अम्बेडकर के बगैर बेमानी हो जाती आजादी

स्मृति , , मंगलवार , 05-12-2017


ambedkar-azadi-caste-dalit-religion-sanatan-freedom-movement

रामायण राम

6 दिसम्बर 2018 को बाबा साहब अम्बेडकर के परिनिर्वाण के बासठ बरस हो जाएंगे। अपनी मृत्यु के बासठ बरस बाद आज के भारत में बाबा साहब बहस के बीच मौजूद हैं। अपने जीवन मे उन्होंने जो कुछ भी किया उसका मूल्य उस समय भले न समझ मे आया हो लेकिन भारतीय लोकतंत्र के अपेक्षाकृत सबसे कठिन दौर में अम्बेडकर सर्वाधिक प्रासंगिक हो गए हैं। यह ऐसा दौर है जब उनके सकारात्मक अवदान की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है ठीक उसी समय उनके बारे में नकारात्मक मूल्यांकन भी चल रहा है। अम्बेडकर इतिहास के उस सीमा रेखा पर खड़े हैं जहां से प्रगतिशील शक्तियां उनके विचार को लेकर आगे बढ़ना चाहती हैं तो प्रतिगामी शक्तियां उनके अतीत का मूल्यांकन करते हुए समाज को मध्ययुगीन समय मे ले जाना चाहती हैं। सरकारी महिमामंडन को भी इसी कोशिश का हिस्सा समझना चाहिए।

बहुत सारे लोग समय-समय पर यह पूछते रहे हैं कि अम्बेडकर का आज़ादी की लड़ाई में क्या योगदान था। लोगों को प्रत्यक्ष तौर पर अंग्रेज़ी राज के दौरान अम्बेडकर जेल जाते हुए, आंदोलन करते हुए नहीं दिखते। इसलिए वे ये सवाल करते हैं। लेकिन वे लोग भूल जाते हैं कि जिस समय देश मे सविनय अवज्ञा और असहयोग जैसा आंदोलन चल रहा था उस समय अम्बेडकर दलितों के लिए सार्वजनिक तालाब से पानी पीने के अधिकार के सवाल पर आंदोलन कर रहे थे। मंदिरों में दलितों-शूद्रों के प्रवेश के सवाल पर आंदोलन कर रहे थे। और ये सभी आंदोलन स्वराज के आंदोलनों से किसी मायने में कमतर नहीं थे। बल्कि स्वराज आंदोलन के अनिवार्य घटक थे।

अम्बेडकर ने आज़ादी की लड़ाई के दौरान उन सवालों को उठाया जिनके बिना आज़ादी बेमानी हो जाती। अम्बेडकर बार-बार कहते हैं कि भारत अपने अपने आप में राष्ट्र नहीं है, यह राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है। इसलिए भारतीयों को राष्ट्र के रूप में संगठित होने के लिए जाति, धर्म और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना होगा। लेकिन अम्बेडकर की नहीं सुनी गई। इसके बावजूद अकेले पड़ जाने और मुख्यधारा से बहिष्कृत कर दिए जाने की कीमत चुका कर भी अम्बेडकर ने आधुनिक भारतीय राष्ट्र और लोकतंत्र को आकार प्रदान किया।

अम्बेडकर का जाति उन्मूलन का संघर्ष रहा हो या हिन्दू कोड बिल के जरिये स्त्री समानता का संघर्ष हो ये किसी समुदाय या फिरके के हितों का संघर्ष नहीं था। यह मूलतः भारतीय लोकतंत्र का अंतःसंघर्ष था।

अगर अम्बेडकर ने जाति उन्मूलन और विभिन्न अल्पसंख्यक वर्गों, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं, महिलाओं और दलितों के प्रतिनिधित्व का सवाल राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में न उठाया होता तो हमारे 'स्वराज' का स्वरूप क्या होता? डॉ अम्बेडकर का अंतिम सरोकार था वास्तविक और सम्पूर्ण लोकतंत्र! 

अपने अध्ययन और जॉन डीवी जैसे राजनीतिशास्त्रियों के सान्निध्य के जरिये अम्बेडकर ने विश्व के सर्वोत्तम लोकतंत्र को अनुभूत किया था। और अनुभूत ज्ञान को उन्होंने भारत की जटिल परिस्थितियों में लागू करने की कोशिश की। सच्चाई यही है कि जिस तरह का लोकतंत्र वे भारत मे चाहते थे उसका दशांश भी वे लागू नहीं करा पाए। लेकिन उनके लेखन और दस्तावेजों में मौजूद वे विचार आज की लड़ाई का मेयार हैं।

डॉ. अम्बेडकर के अलावा स्वतंत्रता आंदोलन के सभी बड़े नेता विदेशों में ही उच्च शिक्षा लेकर आये थे। लेकिन गांधी, नेहरू, लोहिया समेत तमाम नेताओं में हमे उस साहस या प्रतिबद्धता की कमी नजर आती है जो जातिगत, लैंगिक और साम्प्रदायिक आधार पर बंटे भारतीय समाज को अमूल बदल देने के लिए आवश्यक है। हिन्दू धर्म की वर्चस्वशाली संस्था से टकराने की हिम्मत अम्बेडकर के सिवाय किसी की नहीं हुई। क्योंकि अम्बेडकर खुद उसके भुक्तभोगी थे। गांधी का 'हिन्द स्वराज' हो या लोहिया और नेहरू का समाजवाद और लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा, ये सभी हिन्दू सनातनी परम्परा से टकराने की बजाय समझौते का रास्ता निकलाती हैं, जो आज के भारत की समस्याओं का मूल है।

इनके बरक्स डॉ. अम्बेडकर ने धर्म के आधार पर राष्ट्र के गठन का हमेशा विरोध किया। और संविधान में ऐसे मूल्यों और प्रावधानों को शामिल करने के लिए लड़ते रहे जो समाज के पूर्ण लोकतंत्रीकरण की जमीन तैयार करता। उन्होंने राजकीय समाजवाद की परिकल्पना के तहत जमीनों, भारी उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की बात उठाई। वयस्क मताधिकार से लेकर अल्पसंख्यकों के हितरक्षण के लिए कार्यपालिका में सर्वानुमति के सिद्धांत की वकालत की। हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग के द्विराष्ट्र के सिद्धांत के बरक्स उन्होंने पाकिस्तान के मामले में आत्मनिर्णय की बात कही और यह कहा कि आज़ाद भारत मे हिन्दू और मुसलमान दोनों को अपना-अपना अतीत और इतिहास के झगड़े भुला कर एक साथ आना होगा तभी राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त होगा।

हिन्दू कोड बिल के तहत हिन्दू महिलाओं को आज़ाद कराना स्त्री आज़ादी के साथ-साथ जाति उन्मूलन की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता था। लेकिन अम्बेडकर की योजना को कामयाब नहीं होने दिया गया। 

दलितों के लिए अल्पसंख्यक का दर्जा और उन्हें पृथक निर्वाचन का अधिकार लेने में अगर अम्बेडकर कामयाब होते तो भारतीय राजनीति और समाज की शक्ल सूरत आज कुछ और होती। वंचितों को उनका वास्तविक प्रतिनिधित्व मिलता जो किसी भी लोकतंत्र की कसौटी होता है।

कुल मिलाकर बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर का कृतित्व और विचार एक आईने की तरह है जिसमें भारतीय राष्ट्र और लोकतंत्र का  विद्रूप चेहरा साफ-साफ दिखता है। अम्बेडकर की विफलताओं में एक राष्ट्र के रूप में भारत की विफलता की महागाथा छिपी है। और आज के किसी भी जनवादी या समाजवादी वास्तविक बदलाव की लड़ाई को अम्बेडकर की विफलताओं से होकर गुजरना होगा, अम्बेडकर के अधूरे कामों को पूरा करते हुए!

(रामायण राम असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और आजकल ललितपुर में रहते हैं।)






Leave your comment