कागजों पर बने वन अधिकार को जमीन पर उतारने के लिए भूख हड़ताल पर बैठे छत्तीसगढ़ के आदिवासी

मुद्दा , , सोमवार , 03-09-2018


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तामेश्वर सिन्हा

छत्तीसगढ़/ सरगुजा। आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाने और जंगल पर उनके अधिकार को मान्यता देने के लिए बनाया गया वन अधिकार कानून छत्तीसगढ़ में दम तोड़ रहा है। प्रदेश में आदिवासियों को जंगल का अधिकार देने से सरकार मना कर रही है । आदिवासियों के अधिकारों के लिए कानून तो बने लेकिन सरकारें उसे लागू करने में विफल रही हैं। जिसके चलते आदिवासियों को अपने अधिकार के लिए आन्दोलन करना पड़ रहा है । 

वनाधिकार मान्यता कानून के तहत सामुदायिक व व्यक्तिगत वनाधिकार को मान्यता नहीं दिए जाने, एवं कई वर्षों से दावों को सरकार द्वारा लटकाए रखे जाने से व्यथित होकर सरगुजा संभाग के करीब 32 गांवों  के 600 ग्रामीण छत्तीसगढ़ वनाधिकार मंच के नेतृत्व में अंबिकापुर जिले में बीते 23 अगस्त से 16 सूत्रीय मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि सरगुजा जिले में 2012 में सामुदायिक वन अधिकार पत्र पाने का अभियान चलाकर समुदायिक पत्र पाने का दावा किया गया था, जिसमें से 38 गांवों को सामुदायिक वन अधिकार पत्र दिया गया था। लेकिन उन ग्रामीणों को वन अधिकार कानून मान्यता 2006 की धारा 3 (1) (झ)के तहत वन प्रबंधन अथवा संरक्षण से वंचित रखा गया है। ग्रामीण नियमतः ग्राम सभा में प्रस्ताव कर प्रबंधन का अधिकार का मांग किए थे। ग्रामीण पांच सालों से सरकारी महकमे से लेकर जनप्रतिनिधियों तक गुहार लगाते थक चुके थे आखिर में ग्रामीण भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं।

बतौली क्षेत्र के करदना गांव के लोगों ने बताया कि वर्ष 2013 में 170 हेक्टेयर वनभूमि का सामुदायिक अधिकार पत्र में मात्र वनोपज, चराई और निस्तार का अधिकार दिया गया, जबकि ग्राम सभा द्वारा प्रबंधन का अधिकार का प्रस्ताव पारित कर, सरगुजा कलेक्टर व आदिवासी आयुक्त से मांग की गयी, परन्तु आज तक वनों के प्रबंधन और संवर्धन का अधिकार नहीं दिया गया, जबकि ग्रामीण अपने जंगल, पहाड़ और उससे निकलने वाले पानी का प्रबंधन स्वयं कर रहे हैं।

सामुदायिक वन अधिकार को लेकर भूख हड़ताल पर आदिवासी

ग्रामीणों ने आगे बताया कि जो ग्रामीण 2005 से पहले काबिज हैं, काबिज वनभूमि का दावे के अनुरूप कम जमीन का व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र दिया गया है। जबकि कानून में अधिकतम 10 एकड़ जमीन का पत्र देने का प्रावधान है। ऐसे ही सरगुजा जिले के मुहल्ला गांव के आदिवासी ग्रामीण राम साय बताते हैं कि वे वर्षों से 5 एकड़ भूमि पर काबिज थे जिनका उन्होंने वन अधिकार मान्यता कानून के तहत दावा भी किया था लेकिन उन्हें डेढ़ एकड़ का अधिकार पत्र दिया गया। ऐसे ही कृष्णा, मोहरसाय हैं जो 5 एकड़ से ज्यादा जमीन पर काबिज थी जिन्हें एक से आधा एकड़ का मान्यता पत्र दिया गया है। ग्रामीणों की मांग में यह भी है कि जिस जगह वर्षों से ग्रामीण काबिज होकर जमीन का दावा किए हैं वहां का पट्टा न देकर दूसरी जमीन का पट्टा थमा दिया गया है। ग्रामीणों ने आगे बताया कि जिले में अभी भी वन अधिकार कानून के तहत किए गए दावों में ग्रामीणों को मान्यता पत्र नहीं दिया गया है।

सरगुजा में 2500 विशेष संरक्षित जनजातीय पहाड़ी कोरवाओं को भी वनाधिकार पत्र नहीं मिले हैं, या जिन्हें मिले हैं वह आधे-अधूरे हैं। जबकि, दो वर्ष पूर्व ही करीब 1200 परिवारों के अधीन भूमि का स्थल निरीक्षण कर नक्शा बना कर दावों को जिला स्तरीय समिति में रखा गया था। पर अब तक उन्हें अधिकार से वंचित रखा जा रहा है।

आप को बता दें कि इसी सरगुजा जिले में अडानी कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार पेसा कानून के तहत ग्राम सभा और वन अधिकार कानून की धज्जियां उड़ा रही है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला कहते हैं कि-

"वनाधिकार मान्यता कानून एक महत्वपूर्ण कानून है जिसके प्रस्तावना में यह लिखा है कि आदिवासियों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय की भूल को सुधारते हुए यह कानून बनाया गया है।"

परंतु छत्तीसगढ़ में इस क़ानून का पालन तो दूर की बात है इसके प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सरगुजा एक ऐसा जिला है जहां अडानी कंपनी के कोयला खदान के लिए कानून के परे जाकर सामुदायिक अधिकार को ही निरस्त कर दिया गया। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में लगभग 59 प्रतिशत व्यक्तिगत वनाधिकार के दावों को निरस्त कर दिया गया। सामुदायिक वन संसाधन के अधिकारों को मान्यता ही नहीं दी गई। इस कानून का मूल उद्देश्य था कि वन संसाधनों को समुदाय के हाथों में सौंपकर वन व्यवस्था का लोकतंत्रीकरण किया जाए। लेकिन राज्य सरकार की उदासीनता व कारपोरेट परस्ती में जंगलों को समुदाय को देने के बजाए अडानी, बाल्को, जिंदल जैसी कंपनी को सौंपा जा रहा है वह भी ग्रामसभाओं के विरोध को दरकिनार करते हुए।”

आदिवासियों को सरकार द्वारा दिए गए पट्टों की आंकड़ों की बात करें तो करीब 55 प्रतिशत दावों को सरकार ने रद्द कर दिया है। प्रदेश में कुल वन भूमि जिस पर मान्यता मिली 832797.80 एकड़ है, वहीं व्यक्तिगत 8,55,238 परिवार ने दावा किया था। जिसमें से 3,91,692 परिवारों को व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र मिले हैं। 31310 गांवो ने समुदायिक वन अधिकार का दावा किया था। जिसमें से 17943 गांवों को सामुदायिक वन अधिकार का आधा अधूरा अधिकार पत्र दिया गया। सरजुगा जिले में वन अधिकार पत्र आंकड़े वितरण की बात करे तो आदिवासी विभाग छत्तीसगढ़ के आंकड़े के अनुसार जिले में व्यक्तिगत दावे 50,664 परिवारों ने किए थे जिसमें से 21,410 परिवारों को अधिकार पत्र वितरित किए गए हैं। वहीं 1852 गांवों ने सामुदायिक पत्र के लिए दावे किए थे जिनमें 801 गांवों को सामुदायिक अधिकार पत्र वितरित किए गए हैं। 

आप को बताते चले कि एक ही गांव को कानून के विपरीत कई-कई बार सामुदायिक वन अधिकार के पत्र बांटे गए हैं। सामुदायिक पत्र ग्राम सभा के नाम पर मिलना चाहिए जबकि इसे बहुत बार सरपंच, ग्राम पंचायत, वन सुरक्षा समिति और अन्य कई नामों से दिया जा रहा है, जो गलत है । 

गोविन्दपुर के पहाड़ी कोरवाओं आदिवासियों ने ने सुनाई आपबीती

सरगुजा जिले अन्तर्गत विकास खण्ड बतौली के ग्राम गोविन्दपुर कोरवा बाहुल्य गांव है। जहां लगभग 100 पहाड़ी कोरवा परिवार निवास करते हैं। इनमें से कुछ परिवारों को वन अधिकार मिला है। पर उनके किये हुए दावों से काफी कम है। 19 पहाड़ी कोरवाओं का दावा ग्रामसभा के नाम से निरस्त करवाया गया, जबकि पहाड़ी कोरवा उस जमीन पर 30 साल पहले से काबिज कर मकान बाड़ी बनाकर अपने परिवार का गुजर बसर कर रहे हैं। ग्रामसभा के द्वारा निरस्त करने के 60 दिन के अन्दर पहाड़ी कोरवा एस.डी.एल.सी. सीतापुर के पास अपील किये, तथा एस.डी.एल.सी. सीतापुर के द्वारा भी दावा को निरस्त कर दिया गया जिसके बाद डी.एल.सी. सरगुजा के पास अपील किया गया। डी.एल.सी. सरगुजा ने भी दावा को निरस्त कर दिया। सभी कार्यालय से इनके दावे यह कहकर निरस्त कर दिया गया कि उक्त भूमि का दूसरे आदिवासी के नाम से पट्टा बन गया है। जबकि 30 साल पहले से पहाड़ी कोरवाओं का उस भूमि पर कब्जा है तो दूसरे आदिवासियों का पट्टा कैसे बन गया? यह जांच का विषय है लेकिन जिला प्रशासन मौन है। इस समस्या के लिये फुलेश्वरी बाई पहाड़ी कोरवा के साथ 7 पहाड़ी कोरवा अनिश्चित कालीन क्रमिक भूख हड़ताल में शामिल हुए हैं।

मांगें पूरी होने तक करेंगे भूख हड़ताल 

छत्तीसगढ़ वन अधिकार मंच के अध्यक्ष राजनाथ तिर्की ने बताया कि वर्ष 2012 में जिन गांवों को सामुदायिक वनाधिकार दे दिया गया था, वे अपने गांव के जंगल पर प्रबंधन और संरक्षण करने के अधिकार की मांग कर रहें हैं, पर जिला प्रशासन द्वारा लगातार अनसुना किया जा रहा है। सामुदायिक वनाधिकार-पत्र मिलने के बाद भी ग्रामीण अपनी क्षमता अनुसार जंगल का प्रबंधन और रक्षा कर रहे हैं। कुछ गांव ने जहां, जंगल बचाओ-बढ़ाओ समिति गठित की है, वहीं अपनी जरूरतों पर अंकुश लगाते हुए, निस्तार और वन की जरुरत को नियंत्रित किया है। बिल्मा, भूले, मारेया जैसे गांव ने पशु निस्तार का क्षेत्र निर्धारित कर उसे नियंत्रित करते हुए कड़े नियम बनाये हैं ताकि नए पौधों का विकास हो सके। इस प्रक्रिया में उन्हें गांव के भीतर व बाहर विवाद भी झेलना पड़ा, पर प्रशासन ने उनकी कोई मदद नहीं की। अब बगैर दबाव के वे आपसी विवाद और लकड़ी चोरी रोकने में सफल हो रहे हैं। सरकार आदिवासियों के अधिकारों से वंचित कर रही है हम मांग पूरी होने तक डटे रहेंगे। 

 (तामेश्वर सिन्हा अपनी जमीनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। और आजकल बस्तर में रहते हैं।)








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