देशी बैंकों की विदेशी हकीकत

मुद्दा , , रविवार , 15-04-2018


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अंजनी कुमार

वैश्वीकरण और विकास की तीस सालों की दौड़ में क्या देशी रह गया और क्या विदेशी, सवाल ही बेमानी रह गये। लेकिन देशी और देशभक्ति का राजनीतिक खेल अब भी खूब खेला जाता है। आमतौर पर विदेशी का अर्थ चीन और पाकिस्तान है, कई बार तो नेपाल और बांग्लादेश भी इसी श्रेणी में गिने जाते हैं।। अमेरीका, जर्मनी, रूस, फ्रांस जैसे देश इन राजनीतिज्ञों के लिए विदेशी नहीं है। ये विकास हैं। अमेरिका तो मानों अपने ही घर की बात है। उसके आगे झुकना अपने ही बाप के सामने झुकने के समान है। बहरहाल, वैश्वीकरण और विकास की नीति में इन देशों का कब्जा मान ली गई बात है। इस कब्जे को बहरहाल एक ऐसा देशी चेहरा देकर इसे और भी अपना बना लिया गया है। 

आइए, आईसीआईसीआई, एक्सिस, एचडीएफसी बैंकों की हकीकत देखते हैं। आईसीआईसीआई बैंक में डच बैंक ट्रस्ट कंपनी का मालिकाना 25.30 प्रतिशत है। 35.48 प्रतिशत विदेशी निवेश संस्थानों और ओवरसीज कॉरपोरेट समूहों का है। शेष 39.22 प्रतिशत में सार्वजनिक और स्थानीय संस्थानों का पैसा है। यानी 60.78 प्रतिशत तो विदेशी मालिकाना है। बाकी बचे हिस्से में भारतीय हिस्सेदारी है। इस भारतीय हिस्सेदारी में एलआईसी ही है जो 10.45 प्रतिशत की हिस्सेदार है। यहां यह भी देखना है कि भारतीय हिस्सेदारों में कौन लोग हैं जिनका पैसा इसमें लगा हुआ है। बहरहाल इस बैंक का मुख्य स्टेक डच बैंक ट्रस्ट कंपनी के पास है। इसी तरह से एक्सिस बैंक में 48.51 प्रतिशत ओवरसीज कॉरपोरेट समूहों का है और 4.54 प्रतिशत विदेशी सीधा निवेश भी अतिरिक्त इसमें जुड़ गया है। बाकी 46.95 प्रतिशत सार्वजनिक और स्थानीय संस्थानों का पैसा है।

इसमें भी एलआईसी और यूटीआई की हिस्सेदारी क्रमशः 13.83 और 11.48 प्रतिशत है। इसी बैंक में विदेशी निवेशकों ने 74,270 करोड़ रूपये का निवेश कर बाजार में पूंजीकृत मूल्य 140,133 करोड़ को बनाकर रखा हुआ है। एचडीएफसी में 47.19 प्रतिशत सार्वजनिक और स्थानीय संस्थानों का पैसा है। बाकी बचा हिस्सा विदेशी निवेशकों का है। इन बैंकों के मालिकों ने इसका प्रबंधन जरूर भारतीय लोगों को दे रखा है जिससे कि यह भारतीय जैसा दिखे। इन तीनों बैंकों में विदेशी हिस्सेदारी 4,43,623 करोड़ रूपये का है। लेकिन उससे अधिक मुख्य बात यह है कि विदेशी निवेशक अपने संस्थानों के माध्यम से बहुमत शेयर होल्डिंग अपने पास रखकर देश के छोटे निवेशकों की जमा पूंजी को नियंत्रित किये हुए हैं। इसके साथ साथ-विदेशी निवेशक भारत में बनाये गये कई तरह के संस्थानों के माध्यम से इन बैंकों का शेयर खरीद कर अपनी हिस्सेदारी को और मजबूत किये हुए हैं।

आज जब सार्वजनिक बैंक जिसमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा जैसे बैंक आते हैं, खराब लोन, बर्बाद निवेश, डूब गये कर्ज और उससे भी अधिक फ्रॉड से लूट लिये गये पैसों से बर्बादी की ओर बढ़ रहे हैं, सरकार इन कर्जों और लूटों को बट्टे-खाते में डालकर देशी लुटेरों को विदेश निकल जाने में ही मदद कर रही है तब इन बैंकों को कैसे बचाया जाय, एक बड़ा सवाल है। बैंक देश की वित्तीय हालात, बाजार को आसान और उत्पादन को समगति में बनाये रखने में निर्णायक भूमिका अदा करते हैं।

अपने देश में जहां फैक्टरी और खेती की हिस्सेदारी कुल जमा उत्पादन में गिरता गया है और सेवा क्षेत्र मुख्य गतिविधि बन गया है, ऐसी स्थिति में बैंक निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। मोदी सरकार नोटबंदी कर एक साथ तीनों ही क्षेत्रों को जिस दुर्गति में ले गये उससे बैंक के स्टेक पर कब्जा किये मालिकानों और प्रबंधकों ने लूट का एक पूरा साम्राज्य ही बना डाला है, जिसकी खबरें कभी कभार अखबारों में छपकर आ रही हैं। ये लूट लाखों करोड़ रूपये की चल रही है। जिसकी गिनती बैंक में पैसे जमा कर रही आम जनता की कल्पना से भी परे है।

कहने को तो सरकार ने बैंक बोर्ड ब्यूरो बना रखा है जिसका काम बैंक में जमा पैसे को और मुनाफे में कैसे बदला जाय, आदि की क्षमता विकसित करने के लिए बैंक अधिकारियों, प्रबंधकों को शिक्षित करना है। इसका काम बैंकों की व्यवसाय क्षमता को विकसित करना, उसकी रणनीति बनाना, कठिन स्थिति का निपटान और इन बैंकों को सहयोग करना है। पिछले दो साल से इस बैंक बोर्ड ब्यूरो के निदेशक विनोद राय थे जो कांग्रेस राज में ऑडिटर जनरल थे और उन्होंने ‘भ्रष्टाचार’ को सामने लाने में अहम भूमिका अदा किया था। उनका यह कार्यकाल अप्रैल 2016 से 2018 तक चला है। अब उनकी जगह पर भानु प्रताप शर्मा आ चुके हैं। बहरहाल, विनोद राय के इस दो साल के कार्यकाल में बैंकों की व्यवसाय क्षमता, खराब लोन, ऋण के नाम पर पैसों की लूट, ऋण को बट्टे-खाते में डाल देने आदि अपनी चरम स्थिति में पहुंच चुका था।

आज जब पैसा यानी करेंसी बाजार की सुगमता को बनाये रखने, उत्पाद के मूल्यों को स्थिर बनाने और पूंजी को ठोस रूप देने से कहीं अधिक देश की पूरी अर्थव्यवस्था और राजनीतिक संप्रभुता को नियंत्रित करने का माध्यम बन चुका है,  इन्हीं बैंकों के साथ गठजोड़ कर सूदखोरों और बैंक प्रबंधकों ने किसानों और आम जनता को अपने चंगुल में फंसाकर खेत और व्यवसाय क्षेत्र को लाशों से पाट रखा है, ऐसे में विदेशी बैंकों की बढ़ोत्तरी, देशी बैंकों की डूब एक चिंताजनक स्थिति है। उससे भी चिंताजनक स्थिति प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री की नीतियां और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार हैं जिससे आम जनता में अपने पैसों और जिंदगी को लेकर एक गहरी सुरक्षा का बोध अंदर तक बैठ गया है।

(अंजनी कुमार सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)




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