चुनाव आयोग की चौखट पर बैठी कैबिनेट

राजनीति , , बुधवार , 09-08-2017


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अंबरीश कुमार

देश जब 'भारत छोड़ो' आंदोलन की 75 वीं वर्षगांठ की तैयारी कर रहा था तो दिल्ली के चैनल गुजरात की तरफ थे। सत्य, अहिंसा और शुचिता का संदेश देने वाले गांधी के गुजरात में। वहां विधायकों की एक घोडामंडी सजी हुई थी। चुनाव हो रहा था और कांग्रेस के दो दल बदलू विधायक भाजपा उम्मीदवार को जिताने के लिए न सिर्फ वोट दिए बल्कि उस बैलेट को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को दिखा रहे थे। यह ऐतिहासिक घटना थी और दिन भी इतिहास का बहुत महत्वपूर्ण दिन था। पर भाजपा ने नया इतिहास रचा। दल बदल कराने के सारे हथकंडे अपनाने वाली भाजपा ने बड़ी बेहयाई से इसके समर्थन में केंद्रीय कैबिनेट के दिग्गज मंत्रियों को चुनाव आयोग की चौखट पर उतार दिया। देश का कानून मंत्री, रक्षा मंत्री और वित्त मंत्री जब विधायकों की खरीद फरोख्त को वैधानिक जामा पहनाने का प्रयास करे तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजनीति कहां पहुंच गई है। 

मोदी और अमित शाह।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल को हराने के लिए भाजपा सरकार ने हर हथकंडा इस्तेमाल किया। अमित शाह रणनीतिकार थे तो साफ़ है मोदी की सहमति से यह सब हो रहा था। कांग्रेस मुक्त भारत का नारा चरितार्थ करने के लिए। पर भाजपा तो सारे वह काम कर रही है जो कांग्रेस करती थी। फिर यह भाजपा किस तरह कांग्रेस से अलग हुई। इस पार्टी का कभी नारा हुआ करता था ' भाजपा के तीन धरोहर, अटल, आडवाणी और मुरली मनोहर। ' इसमें से कोई भी नेता आज भाजपा की पहचान माना जाता है? समूची भाजपा का कांग्रेसीकरण पिछले तीन सालों में भाजपा के शीर्ष और नए नेताओं ने कर डाला है।

तीनों जीते प्रत्याशी।

गुजरात के कांग्रेसी विधायक कोई मुफ्त में तो अपना ह्रदय परिवर्तन कर नहीं रहे थे। बाकायदा पैसा और टिकट का प्रलोभन काम कर रहा था। इन विधायकों की घोड़ामंडी राजधानी अहमदाबाद में सजी हुई थी और शंकर सिंह वाघेला जैसे दल-बदलू नेता पूरे आत्मविश्वास से अहमद पटेल की हार की भविष्यवाणी कर रहे थे। ये क्या बिना किसी सौदेबाजी के संभव था। हर विधायक की बोली लगी, टिकट का भरोसा दिया गया और यह सब किया चाल,चरित्र और चेहरा का नारा देने वाली पार्टी ने। यह पार्टी अपने को तपे तपाए कार्यकर्ताओं की पार्टी मानती रही है। यह सच भी है, भले विचारधारा अलग रही हो। 

इसके कई दिग्गज नेता सालों पूर्वोत्तर में भूजा खाकर वर्षों तक संघ का काम करते रहे, पर अब यही पार्टी गुजरात में एक-एक विधायक पर करोड़ों खर्च कर दल-बदल कराती है। और इसके कानून मंत्री बहुत ' विनम्रता' से चुनाव आयोग को धमकाते हैं ताकि विधायकों की खरीद फरोख्त को वैधानिक बनाया जा सके। यह नई भाजपा है। मोदी और शाह की। जिसका साफ़ मानना है कि जिस राज्य में चुनाव जीतेंगे वहां तो सरकार बनाएंगे पर जिस राज्य में नहीं जीते उस राज्य में तो हर हाल में सरकार बनाएंगे। मणिपुर, गोवा, बिहार जैसे उदहारण हैं। 

गांधीनगर में अमित शाह और अन्य।

ऐसे में गुजरात विधान सभा चुनाव से पहले राज्य सभा चुनाव में विपक्ष की सीट जीतने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सभी फार्मूला अपनाया गया। इससे पहले उत्तर प्रदेश में पार्टी ने पूरी बेहयाई के साथ समाजवादी पार्टी के विधायकों की अंतरात्मा को जगा चुकी है ताकि सीधे चुनाव से बचा जा सके। पर गुजरात में झटका भी लगा। इनके अपने भी गए तो नीतीश कुमार की बैसाखी भी टूट गई। भाजपा के सौदागरों से बचाने के लिए कांग्रेस विधयाकों को गुजरात से बाहर कर्नाटक जाना पड़ा। तो वहां के एक मंत्री पर धारावाहिक छापा डाला गया। सिर्फ विधायकों को तोड़ने के लिए। फिर भी कामयाबी नहीं मिली। ज्यादातर  चैनल एक सुर से भाजपा का समर्थन कर रहे थे फिर भी कामयाबी नहीं मिली। यह तो विधायकों का खुला चुनाव था। समूचा देश यह सब देख रहा था। उसका भी वोट पड़ेगा। यह ध्यान रखना चाहिए।

(अंबरीश कुमार वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ शुक्रवार के संपादक हैं। इंडियन एक्सप्रेस समूह से तकरीबन 26 सालों तक जुड़े रहे कुमार आजकल लखनऊ में रहते हैं।)










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