हताश करते हादसे

त्रासदी , दिल्ली, शनिवार , 20-10-2018


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उपेन्द्र चौधरी

अमृतसर जैसे हादसे दरअस्ल प्रशासनिक नरसंहार हैं ! इस तरह के नरसंहार होते ही चुनी हुई सरकार और संचालित व्यवस्था को अक्सर सांप सूंघ जाता है। ज़िम्मेदारी लेने के सवाल पर या तो यह व्यवस्था सियासत की राह चल देती है या फिर जांच-पड़ताल की ओट में ज़िम्मेदार अफ़सरों,स्थानीय प्रशासन और राजनीतिक पार्टियों को थामे रखने वाले रसूखदार कार्यकर्ताओं को बचा ले जाती है। 

हर हादसे के साथ पंचायत से लेकर राज्यों और केंद्र सरकार के रवैये का यही पहलू बार-बार सामने आता रहा है। दूर-दराज के नामालूम इलाक़ों से लेकर जाने-माने नगरों-महानगरों तक में होने वाले ऐसे नरसंहारों में हर बरस हज़ारों जानें जाती हैं। प्रशासनिक लीपापोती के बीच न्याय-व्यवस्था की संवेदनहीनता भी लंगड़ाती नज़र आती है। राजनीतिक मामले में न्यायिक तत्परता जिस तरह से दिखायी पड़ती है,उसी स्तर पर इस तरह के ‘नरसंहार’ को लेकर न्यायिक सुस्ती भी साफ़-साफ़ दिखायी पड़ती है।ज्यूडिशरी सही मायने में संवेदनशील होती,तो लीपापोती के बीच न्यायिक सक्रियता दिखाते हुए बहुत पहले ही स्वतः संज्ञान ले लेती।कई मामलों में देखा गया है कि प्रशासनिक हीलेहवाली के बीच न्यायिक हस्तक्षेप से एफ़आईआर तक दर्ज हुए हैं। मगर इस तरह के हादसे अक्सर इन्क्वायरी की भेंट चढ़ती रही है। 

स्पष्ट सवाल बनता है कि आख़िर इस तरह के आयोजन का कोई आयोजक तो होगा,इतनी भीड़-भाड़ को कंट्रोल करने के लिए कोई स्थानीय-पुलिस व्यवस्था तो होगी,इस व्यवस्था के संचालन की किसी की ज़िम्मेदारी तो बनती है। होना तो यही चाहिए कि आयोजक और व्यवस्था को बनाये रखने वालों की तुरंत गिरफ़्तारी हो,उनकी सम्पत्ति ज़ब्तकर और अवकाश के बाद मिलने वाली संभावित रक़म को पीड़ितों के हवाले किया जाये,क्योंकि बेदिलों को यह भी नहीं पता कि जिन परिवारों ने अपने-अपने सदस्य खोये हैं,उनके पीछे क्या-क्या लुटा है। 

इस तरह के आयोजन के पीछे साफ़ समझ में आने वाली एक राजनीति भी होती है और एक कारोबार भी होता है।कई बार राजनीति और कारोबार का संचालन एक ही व्यक्ति करता है और कई बार अलग-अलग लोगों की मिलीभगत से इस तरह के आयोजन पूरे होते हैं।इस तरह के आयोजन को दरअस्ल आस्था और परंपरा की बुनियाद पर ही बुलंद किया जाता है। ये भव्य आयोजन,भविष्य की राजनीति करने वालों के लिए एक राजनीतिक बुनियाद बनाते हैं,तो चल रही राजनीति को रसूख देते हैं और इस आयोजन को अंजाम दिये जाने के नाम पर उगाही गयी बड़ी रक़म वाले चंदे के एक बड़े हिस्से से उनके बटुए भी भारी होते हैं।  

मगर,इस तरह के आयोजन में जो लोग शरीक़ होते हैं,वह आस्था के मासूम लोग होते हैं।अमृतसर हादसे जैसी प्रशासनिक लापरवाही में अपनी जान गंवाने वाले भी यही लोग होते हैं।

हाल के दिनों में ज़िम्मेदारों या उनके समर्थकों की तरफ़ से इस तरह के नरसंहारों को लेकर एक नयी प्रवृत्ति देखी जा रही है;वह यह कि इसके लिए नरसंहार होने वाले नागरिक ख़ुद ज़िम्मेदार हैं।  यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि उनका वर्ग और आस्था में उमड़ी इस तरह की भीड़ के वर्ग में पर्याप्त अंतर है।पहला वर्ग अपने बच्चों को कार-बाइक पर उड़ान भरवाते हुए किसी "किड्ज़निया" में ले जाने में समर्थ होते हैं। मगर यह "भीड़" अपने बच्चों को इस तरह के मेले-ठेले-हाट-बाज़ार दिखाने के लिए अपने कांधे पर लादकर ले जाने के लिए मजबूर होते हैं। मोटी रक़म की फ़ीस लगती किड्ज़निया में उनके ही पैसे से सुरक्षा और सावधानी के पर्याप्त इंतज़ामात होते हैं,लेकिन इस "भीड़" के निशुल्क एंट्री वाली रामलीला और ताज़िये में उनके लिए सुरक्षा और सावधानी को लेकर पूरा सिस्टम मुंह चिढ़ाता दिखता है।अपने एलीट चश्में से जबतक हम इस "भीड़" को देखते रहेंगे, तबतक हमें इस "भीड़" की जरूरतें और इसकी सुरक्षा दोनों ही बकवास दिखती रहेगी।

इस शहरी-क़स्बाई भीड़ की अपनी त्रासदी है। रामलीला देखनेवालों की यह भीड़, गाँव से आये उन लीगों का हिस्सा है, जिन्हें कई कारणों ने गाँव से शहर-क़स्बे में लाकर पटक तो दिया है, मगर उनका मनोविज्ञान "शहरी" या क़स्बाई नहीं बन पाया है।इनके लिए विशाल मॉल-चमकते रेस्टॉरेंट में स्पेस नहीं है और इनके बाहर जो स्पेस बचता है, वह जीने लायक नहीं है। इसलिए वे अपने लिए इस तरह के स्पेस क्रिएट करते हैं।इस तरह के आयोजन ऐसी क्रियेटेड स्पेस की मिसाल हैं। इस भीड़ की दूसरी त्रासदी कि राजनीती इस क्रियेटेड स्पेस की कई तरह की पैकेजिंग करके अपना वोट बैंक सुनिश्चित करती है।प्रशासन, जिसकी ज़िम्मेदारी ही इस तरह के हालात पर नज़र रखने की होती है, वह राजनीति की तरफ़ से मिलते इशारों से अपनी आँखें मुद लेता है।फिर सड़क जाम/मारपीट/आगज़नी/पथराव/सड़क पर पार्किंग,दुकान बोर्ड, सामान के साथ 8/10फ़ीट सड़क कब्ज़ा/करतब सब दिखने लगता है और फिर इन्हीं बेतरतीबी के बीच हादसे अपना स्पेस तलाश लेते हैं।

मगर नहीं भूलना चाहिए यही "भीड़" भारत जैसे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त है, जो सरकार और प्रशासन दोनों को घुटने पर खड़े कर देने की काबिलियत रखती है। इस भीड़ के पास पर्याप्त धैर्य है।सरकार-प्रशासन की छोटी-बड़ी लापरवाही की लम्बी श्रृंखलाओं के बाद ही इस भीड़ का सब्र जवाब दे पाता है। और फिर तो सरकारें तक बदल जाती हैं। 

एक दिन जब यह "भीड़" भी नहीं बचेगी,तब यही लोग-सरकार और यह देश अपनी संस्कृति के कमज़ोर होने और खो जाने का रोना रोयेंगे, क्योंकि यही "भीड़" रामलीला और ताज़िये जैसी संस्कृति के वाहक हैं, ये पुराने-नये संभ्रांत लोग नहीं ? यही भीड़ पर अनुशानस नहीं समझने-बुझने की तोहमत तक लगायी जाती है।मगर सड़कों पर अराजक दिखती इसी भीड़ को मेट्रो ट्रेन जैसे सिस्टम में आते ही अनुसासित होते देखा जाता है।यह इस बात का सुबूत है कि इस भीड़ को अभी तक सिस्टम में लाया ही नहीं गया है या इन्हें ध्यान में रखकर किसी सिस्टम का निर्माण ही नहीं किया गया है,क्योंकि शायद ऐसा मान लिया गया है कि सिस्टम उनके लिए है,जिनके पास सुविधाओं और फ़ैशन से लैस उपकरणों को इस्तेमाल करने की आर्थिक क्षमता है। इस बड़ी भीड़ को या तो इस सिस्टम में खपाने वाले कल-पूर्जों की तरह देखा जाता है या फिर भीड़ बनाये रखने को लेकर सोचा जाता है।सिस्टम की यह मानसिकता ही असल में अमृतसर जैसे हादसों की जड़ है। ये हादसे सही मायने में व्यवस्था से हताश करते हैं,मगर यह भीड़ है कि अपने लोकतांत्रिक हथियार से इस तरह के हादसे के पीछे के तंत्र को बदल देने की उम्मीद ज़रूर जगाती है।   

 

 








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