकता की स्थिति में जाने से रोका जा सके।’’ पूर्व नौकरशाह अमिताभ पांडे ने इस पत्र को अपने फेसबुक टाइमलाइन पर पोस्ट किया है। शुरुआत में, उन्होंने स्पष्ट किया है कि-

इस समूह का किसी राजनीतिक पार्टी या किसी विचारधारा से कोई संबंध नहीं है। यह आवाज ‘‘हमारे संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और उदार मूल्यों पर आधारित है।’’ पत्र में कठुआ और उन्नाव की घटना को अकथनीय भयावह बताते हुए कहा कि, ‘‘ऐसी घटनाएं यह दर्शाती हैं कि सरकार अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को निभाने में विफल रही है।’’   

इस पत्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दक्षिणपंथी समूह पर सीधा हमला माना जा रहा है। पत्र में प्रधानमंत्री की आलोचना की गई है कि कठुआ की भयावह घटना पर वह तब तक मौन साधे रहे जब तक कि मामले को संयुक्त राष्ट्र ने नोटिस नहीं लिया। पूर्व नौकरशाहों ने प्रधानमंत्री का आह्वान किया है कि इस ‘‘अस्तित्व संकट के क्षण’’ में ऐसा कार्य करें, जिससे यह विश्वास लौट सके कि हम एक राष्ट्र के रूप में हर चुनौती से निपटने में सक्षम हैं। पत्र में यह भी मांग की गई है कि सामूहिक बलात्कार के अपराधियों के अभियोजन फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलें और दोनों मामलों की जांच न्यायालय की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपा जाए।  

माननीय प्रधानमंत्री,

हम सब सेवानिवृत्त नौकरशाहों का एक समूह हैं। पिछले साल हम लोग संविधान में निहित धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और उदारवादी मूल्यों में गिरावट पर अपनी चिंता व्यक्त करने के लिए एकत्र हुए थे। तब हम विरोध की अन्य आवाजों में शामिल हुए थे जब भयावह रूप से नफरत का माहौल बनाया जा रहा था, सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान द्वारा भय एवं क्रूरता को घातक रूप से प्रेरित किया जा रहा था। हमने तब आवाज उठाई और हम अब भी ऐसा ही कर रहे हैं। एक नागरिक के रूप में हम संविधान में निहित मूल्यों एवं सिद्धांतों के अलावा किसी राजनीतिक पार्टी और किसी विचारधारा का पालन नहीं करते हैं।     

हमें उम्मीद थी कि जैसा कि कोई भी संविधान की रक्षा का शपथ लेता है, सरकार जिसके आप प्रमुख हैं और जिस पार्टी से आप हैं, वे इस खतरनाक चेतावनी के बाद जाग जाएं! इस सामाजिक, नैतिक और कानूनी गिरावट के मद्देनजर आगे बढ़कर इसे रोंके। खासकर अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों को आश्वस्त करें कि वर्तमान परिदृष्य में उनकों अपने जीवन और स्वतंत्रता के लिए डरने की जरूरत नहीं है। लेकिन इस आशा को नष्ट कर दिया गया है। इसके बजाए,कठुआ और उन्नाव की अकथनीय दर्दनाक घटनाओं और उससे उपजे भय से यह महसूस होता है कि सरकार जनता द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारियों में से न्यूनतम जिम्मेदारियों को भी पूरा करने में विफल रही है।

हम, एक अर्थों में एक राष्ट्र के रूप में नाकाम रहे हैं, जो अपनी नैतिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करता था और एक समाज के रूप में जो सहिष्णुता, करुणा और साझा भावनाओं के सभ्यतावादी मूल्यों के कारण जाना जाता था। एक इंसान के साथ मानवीय क्रूरता को ‘‘हिंदुओं’’ के नाम पर जोड़कर दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा करके हम मानवीय स्तर पर नाकाम हुए हैं। 

एक आठ वर्षीय बच्चे की पाशविक और बर्बर तरीके से बलात्कार और हत्या से पता चलता है कि-

हम अनैतिकता में डूब गए हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत का यह सबसे ‘‘काला समय’’ है और इसके प्रतिउत्तर में हम पाते हैं कि हमारी सरकार, राजनीतिक पार्टियों का नेतृत्व अयोग्य और अक्षम है। इस मौके पर हमें इस सुरंग के अंत में कोई रोशनी नहीं दिखाई देती है और हम अपने सिर को शर्मिंदगी से झुका पाते हैं।

हमारी शर्म की भावना तब और अधिक तीव्र हो जाती है जब हमारे युवा नौकरशाह जो अभी सेवा में हैं, खासकर उन जिलों में काम कर रहे हैं और जहां कानून के अनुसार जरूरी है कि वे कमजोर और निर्बलों की देखभाल करें, वे स्वयं को अपना कर्तव्य निभाने में असफल पा रहे हैं।    

प्रधानमंत्री जी, हम यह पत्र केवल अपने सामूहिक शर्म की भावना को व्यक्त करने के लिए नहीं लिख रहे हैं। यह हमारी पीड़ा या शोक को आवाज देने और हमारे सभ्यतावादी मूल्यों के पतन पर शोक व्यक्त करने के लिए भी नहीं है। यह हमारे क्रोध को व्यक्त करने के लिए है। यह क्रोध आपकी पार्टी की विभाजनकारी राजनीति पर है।

आपकी अपनी पार्टी और उसके अनगिनत, अनदेखी शाखाएं जो समय-समय पर नफरत के साथ उछाल मारती हैं, ने हमारी राजनीति, हमारे सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के व्याकरण और यहां तक कि हमारे दैनिक व्यवहार में व्याकुलता से भर दिया है। यह कठुआ और उन्नाव में हुई घटनाओं को सामाजिक स्वीकृति और वैधता प्रदान करता है।

यह जम्मू के कठुआ में संघ परिवार द्वारा प्रोत्साहित की गई बहुसंख्यकवाद की आक्रामकता की संस्कृति का नतीजा है जो अपने विकृत एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पोषित सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा देता है। वे जानते थे कि उनका इस तरह का व्यवहार राजनीतिक रूप से शक्तिशाली पार्टी से समर्थित होगा और इस सांप्रदायिक विभाजन से हिंदुओं और मुसलमानों में ध्रुवीकरण से उनका राजनीतिक करियर बनेगा।

उत्तर प्रदेश में उन्नाव में एक सामंती माफिया डॉन जो वोटों और राजनैतिक शक्ति के माध्यम से इतना बलशाली हो जाता है कि वह बलात्कार, हत्या और उगाही करने की ताकत पा जाता है? लेकिन सत्ता शक्ति और धनबल के दुरूपयोग से भी अधिक वह दोषी है। इस मामले में पीड़ित को संरक्षण देने के बजाए राज्य सरकार आरोपी के ही संरक्षण में लगी रही। इस घटना से राज्य में कानून-व्यवस्था और शासन की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। यूपी सरकार ने अंततः तब कार्रवाई शुरू की जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले पर सरकार के असंवेदनशील रवैए और हृदयहीनता दिखाने की टिप्पणी की।

इन दोनों मामलों में, प्रधानमंत्री जी आप सरकार के प्रमुख हैं और यह आपकी पार्टी जिसके एक अध्यक्ष है, इस भयावह स्थिति की जिम्मेदारी और किसी पर नहीं डाली जा सकती है। हालांकि, चुनाव के समय आप और पार्टी अध्यक्ष ने दोनों राज्यों के पुनर्निर्माण के लिए मालिकाना हक मांगा था। और जब मरम्मत की जरूरत पड़ी तब इसे करने के बजाए मौन साध लिया। आपकी चुप्पी तोड़ने के पहले ही दोनो मुद्दे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चरम बिंदु पर पहुंच गए, जब आप इसे अनदेखा नहीं कर सके तब बच्चियों के साथ न्याय होने का गोलमोल बयान दिया।

और फिर भी, जब आपने इस घटना की निंदा की है और शर्मिंदा होने की भावना व्यक्त की है, आपने इस तरह की घटनाओं के पीछे के कारण सांप्रदायिक रोग विज्ञान की निंदा नहीं की है और न ही इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को बदलने का संकल्प व्यक्त किया है। जिसके तहत इस तरह के सांप्रदायिक नफरत का विकास होता है। हमारे पास आपके विलम्बित बयानों से पर्याप्त आशंका को बल मिला है। लेकिन क्या आप यह वादा करेंगे कि जब संघ परिवार मय बल और भीड़ के साथ देश को सांप्रदायिकता की कड़ाही में तलने की कोशिश करेगा तब आप न्याय करने का वादा निभाएंगे।  

प्रधानमंत्री जी, ये दोनों घटनाएं मात्र सामान्य अपराध नहीं हैं, जो समय बीतने के साथ, हमारे सामाजिक ताना-बाना, राजनीतिक अंग और नैतिक आवरण पर लगे घाव को ठीक कर देगा। और जल्द ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा। यह अस्तित्व के संकट का क्षण है, हम आज एक दोराहे पर खड़े हैं। अब सरकार को यह जवाब देना होगा और तय करना होगा कि हम एक राष्ट्र और एक गणतंत्र के रूप में संवैधानिक मूल्यों, शासन और नैतिक आदर्शों के संकट से उबरने की क्षमता रखते हैं जिसके तहत हम काम करते हैं।

अंत में हम आपसे निम्नलिखित बिंदुओं पर काम करने की आशा करते हैं-

1- उन्नाव और कठुआ में पीड़ितों के परिवारों तक जाकर हम सभी की ओर से उनसे माफी मांगें।

2- कठुआ मामले में अपराधियों के अभियोजन के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट और उन्नाव मामले में अदालत की निगरानी में एसआईटी जांच के लिए निर्देशित करें। इन निर्दोष बच्चों और नफरत की आग में जले सभी पीड़ितों की याद में, मुसलमानों, दलितों, अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों और महिलाओं और बच्चों को विशेष सुरक्षा प्रदान करने का वचन दें ताकि उन्हें अपने जीवन और स्वतंत्रता के लिए डरने की जरूरत न पड़े। राज्य प्राधिकरण इनके सुरक्षा लिए वचनबद्ध हो। 

3- सरकार नफरत अपराधों और घृणात्मक भाषणों से संबद्ध किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कदम उठाए।

4- नफरत, अपराध की घटना को सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से निपटने के तरीके पर विचार करने के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाएं। यह सही है कि यह कदम उठाने में अब बहुत देर हो चुकी है लेकिन यह कार्यवाही एक बार फिर यह विश्वास पैदा कर सकती है कि देश के अंदर अराजकता को रोका जा सकता है। हम ऐसी आशा करते हैं।

 

 






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