फौज में भर्ती के लिए आए बेरोजगारों को नक्सली बना कर पेश किए जाने के मामले में हाईकोर्ट की सरकार को फटकार

मुद्दा , रांची, शुक्रवार , 13-07-2018


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विशद कुमार

रांची। पिछले 12 जुलाई को फर्जी नक्सली सरेंडर मामले पर झारखंड हाईकोर्ट ने रघुवर सरकार को फटकार लगाने के साथ ही गृह सचिव को 7 अगस्त तक उस पर जवाब देने का आदेश दिया।

उल्लेखनीय है कि झारखंड डेमोक्रैटिक संस्था की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी जिसमें कहा गया था कि नक्सली सरेंडर के आंकड़ों को बढ़ाने के लिए बेरोजगार युवकों को नौकरी का लालच देकर फर्जी सरेंडर कराया गया। जनहित याचिका में इस फर्जीवाड़े का खुलासा किया गया था।

इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस रत्नाकर भेंगरा की बेंच ने इस मामले में राज्य सरकार के रवैये पर असंतुष्टि जतायी। कोर्ट ने रघुवर सरकार के गृह सचिव को 7 अगस्त तक जवाब देने का निर्देश जारी किया है और साथ ही कहा है कि अगर सात अगस्त तक जवाब पेश नहीं होता है, तो सरकार के गृह सचिव को हाजिर होना होगा।

बता दें कि इसस पहले पूरे मामले में केन्द्र सरकार के जवाब पर कोर्ट ने राज्य सरकार को अपना जवाब पेश करने को कहा था। याचिकाकर्ता झारखंड काउंसिल फॉर डेमोक्रेटिक के अधिवक्ता राजीव कुमार ने कोर्ट से कहा कि चार डेट दिए गए, लेकिन सरकार की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं आया। वर्ष 2019 में चुनाव होने वाला है और इस मामले से संबंधित कई अधिकारी रिटायर हो जाएंगे। राज्य सरकार की ओर से किसी प्रकार का कोई जवाब कोर्ट में पेश नहीं किया गया, जिसको लेकर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की। मामले की अगली सुनवाई 7 अगस्त को होगी।

इधर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से इस मामले में सीबीआई जांच की मांग पर विचार करने और पूरे मामले के जल्द से जल्द निष्पादन के लिए उचित आदेश पारित करने का आग्रह किया है।

क्या है पूरा मामला

उल्लेखनीय है कि राज्य पुलिस के अफसरों द्वारा नक्सली सरेंडर में आंकड़ा बढ़ाने के लिए सेना में नौकरी देने की लालच देकर 514 युवकों को फर्जी नक्सली बनने को तैयार किया गया था और जब सच्चाई सामने आई तब कलई खुलने के डर से फर्जी सरेंडर कराने वाले केस की फाइल बंद कर दी गई। 

बता दें कि रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा के भोले-भाले 514 युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने के लिए एजेंट और अफसरों ने सरेंडर करने वाले युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर लाखों रुपये वसूले थे, ताकि सरेंडर के समय उन्हें वह हथियार उपलब्ध कराया जा सके।

उल्लेखनीय है कि उन 514 युवकों को कोबरा बटालियन के जवानों की निगरानी में राजधानी की पुरानी जेल परिसर में रखा गया था और हथियार के साथ उनकी तस्वीरें भी ली गईं थी। यह सारा खेल तत्कालीन सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आइजी डीके पांडेय के इशारे पर हुआ था। वही डीके पांडेय आज राज्य के डीजीपी हैं। लिहाजा इस मामले में अब डीजीपी डीके पांडेय, एडीजी एसएन प्रधान समेत सीआरपीएफ के अन्य अफसर संदेह के घेरे में हैं।

मामले की जांच को लेकर रांची पुलिस पर लापरवाही बरतने का भी आरोप है। रांची पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस रिपोर्ट पर गौर ही नहीं किया था, जिसमें कहा गया था कि पुलिस के सीनियर अफसरों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए नक्सली सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया है। अत: इस मामले को लेकर झारखंड डेमोक्रैटिक संस्था की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी।

एनएचआरसी की रिपोर्ट में भी इस ओर इशारा किया गया है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या रांची पुलिस ने डीजीपी डीके पांडेय को बचाने के लिए लोअर बाजार थाना में दर्ज मामले की जांच का दायरा समित रखा और मामले की जांच को बंद कर दिया। क्योंकि डीके पांडेय और मुख्यमंत्री के रिश्ते की घनिष्ठता सर्व विदित है। पिछले दिनों डीजीपी डीके पांडेय ने सार्वजनिक मंच से रघुवर दास की तारीफ के कसीदे पढ़े थे।

बता दें कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि एजेंट और अफसरों ने सरेंडर करने वाले युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर लाखों रुपये वसूले थे, ताकि सरेंडर के समय उन्हें वह हथियार सहित दिखाया जा सके और फर्जी सरेंडर असली लगे।

उल्लेखनीय है कि मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने डीजी (अनुसंधान) को मामले की जांच कराने का आदेश दिया था। एनएचआरसी के उच्चाधिकारियों ने रांची आकर मामले की जांच की थी।

गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर बनायी गयी थी नक्सल सरेंडर की योजना 

एनएचआरसी की जांच में 12 तथ्य सामने आये थे, जिसकी जानकारी राज्य सरकार और गृह मंत्रालय को दे दी गई थी और आयोग ने उन 12 बिंदुओं पर सरकार से जवाब मांगा था। लेकिन सरकार के उच्चाधिकारी इस रिपोर्ट को दबाये बैठे रहे। आयोग को कोई जवाब नहीं भेजा गया। जांच के दौरान तत्कालीन आईजी स्पेशल ब्रांच एसएन प्रधान ने जांच अधिकारी को बताया था कि नक्सली सरेंडर की योजना गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर बनायी गयी थी, ताकि उन्हें मुख्य धारा में लाया जा सके। जांच में पुलिस के सीनियर अफसरों पर लगे आरोपों को सही पाया गया था। 

मानवाधिकार आयोग की जांच में सामने आए तथ्य:

• गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर पुलिस व सीआरपीएफ के अफसरों ने नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने की योजना बनायी थी। योजना पर जून 2011 से फरवरी 2013 तक काम किया गया। 

• पुलिस अफसरों की ओर से रवि बोदरा को यह काम सौंपा गया था कि वह सरेंडर करने वाले नक्सलियों को लाये।

• सीआरपीएफ व सेना में नौकरी पाने के लालच में युवकों ने जमीन व मोटरसाइकिल बेच कर रवि बोदरा और दिनेश प्रजापति को पैसे दिये। दोनों ने युवकों से कहा था कि नक्सली के रूप में सरेंडर करने पर नौकरी मिलेगी।

• निर्दोष युवकों को नक्सली बता कर नौकरी दिलाने के नाम पर सीआरपीएफ अफसरों के सामने सरेंडर कराने का आरोप सही।

• युवकों को पुरानी जेल में सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन की निगरानी में रखा गया। युवकों के रहने और खाने का खर्च सरकार ने उठाया। जांच में जब सीनियर अधिकारियों ने पाया कि सिर्फ 10 युवक ही नक्सली गतिविधियों से संबंधित हैं, फिर भी अन्य को फंसाये रखा गया। कोर्ट में पेश नहीं किया गया था, इसलिए कानून तरीके से यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्हें जेल में रखा गया था। युवकों को अवैध रूप से रखने के लिए सीआरपीएफ व पुलिस के सीनियर अफसर दोषी हैं।

• युवकों को अवैध रूप से कब्जा में नहीं रखा गया था, पर यह स्पष्ट है कि इस अवधि में युवकों के आजीविका का नुकसान हुआ।

• पुराने जेल परिसर में 514 युवकों की जांच में किसी के भी नक्सली होने या उससे संबंध होने की बात सामने नहीं आयी। युवकों को एक साल तक पुरानी जेल में रखा गया।

• कोबरा बटालियन के अधिकारियों की अनुमति से युवकों को बाहर जाने और आने की अनुमति दी गयी थी।

• जेल परिसर में रखे गये युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर सरकार द्वारा नियुक्त और पुलिस अधिकारियों ने पैसे लिये।

• रवि बोदरा और दिनेश प्रजापति ने इन युवकों को सेना या अन्य पुलिस बलों में नौकरी दिलाने के नाम पर ठगा।

• युवकों को जेल परिसर में रखने के लिए सरकारी अधिकारियों ने नियम का पालन नहीं किया।

(विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)








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