तो अब धरोहरों से मुक्त हुई भाजपा

त्रासदी , , शुक्रवार , 22-03-2019


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अंबरीश कुमार

नई दिल्ली। नब्बे के दशक में भारतीय जनता पार्टी का एक नारा चर्चा में था भाजपा के तीन धरोहर, अटल, आडवानी और मुरली मनोहर। अटल बिहारी वाजपेयी रहे नहीं। जो धरोहर पार्टी की बची हुई थी उससे पार्टी मुक्त हो गई है। अब यह पार्टी किसी की धरोहर है भी नहीं। यह मोदी-अमित शाह की पार्टी है। जैसे कभी अटल आडवानी की हुआ करती थी। मंदिर आंदोलन के नायक आडवानी ,जिन्होंने पार्टी को शिखर पर पहुंचाया था उनका टिकट पार्टी ने काटकर अमित शाह को दे दिया है। आडवानी तो नब्बे पार भी हैं। इस फैसले के समर्थक यही तर्क भी देते हैं कि इस उम्र में उन्हें क्यों टिकट दिया जाए। ठीक तर्क है।

पर जैसे कलराज मिश्र का टिकट काटने से पहले उनसे कहला लिया था कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे वैसे आडवानी से भी कहला लेते तो मंदिर आंदोलन के इस नायक की ऐसी फजीहत इस उम्र में तो न होती। आडवानी को लेकर न पार्टी में कोई सम्मान बचा है, न ही बाहर। जिन्होंने नब्बे का दशक देखा है, राम मंदिर आंदोलन को देखा है वे ही आडवानी को ठीक से जानते भी हैं। उनका रथ आगे चलता था, पीछे दंगा होता था। जो उन्होंने किया उसकी सजा उन्हें मोदी ने जिंदा रहते ही दे दी। पर यह सजा उन्हें मोदी के विरोध की मिली है। याद है न मोदी ने क्या कहा था, मैं चुन-चुन कर बदला लेता हूं। ऐसा ही कुछ। हिसाब तो उन्होंने ले ही लिया।

बताया जा रहा है कि कुछ साल पहले गोवा बैठक में आडवानी ने जो हिमाकत की थी उसका फ़ाइनल हिसाब अब पूरा हुआ है। ये आडवानी ही तो थे जिन्होंने मोदी के प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में रोड़ा अटकाना चाहा था। नतीजा, राष्ट्रपति भवन तक नसीब नहीं हुआ। एक चेले को भिजवा दिया पर आडवानी को नहीं ही जाने दिया। यह बात अलग है कि गुजरात का मुख्यमंत्री उन्हें इन्हीं आडवानी के कहने पर बनाया गया था। वाजपेयी नहीं चाहते थे फिर भी आडवानी ने दबाव डाला।

आज आडवानी ये सब याद तो कर ही रहे होंगे। ये वही आडवानी हैं जिन्होंने अटल के साथ पार्टी खड़ी की। दो सीटों पर सिमट गई पार्टी को दो सौ पार तक पहुंचाया। और आज वे खुद हाशिए पर लगा दिए गए। पार्टी के नेता डरते होंगे पर संघ को क्या हुआ है जो पार्टी के बुजुर्गों का ऐसा अपमान देख रहा है। इस जोड़ी ने स्वदेशी का बाजा बजा दिया। विदेश नीति में बुरी तरह पिट चुकी है। बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई पर कोई रोक नहीं। ऐसे में संघ का नेतृत्व क्या इतना लाचार है कि हर राजनैतिक फैसले की छूट दे सकता है।

पचहत्तर पार नेताओं को ठीक से भी तो ठिकाने लगाया जा सकता था। पर पार्टी और सरकार ने जिस तरह अपने बुजुर्ग नेताओं की अनदेखी की है उससे कोई बहुत अच्छा संदेश तो गया नहीं है। इसके अलावा स्वदेशी की बात करने वाले संघ की किस आर्थिक नीति पर सरकार चली है। यह संघ की वह सरकार है जिसका आर्थिक नियंत्रण अडानी अंबानी के हाथ में हैं। इसी सरकार के लिए संघ के तपे तपाए प्रचारकों ने भेली भूजा खाकर देश के दूर दराज के इलाकों में कई दशक तक काम किया। आज ज्यादातर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर हमला हो रहा है। सीबीआई जैसी एजेंसी का मुखिया आधी रात को हटा दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट के जज लोकतांत्रिक सवालों पर प्रेस कांफ्रेंस करते हैं ,रिजर्व बैंक नोटबंदी जैसे कदम का विरोध करता है। पर संघ का कोई नेता सवाल तक नहीं उठाता।

राफेल के सवाल पर विपक्ष ' चौकीदार चोर है का नारा दे देता है। और जवाब में मोदी सभी को चौकीदार बनाने का प्रहसन करते हैं। पता नहीं संघ के किसी नेता ने अपने को चौकीदार घोषित कर मोदी का समर्थन किया या नहीं ,पर इस सरकार से संघ की साख पर भी सवाल तो खड़े ही हो गए हैं। अभी तो भाजपा अपने धरोहरों से मुक्त हुई है, इसके बाद वैचारिक धरोहर की बारी है।

(अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं। इसके पहले तकरीबन 26 वर्षों तक एक्सप्रेस समूह से जुड़े रहे हैं।)

 








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