घाव को नासूर में न बदल दे सरकार की अविचारित आक्रामकता

मुद्दा , , बृहस्पतिवार , 09-08-2018


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डॉ राजू पाण्डेय

विगत कुछ दिनों से आम जनता के मन में यह स्थापित करने की चेष्टा की जा रही है कि असम और अन्य राज्यों में भी नागरिकता रजिस्टर के निर्माण से घुसपैठिए चिन्हित हो जाएंगे और देश आतंकवाद के खतरे से सुरक्षित एवं आर्थिक रूप से सशक्त हो जाएगा। षड्यंत्रपूर्वक देश की जनसंख्या की स्वाभाविक संरचना को प्रभावित करने वाले घुसपैठिए न केवल हमारे प्राकृतिक- आर्थिक संसाधनों का मनमाना उपभोग कर रहे हैं बल्कि देश को अस्थिर करने वाली ताकतों के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं। इस प्रकार का विश्लेषण सनसनीखेज और चौंकाने वाला होने के कारण आकर्षित भी करता है और बिना तर्क वितर्क के स्वीकार्य भी बन जाता है। हो सकता है कि राजनीतिक लाभ के लिए इस प्रकार का परसेप्शन बनाया जा रहा हो किन्तु जब ऐसा लगने लगता है कि सरकार भी न केवल इस परसेप्शन को हवा दे रही है बल्कि इसके आधार पर देश की आंतरिक सुरक्षा और विदेश नीति जैसे महत्वपूर्ण विषयों में बुनियादी परिवर्तन लाने का विचार कर रही है तब इस परसेप्शन का रियलिटी चेक करना जरूरी हो जाता है।

असम में बाहरी लोगों का आना कोई नई अथवा चौंकाने वाली परिघटना नहीं है। जब असम को अंग्रेजों द्वारा 1826 में बंगाल प्रेसीडेंसी में सम्मिलित किया गया तो पहली बार मध्य भारत से श्रमिक यहां के चाय बागानों में कार्य करने हेतु लाए गए थे। असम में कृषि के विस्तार के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध थी जबकि पड़ोसी बंगाल में लोग दुर्भिक्ष की मार झेल रहे थे। उनका असम की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था।

इसी प्रकार जूट का उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी किन्तु बंगाल में इसके लिए अब भूमि उपलब्ध नहीं थी। अंग्रेजों ने बंगाल के श्रमिकों को असम में बसाकर जूट की खेती प्रारम्भ की। पूर्वी बंगाल के मुस्लिम कृषक बड़ी संख्या में असम आने लगे।

बीसवीं सदी के प्रथम तीन दशकों में असम की मुस्लिम आबादी 13.6 प्रतिशत से बढ़कर 22.8 प्रतिशत हो गई। अंग्रेजों द्वारा 1920 में लाइन सिस्टम लागू कर पूर्वी बंगाल के मुसलमानों और स्थानीय आदिवासियों के मध्य अविश्वास और विवाद की काल्पनिक रेखा खींच दी गई। 1939 में सैयद मुहम्मद सादुल्लाह की प्रांतीय सरकार ने अधिक अन्न उपजाओ योजना के अधीन पूर्वी बंगाल के मुसलमानों को असम में बसने का न्यौता दिया। भारत विभाजन के बाद हुए दंगों के कारण 1947 से 1950 की अवधि में असम से भारी संख्या में मुसलमानों ने पूर्वी पाकिस्तान को पलायन किया किन्तु नेहरू-लियाकत अली खान समझौते ने दोनों देशों के शरणार्थियों को 31 अगस्त 1950 तक अपने अपने देशों में वापस आने का अवसर दिया।

भारत विभाजन के पहले से ही बेहतर जीवन दशाओं की तलाश में मुसलमान पूर्वी बंगाल से यहां आते रहे। ये मेहनतकश लोग कभी इस देश के तो कभी उस देश के नागरिक बने। राष्ट्रों की नई सीमाएं नए कानूनों से आबद्ध थीं इसलिए ये अवैध आप्रवासी भी बने और घुसपैठिए भी। राजनेताओं की बदलती प्रतिबद्धताओं के आधार पर कभी इनके प्रवेश को प्रोत्साहित किया जाता रहा और इनसे अपने अनुकूल वोटर गढ़ने का अभियान चलाया जाता रहा तो कभी इन्हें कट्टर इस्लामिक आतंकवादी की भांति प्रस्तुत कर राष्ट्रव्यापी हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा। लेकिन ये हैं वही गरीब तबके के लोग-  जो पेट की आग बुझाने के लिए काम की तलाश में यहां-वहां, देश-देश भटकते रहते हैं और जिन्हें हर जगह तिरस्कृत किया जाता है।

इनके पलायन के पीछे ऐसी कोई सुनियोजित रणनीति तलाशना अनुचित है जिसे मुस्लिम आबादी के साजिशपूर्ण स्थानांतरण द्वारा हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाकर इस्लामिक राष्ट्र के निर्माण के तथाकथित अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का एक भाग माना जा सके। यह मुसलमान इसलिए असम में आते रहे क्योंकि बांग्लादेश के सीमावर्ती भागों की आर्थिक बदहाली ने इन्हें अपनी उस पुरानी शरणस्थली में रोजगार तलाशने के लिए बाध्य कर दिया जो अब किसी अन्य देश की सीमा के भीतर थी और जहां इनका प्रवेश वर्जित था। 

बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष की शुरुआत से लेकर हाल के वर्षों तक मुसलमान बड़ी संख्या में असम आए। इनकी जनसंख्या वृद्धि दर देश में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर से बहुत अधिक थी। असम की जनसंख्या की संरचना इससे बदलने लगी। स्थानीय जनजातीय मूल निवासी स्वाभाविक रूप से यह अनुभव करने लगे कि बाहर से आने वाले लोग स्थानीय संसाधनों पर कब्जा कर रहे हैं और स्थानीय लोगों पर आधिपत्य स्थापित कर रहे हैं।कालांतर में स्थानीय निवासियों और आप्रवासियों के मध्य हिंसक संघर्ष की स्थिति बनती है। यह लोग देश की स्थानीय आबादी में इस तरह घुल मिल जाते हैं कि यह पहचानना कठिन हो जाता है कि ये पश्चिम बंगाल या अन्य किसी बंगलाभाषी जनसंख्या बहुल प्रदेश के निवासी न होकर बांग्लादेशी हैं। 

अवैध अप्रवासियों द्वारा आर्थिक संसाधनों को लूट कर अपने देश में भेजे जाने की धारणा भी तर्क की कसौटी पर कसे जाने योग्य है। भौगोलिक नजदीकी, ऐतिहासिक सम्बन्ध, आसानी से पार करने योग्य सीमा और भारी संख्या में समुचित दस्तावेजों के बिना रहने वाले आर्थिक आप्रवासी- बांग्लादेश और भारत के आर्थिक रिश्ते को निर्धारित करते रहे हैं।

विश्व बैंक के बाईलेटरल रेमिटेंस मैट्रिक्स 2014 के अनुसार भारत से बाहर भेजे जाने वाले आउटवर्ड रेमिटेंसेस (भारत में रहने वाले विदेशियों द्वारा अपने देश को भेजा जाने वाला धन) का 54 प्रतिशत केवल बांग्लादेश को जाता था। यही ट्रेंड कमोबेश आज भी बरकरार है। विश्व बैंक के माइग्रेशन एंड रेमिटेंस आउटलुक रिपोर्ट 2018 के अनुसार बांग्लादेश को मिलने वाले कुल इनवर्ड रेमिटेंसेस (बांग्लादेश के विदेशों में रह रहे नागरिकों द्वारा अपने देश को भेजा जाने वाला धन) का 30 प्रतिशत भाग भारत से प्राप्त होता है।

जबकि भारत से बाहर जाने वाले आउटवर्ड रेमिटेंसेस का 71 प्रतिशत भाग बांग्लादेश को जाता है। इसमें एक बड़ा भाग उन भारतीय कंपनियों द्वारा अपने बांग्लादेशी कर्मचारियों के वेतन तथा अन्य नकद लाभ एवं भौतिक सुविधाओं आदि के रूप में खर्च की जाने वाली राशि के रूप में है जिनकी बांग्लादेश में शाखाएं हैं अथवा बांग्लादेशी कंपनियों के साथ संयुक्त उद्यम हैं। भारतीय कंपनियों ने कई बांग्लादेशी कंपनियों को खरीदा भी है। इनवर्ड रेमिटेंस और आउटवर्ड रेमिटेंस के आंकड़े केवल यह दर्शाते हैं कि किसी देश के विदेशों में कार्यरत लोगों का उस देश की अर्थव्यवस्था में क्या योगदान है। भारत के एनआरआई भारी पैमाने पर धन भारत भेजते हैं और हम विश्व में सर्वाधिक इनवर्ड रेमिटेंस प्राप्त करने वाले देश हैं। 

जो वैध- अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी भारत में लाखों की संख्या में हैं उनमें से अधिकांश मामूली दिहाड़ी पर काम करने वाले अकुशल तथा अर्द्धकुशल श्रमिकों या छोटे मोटे धंधों के मालिकों के रूप में हैं जिनकी कमाई बस घर चलाने के लिए पर्याप्त होती है। इसके अलावा इन्होंने बांग्लादेश से एक प्रकार से अपना रिश्ता ही तोड़ लिया है और भारत के होकर रह गए हैं। ये किसी न किसी प्रकार उत्पादन के कार्य से जुड़े हुए हैं। ऐसा नहीं है कि स्मगलिंग, नकली करेंसी के फैलाव, मानव तस्करी और दूसरे गैर कानूनी धंधों में  अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी बिल्कुल नहीं हैं किंतु अपराध से जुड़ी बड़ी मछलियों की  बजाए  छोटी मछलियों को पकड़ा जाता है जो भय या दबाव के कारण इन संगठित अपराधी गिरोहों से जुड़ी होती हैं।

 

  • इस प्रसंग में  कई महत्वपूर्ण प्रश्न अनुत्तरित हैं। सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि क्या उसका दृष्टिकोण असम के बांग्लादेशी अप्रवासियों के संबंध में वैसा ही है जैसा प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 के चुनावों के दौरान असम की एक सभा(22 फरवरी 2014) में व्यक्त किया था। उनके अनुसार बांग्लादेश से दो तरह के लोग भारत आते हैं- एक शरणार्थी ( जो वहां की सरकार द्वारा सताए गए हिन्दू होते हैं) और घुसपैठिए (जो नियमों का उल्लंघन कर गलत इरादों से प्रवेश करने वाले मुसलमान होते हैं)। इसी दृष्टिकोण के अनुरूप सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 पेश किया गया।
  • यह संशोधन विधेयक प्रस्तावित करता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यक समुदायों(हिन्दू, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, जैन) को नागरिकता अधिनियम 1955 की अवैध प्रवासी की परिभाषा से बाहर किया जाए। इस प्रकार अब पड़ोसी देशों से भारत आने वाले मुसलमान ही अवैध अप्रवासी होंगे। विधेयक यह भी प्रस्तावित करता है कि पड़ोसी देशों से आने वाले गैर मुस्लिम अब ग्यारह के स्थान पर केवल छह वर्ष भारत में निवास करने के बाद नागरिकता हेतु आवेदन कर सकेंगे। यह विधेयक अभी एक संयुक्त संसदीय समिति के पास है। यदि यह वर्तमान स्वरूप में पास भी हो गया तो भी धर्म के आधार पर भेद करने के कारण सुप्रीम कोर्ट इस पर रोक लगा सकता है।

 

सरकार का यह दावा कि वे चालीस लाख बांग्लादेशी शरणार्थियों को निकाल बाहर कर देंगे, बहुत हास्यास्पद है। देश में शरणार्थियों से सम्बंधित कानूनों का सर्वथा अभाव है। सरकार द्वारा 1983 में पारित इललीगल माइग्रेंटस डिटरमिनेशन बाय ट्रिब्यूनल एक्ट बेअसर रहा और सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी इसे 2005 में अनुचित पाया गया। असम समझौते के आधार पर यदि 25 मार्च 1971 या उसके बाद आने वाले विदेशी नागरिकों की पहचान हो भी गई तब भी इन्हें अपने मूल देश भेजने के लिए फॉरेनर्स एक्ट 1946 की सहायता लेनी होगी। बांग्लादेश इतनी अधिक संख्या में अवैध रूप से बांग्लादेशियों की भारत में उपस्थिति से भी साफ इनकार करता रहा है। उसके द्वारा अपने नागरिकों को भारत में अवैध रूप से घुसने से रोकने के भी कोई उपाय नहीं किए गए हैं। इसके विपरीत बांग्लादेश सरकार यह कहती रही हैं कि करीब 5 से 10 लाख भारतीय अवैध रूप से बांग्लादेश में रह रहे हैं और इनके द्वारा 10 बिलियन डॉलर हुंडी आदि के जरिए वर्ष 2017 में ही भारत भेजे गए हैं। अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर रहे बांग्लादेशियों को सुरक्षा बलों द्वारा वापस खदेड़ने की कोशिशें कानूनी वैधता नहीं रखतीं और सुरक्षा बलों पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगाए जाते रहे हैं। सभी पड़ोसी देशों में भारत की सर्वाधिक लम्बी सीमा बांग्लादेश के साथ है। 4096 किलोमीटर लंबी यह सीमा पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम से होकर गुजरती है। इसे कटीले तारों से घेरने की वाजपेयी सरकार के समय से प्रारंभ हुई कोशिश अनाधिकृत प्रवेश को रोकने में नाकाम रही है।

 

  • भारत यूनाइटेड नेशन्स 1951 कन्वेंशन रिलेटिंग टू द रिफ्यूजीज़ तथा इसके 1967 प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। भारत यूनाइटेड नेशन्स हाई कमिश्नर फ़ॉर रिफ्यूजीज़ तथा इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फ़ॉर माइग्रेशन की सलाह और सहायता लेने से भी संकोच करता रहा है। भारत सरकार के सम्मुख शरणार्थी कानून के निर्माण के लिए अनेक मसौदे मौजूद हैं। यूएनएचसीआर द्वारा 1994 में गठित 5 सदस्यीय एमिनेंट पर्सन्स ग्रुप ने 1997 में मॉडल रिफ्यूजी लॉ तैयार किया था। इसके बाद इस ईपीजी ने साउथ एशिया डिक्लेरेशन ऑन रिफ्यूजीज़ भी तैयार किया।
  • यूएनएचसीआर में कार्य कर चुके शशि थरूर ने दिसंबर 2015 में द एसाइलम बिल प्रस्तुत किया। इन्हें आधार बनाकर सरकार कोई परिपूर्ण शरणार्थी कानून बना सकती है। किंतु बहुत से विशेषज्ञ यह मानते हैं कि ये कानून शरणार्थियों के मानवाधिकारों की रक्षा अधिक करते हैं और देश की सुरक्षा के संबंध में अपेक्षित गंभीरता का इनमें अभाव है। अमेरिका और अनेक यूरोपीय देशों में मौजूदा शरणार्थी कानूनों को शरणार्थियों के लिए हितकारी किन्तु राष्ट्र के लिए घातक मानकर बदलने का उपक्रम चल रहा है। सम्भवतः हमारी सरकार का भी यही दृष्टिकोण है।

 

यदि इस समस्या को सचमुच हल करना है तो भारत और बांग्लादेश के मध्य सर्वप्रथम द्विपक्षीय समझौता होना आवश्यक है। जब तक दोनों देश इस समस्या को स्वीकारेंगे नहीं तब तक शरणार्थियों की पहचान और उन्हें वापस लेने की प्रक्रिया कैसे प्रारंभ हो सकेगी। अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी निश्चित ही देश की कानून व्यवस्था और अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती हैं किंतु ये आतंकवादी अथवा आदतन अपराधी नहीं हैं।  इस जटिल समस्या को धार्मिक रंग देकर वोटों की राजनीति अवश्य हो सकती है। किन्तु यह रणनीति देश के लिए आत्मघाती सिद्ध होगी और इस समस्या को एक नासूर में बदल देगी। इसी प्रकार धार्मिक रूप से कट्टर देशों में यदि हिंदुओं के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव कर उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है तो यह निंदनीय है और इसे रोका जाना चाहिए किन्तु भारत में मौजूद अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने से इन हिंदुओं की दशा नहीं सुधरेगी बल्कि उन्हें और दमन झेलना पड़ सकता है।

                        (डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र पत्रकार हैं और छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)

 








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