अंग्रेजी हुकूमत ने रोक दी थी भारतीय भाषाओं में ज्ञान उत्पादन की प्रक्रिया: अभय दुबे

कार्यक्रम , , मंगलवार , 19-03-2019


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जनचौक ब्यूरो

वाराणसी। उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में मैकॉले-बेंटिक-ट्रेविलियन की तिकड़ी ने संस्कृत, फ़ारसी और अरबी समेत भारत की सभी भाषाओं से ज्ञानोत्पादन की प्रक्रिया में भागीदारी करने का अधिकार छीन लिया। साथ ही इन भाषाओं में उस समय तक उत्पादित समस्त ज्ञान को भी स्तरहीन और अनुपयोगी बता कर ख़ारिज कर दिया गया। इस तिकड़ी ने औपनिवेशिक राज्य के प्राधिकार का इस्तेमाल करके घोषित किया कि भारतवासियों के लिए जिस नये, उपयोगी और आधुनिक ज्ञान का उत्पादन किया जाना है, उसके लिए केवल अंग्रेज़ी भाषा ही सक्षम है।  इसलिए शिक्षा के लिए निर्धारित बजट का एक-एक पैसा केवल दुनिया की इसी 'श्रेष्ठतम और क्लासिक' भाषा की शिक्षा पर ही ख़र्च किया जाएगा। यह बात राजनीतिक विश्लेषक और समाज विज्ञानी प्रोफेसर अभय कुमार दुबे ने कही। वह यहां एक सेमिनार को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि जिस अंग्रेज़ी को 'श्रेष्ठतम और क्लासिक' बता कर उपनिवेशवादी भारत पर थोप रहे थे, वह केवल आठ दशक पहले ब्रिटेन में ही ज़ाहिलों और गंवारों की भाषा मानी जाती थी। वहां का राजा और उसके दरबारी भी इस भाषा को बोलना-बरतना पसंद नहीं करते थे। अठारहवीं सदी के मध्य से इंग्लैंड में बड़े पैमाने पर अंग्रेज़ी के मानकीकरण की मुहिम चली जिसकी बागडोर थॉमस शेरिडान, सेमुअल जॉनसन, एडम स्मिथ, ह्यू ब्लेयर और लॉर्ड मोनबोडो जैसे भाषाई रणनीतिकारों के हाथ में थी। मानकीकरण की इस प्रक्रिया ने शब्दकोशों, व्याकरणों, निघंटुओं और उच्चारण-पद्धतियों को ही जन्म नहीं दिया, बल्कि इस बनती हुई भाषा पर आंतरिक उपनिवेशवाद के औज़ारों से एक ऐसी विचारधारा की इबारत लिखी जिसका मक़सद अंग्रेज़ी भाषा और उसके साहित्य के अलौकिक साम्राज्य (मेटाफ़िज़िकल एम्पायर) की स्थापना करना था। 

अपने लंबे संबोधन में उन्होंने कहा कि ये रणनीतिकार अच्छी तरह जानते और स्वीकार करते थे कि व्यापार और फ़ौजी जीतों के दम पर स्थापित ब्रिटिश साम्राज्यवाद का लौकिक ढांचा एक न एक दिन राष्ट्रवाद और आज़ादी के आंदोलनों की चोटों से टूट कर बिखर जाएगा। लेकिन उन्हें यक़ीन था कि भाषा के मोर्चे पर किये जा  रहे उनके प्रयास ज़रूर रंग लाएंगे। अंग्रेज़ी के ज़रिये ही ब्रिटिश साम्राज्य को उसका सभ्यतामूलक आधार मिलेगा, और साहित्य और ज्ञानोत्पादन के दायरे में उसके वर्चस्व के कारण यह साम्राज्य अपने भौतिक अंत के बावजूद आने वाली सदियों में उपनिवेशित रहे लोगों के बीच जीवंत रूप से जीवित बना रहेगा।  

व्याख्यान सांस्कृतिक आर्य महिला पीजी कॉलेज में IQAC और हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया था। शोधपरक विषय 'अंग्रेज़ी का अलौकिक साम्राज्य' (Metaphysical Empire of English Language) पर उन्होंने सुदीर्घ, गंभीर और विद्वतापूर्ण वक्तव्य दिया।

इस अवसर पर भारी संख्या में छात्र छात्राएं उपस्थित रहे। इस महत्वपूर्ण आयोजन में प्रो.शार्दूल चौबे, रजिस्ट्रार, काहिविवि,पशु चिकित्सा विज्ञान से डॉ. हसीन ख़ान तथा अन्य संस्थाओं के अध्यापकों में डॉ. समीर पाठक, डॉ. वन्दना झा, डॉ. शशिकला त्रिपाठी, डॉ. आशीष कुमार आदि की सम्माननीय उपस्थिति के साथ नगर के अन्य गणमान्य जन मौजूद रहे। स्वागत प्रबंधक डॉ. शशिकांत दीक्षित और धन्यवाद ज्ञापन प्राचार्या प्रो.रचना दुबे ने किया। कार्यक्रम की रूपरेखा, संयोजन और संचालन डॉ वन्दना चौबे ने किया।

 








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