पूर्ण नागरिकता से जुड़ा है दिल्ली पूर्ण राज्य का मामला

इंसाफ की मांग , , शनिवार , 30-06-2018


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विष्णु राजगढ़िया

आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पूर्ण राज्य का अभियान शुरू किया है। पहली जुलाई को सम्मेलन में इसकी घोषणा होगी। पार्टी कार्यकर्ता दस लाख घरों में जाकर अरविंद केजरीवाल का पत्र सौंपेंगे। बताया जाएगा कि दिल्ली अलग राज्य होने से क्या लाभ हैं। नागरिकों के हस्ताक्षर लेकर प्रधानमंत्री को भेजे जाएंगे।

आम आदमी पार्टी के आक्रामक तेवर ने कांग्रेस और भाजपा, दोनों को संकट में डाल दिया है। दोनों पार्टियां पहले दिल्ली पूर्ण राज्य की बात करती थीं। लेकिन आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की 70 में 67 सीटें हासिल कर ली। 

इससे डरी हुई कांग्रेस और भाजपा दोनों ने दिल्ली अलग राज्य का मुद्दा त्याग दिया है। देश भर में एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी दोनों पार्टियां दिल्ली में आप के खिलाफ एकजुट दिखती हैं। इसका एकतरफा लाभ आम आदमी पार्टी को मिल रहा है।

दिल्ली पूर्ण राज्य का मामला प्रशासनिक नहीं है। यह दिल्ली वालों के पूर्ण नागरिक होने का भी मामला है। यह सच है कि भारतीय संविधान में दो तरह की नागरिकता की व्यवस्था नहीं। सिद्धान्ततः सभी नागरिक पूर्ण या समान नागरिक ही माने जाएंगे। लेकिन व्यवहार में कई चीजें उसे अपूर्ण या दोयम नागरिक बनाती हैं। 

यह बात सुनने भी कितनी भी बुरी लगे, लेकिन इसका अर्थ वही समझेगा, जिसे 'पूर्णता' की अवधारणा मालूम हो। स्वतंत्र चेतना वाले लोग किसी खास वर्ग, समुदाय के दोयम दर्जे का मतलब समझते हैं। 

जैसे, सीमोन द बोउवार की प्रसिद्ध पुस्तक 'द सेकंड सेक्स' में बताया गया है कि महिलाओं को समाज में किस तरह दोयम दर्जा मिला है। 'यत्र नारी पूज्यन्ति' जैसे श्लोक तक सीमित लोग इस बात को कभी नहीं समझ पाएंगे। 

इसी तरह, समाज के विभिन्न वंचित समुदायों के दोयम दर्जे के नागरिक होने के कई रूप दिख जाएंगे। भाषा और धर्म के आधार पर, शिक्षा और आय के आधार पर, कई कारणों से हम किसी समूह की दोयम हैसियत देख सकते हैं।

आइए, देखें कि पूर्ण राज्य के अभाव में दिल्ली का नागरिक किस तरह दोयम दर्जे की नागरिकता रखता है।

विधानसभा सत्र के दौरान पटना, लखनऊ, रांची, भोपाल जैसे शहरों में विधायक आवास के आसपास जाएं। वहां मेला जैसा दृश्य दिखेगा। राज्य के दूरदराज के आम लोग अपने विधायक से मिलकर तरह-तरह के मुद्दों को सदन में उठवाते नजर आएंगे। इन राज्यों के नागरिक राजनीतिक तौर पर खुद को काफी सक्षम पाते हैं। किसी भी विषय पर तत्काल गर्व के साथ कहते हैं कि इसे हम विधानसभा में उठवा देंगे।

लेकिन दिल्ली के नागरिक इतने सक्षम नहीं है। वे अपने विधायक के माध्यम से यह नहीं पूछ सकते कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या कितनी है! दिल्ली के नागरिक अपने विधायक के माध्यम से सरकार से यह सवाल नहीं कर सकते कि पुलिस के रिक्त पदों पर नियुक्ति क्यों नहीं हो रही?

दिल्ली विधानसभा के विगत सत्र में नागरिकों और विधायकों को ऐसे सवालों का जवाब नहीं मिला। संबंधित अधिकारियों ने विधानसभा में आने की जरूरत तक महसूस नहीं की। विधायकों के सवाल का दोटूक जवाब थमा दिया कि ऐसे विभाग LG के अधीन आते हैं। अधिकारियों ने साफ कहा कि हम विधानसभा को जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हैं। यहां तक कि विधानसभा के अध्यक्ष द्वारा बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद अधिकारी नहीं आए। 

स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति और थानों में पुलिस बल की नियुक्ति जैसे सर्विसेस के मामले एलजी के अधीन हैं। 

इसी तरह, जमीन से जुड़ा कोई सवाल हो तो दिल्ली का नागरिक अपने विधायक के माध्यम से इसे विधानसभा में नहीं उठा सकता। राजस्व विभाग भी एलजी के पास है। एलजी खुद को ईश्वर से ऊपर समझते हैं।

दिल्ली का नागरिक अपूर्ण कैसे है, इसे समझने के लिए किसी लंबे चौड़े सिद्धांत की आवश्यकता नहीं। लोकतंत्र की मामूली सामान्य परिभाषा है- 'जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन।' 

इसे जनप्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए लागू किया गया है। नागरिक अपना प्रतिनिधि चुनते हैं। उस प्रतिनिधि के माध्यम से शासन-प्रशासन को जवाबदेह बनाते हैं। लेकिन अगर विधानसभा में विधायकों को जवाब ही ना मिले, तो नागरिक की हैसियत ही क्या रह जाएगी?

यही कारण है कि दिल्ली के नागरिकों को एनसीआर के गुड़गांव या नोएडा के नागरिक की तुलना में कम लोकतांत्रिक हैसियत वाले नागरिक के तौर पर देखा जाता है। 

दिल्ली पूर्ण राज्य हो, तो ऐसे सभी विभाग राज्य सरकार के अंतर्गत आएंगे। उनसे संबंधित मामलों पर नागरिक अपने जनप्रतिनिधियों के माध्यम से सवाल पूछ सकेंगे। इस तरह, जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन की परिकल्पना को साकार कर सकेंगे। तभी दिल्लीवाले पूर्ण नागरिक कहलाएंगे।

यह मूलतः लोकतंत्र में नागरिक की राजनीतिक हैसियत से जुड़ा विषय है। इसके अलावा, टैक्स में मिला हिस्सा तथा विकास के सवाल भी गंभीर हैं। दिल्ली के नागरिकों द्वारा टैक्स के रूप में दी जाने वाली भारी भरकम रकम की तुलना में वापस मिलने वाली राशि बेहद मामूली है। इसके आंकड़ों में हम यहां नहीं उलझेंगे। लेकिन इतना तय है कि दिल्ली पूर्ण राज्य हुआ, तो यहां के नागरिकों केंद्र से बड़ी रकम वापस मिलेगी। अरविंद केजरीवाल ने तो यहां तक कह डाला कि उस पैसे से हर दिल्ली वाले का पक्का मकान बन जाएगा।

जाहिर है, इस अभियान ने आम आदमी पार्टी को राजनीतिक तौर पर जबरदस्त बढ़त दी है। अलग राज्य और स्वायत्तता के मामले हमेशा से जन-आंदोलन और दबाव के जरिए ही हल हुए हैं। हर शासक ऐसी मांगों के प्रति नकारात्मक रवैया रखता है। लेकिन जन-आकांक्षाएं खत्म नहीं होती, बढ़ती जाती हैं। 

याद करें, जब अलग झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना वगैरह की मांग उठती थी, तो शुरुआत में कांग्रेस और भाजपा तीखा विरोध करती थी। आंदोलन तेज होने पर, जनता का मूड भांपकर कांग्रेस और भाजपा ने प्रकारांतर से ऐसे आंदोलनों का समर्थन किया। 

दिल्ली का मामला थोड़ा दिलचस्प है। यहां कांग्रेस और भाजपा पहले पूर्ण राज्य की मांग करती थी। उनके चुनाव घोषणापत्रों में भी यह बात साफ दिखेगी। 2014 में तो भाजपा ने ऐसा माहौल बनाया, मानो दिल्ली पूर्ण राज्य बस बनने ही वाला है। डॉक्टर हर्षवर्धन ने तो लगभग घोषणा ही कर दी थी।

लेकिन आम आदमी पार्टी ने जब दिल्ली में सुशासन और नई राजनीति का प्रयोग शुरु किया, तो कांग्रेस और भाजपा दोनों में ही भय का माहौल उत्पन्न हुआ। दोनों ने इस मामले में जुगलबंदी करते हुए दिल्ली पूर्ण राज्य के खिलाफ स्टैंड ले लिया। केंद्र सरकार ने दिल्ली सरकार के पास पहले से मौजूद कई महत्वपूर्ण अधिकार छीन लिए। एलजी के पद पर नकारात्मक और बेगैरत लोगों की नियुक्ति करके यह सुनिश्चित किया कि दिल्ली सरकार कोई सकारात्मक काम न कर सके। हर मामले में अड़ंगा लगाने के लिए नौकरशाहों के एक समूह को तैयार किया गया। जो अधिकारी आम आदमी पार्टी के प्रति सकारात्मक रवैया रखते थे, उन्हें आतंकित किया गया। मुख्य पदों पर ऐसे व्यक्तियों को बिठाया गया, जो दिल्ली सरकार के हर प्रगतिशील कदम में नकारात्मक रवैया अपनाए। 

इस क्रम में दिल्लीवालों को यह समझना आसान हो गया कि दिल्ली के सर्वांगीण विकास के लिए पूर्ण राज्य होना क्यों जरूरी है।

अन्य राज्यों में देखें, तो राज्य सरकार काफी सक्षम होती हैं। किसी भी विषय पर बड़ा निर्णय लेने, किसी काम निविदा सामान्य नियमों को छोड़कर कैबिनेट की मंजूरी लेकर नामांकन के आधार पर देने में सक्षम होती हैं। जिसे चाहे, जिस पद पर नियुक्त कर सकती है और कोई भी योजना तत्काल लागू कर सकती है।

लेकिन दिल्ली में सुशासन के नए प्रयोगों में सरकार को हर कदम पर बाधा आई। मोहल्ला क्लीनिक, सीसीटीवी, राशन की डोर स्टेप डिलिवरी तक में बाधा आई। 

यह हमारे देश के संघीय ढांचे के खिलाफ है। ऐसा कभी नहीं होगा कि केंद्र और सभी राज्यों में किसी एक ही दल की सरकार हो। भारत जैसे विविधता वाले देश में अलग-अलग सरकारों का होना जरूरी भी है, और स्वाभाविक भी। लिहाजा, अगर केंद्र सरकार तथा उसके द्वारा नियुक्त किसी अक्खड़ नौकरशाह के पास निरंकुश शक्तियां हों, तो यह लोकतंत्र के हित में नहीं है। 

यह बात केजरीवाल के विरोधी भी मानते हैं कि आम आदमी पार्टी देश में एक नई किस्म की राजनीति कर रही है। यह मौजूदा व्यवस्था में सुधार की एक प्रक्रिया है। जो लोग इस व्यवस्था की गड़बड़ियों को लेकर चिंतित रहते हैं, उन्हें समझना होगा कि इन समस्याओं की जड़ में नौकरशाही का ब्रिटिशकालीन ढांचा और वही मानसिकता है। अगर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार इस व्यवस्था में कोई परिवर्तन लाना चाहे, तो उसे नौकरशाही की पुरानी मानसिकता से टकराना ही होगा। लेकिन अगर नौकरशाही पर दिल्ली सरकार का नियंत्रण ना हो, उलटे केंद्र और LG द्वारा राजनीतिक कारणों से नौकरशाहों को शह देकर दिल्ली सरकार को परेशान करने की कोशिश की जाए, तो इसमें यथास्थितिवाद की शक्तियों का पूरा सहयोग मिलना स्वाभाविक है। 

दिल्ली का संकट यही है। वरना एक मामूली नौकरशाह से तुर्रम खां बने आदमी ने ऐसी गुस्ताखी नहीं की होती, जो चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मिलने से मना कर दे।

अरविंद केजरीवाल अपने तीन मंत्री के साथ एलजी से मिलकर जिस समस्या का समाधान करना चाहते थे, उस पर सकारात्मक और सहयोगी रवैया अपनाना एलजी का कर्तव्य था। इसी बात के लिए उन्हें एलजी बनाया गया है। इसी बात के लिए उन्हें वेतन, नौकर-चाकर, बंगला-गाड़ी वगैरह सुविधा मिली है। 

लेकिन एलजी ने अपना कर्तव्य नहीं निभाया। तब अरविंद केजरीवाल तथा मंत्रियों ने यह समझकर उन्हीं के वेटिंग रूम में सत्याग्रह प्रारंभ किया होगा कि घंटे, दो घंटे में एलजी को अपने दायित्व का एहसास होगा और वह अधिकारियों को दिल्ली सरकार के साथ सहयोगी रवैया अपनाने का निर्देश देंगे।

लेकिन एलजी को मानो किसी बात की परवाह ही नहीं। यह लोकतंत्र तो नहीं ही है, तानाशाही का भी सबसे घटिया रूप है। 

एलजी के इस अलोकतांत्रिक रवैये का विस्तार तब देखा गया, जब दिल्ली में 17000 पेड़ काटने के मामले में केंद्रीय मंत्री के साथ उन्होंने खुद ही बैठक कर ली। इसमें दिल्ली की जनता के प्रतिनिधि के तौर पर आप सरकार के वन पर्यावरण मंत्री इमरान हुसैन को बुलाना गरिमामय, व्यावहारिक और लोकतांत्रिक होता। लेकिन केंद्र तथा एलजी की कोशिश हर मामले में दिल्ली को नीचा दिखाने की है।इस बात के साफ संकेत हैं कि दिल्ली में मिली बड़ी हार से नरेंद्र मोदी बेहद आहत हैं। वरना चार राज्यों के मुख्यमंत्री जब उनसे नीति आयोग की बैठक के दौरान मिलकर दिल्ली का हल निकालने की गुजारिश करते हैं, तो इस पर भी मोदी जी की चुप्पी दिखती है। यह कैसे संभव है कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री एक सप्ताह तक सत्याग्रह पर हो और उस विषय का हल करने में प्रधानमंत्री कोई दिलचस्पी नहीं है। आखिर कैसा लोकतंत्र है? किसी भी आंदोलन की शक्तियों से बात करने के लिए सरकार तैयार दिखती है। हरदम कहा जाता है कि हम बातचीत के जरिए रास्ता निकालने के लिए तैयार हैं। 

लेकिन दिल्ली में शिक्षित नागरिक समूह के तर्कसंगत मुद्दों काहल करने के लिए भी केंद्र सरकार बातचीत को तैयार नहीं हुई। ऐसा करके केंद्र ने ऐतिहासिक तौर पर अपनी छुद्रता का एक गलत उदाहरण प्रस्तुत किया। साफ़ बताया कि केंद्र सरकार दिल्ली को एक लाचार राज्य बना कर रखना चाहती है।

अगर दिल्ली पूर्ण राज्य होता, तो केंद्र के लिए इतनी मनमानी संभव नहीं थी। यही कारण है कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली पूर्ण राज्य को जन आकांक्षाओं से जोड़ दिया है। अब तक तो कोई शासक ऐसी जन-आकांक्षाओं को कुचल नहीं पाया है। दिल्ली में क्या होगा देखना बाकी है।

(विष्णु राजगढ़िया वरिष्ठ पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता हैं।)


 








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