फर्जी मुठभेड़ों में आदिवासियों की हत्या और तिरंगा वापसी का दर्द

ग्राउंड रिपोर्ट , , बृहस्पतिवार , 23-08-2018


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तामेश्वर सिन्हा

छत्तीसगढ़। सुकमा -जहां आजादी के 70 साल बाद इस वर्ष पहली बार तिरंगा झंडा फहराया गया था। दंतेवाड़ा से अगस्त क्रांति नाम से निकली पदयात्रा बीहड़ गोमपाड में जाकर खत्म हुई थी। इस बार झंडा फहराने का ऐलान सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने किया था। इस यात्रा में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लगभग 50 कार्यकर्ताओं ने पैदल यात्रा करते हुए तक़रीबन 200 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 14 अगस्त की शाम गोमपाड़ पहुंचे थे। 

गोमपाड़ वही जगह है जहां 13 जून 2016 को एक युवती मड़कम हिड़मे को नक्सली बताते हुए सुरक्षा बलों ने ‘मुठभेड़’ में मार दिया गया था। लेकिन यहां के स्थानीय निवासी, सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता इसे सुरक्षाबलों द्वारा किया गया फ़र्जी मुठभेड़ बताते हैं। इस फर्जी मुठभेड़ मामले का सच जनता के सामने लाने के लिए सोनी सोरी सहित अनेक सामाजिक-राजनैतिक संगठन गोमपाड से बिलासपुर हाईकोर्ट तक संघर्ष कर रहे हैं। 

लेकिन अभी नुलकातोंग में 15 आदिवासियों को सुरक्षा बल के जवानों ने नक्सली बोल कर मार दिया। जिसमें से 6 ग्रामीण आदिवासी पुरुष गोमपाड गांव के थे। इसी फर्जी मुठभेड़ के जांच के लिए सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी गोमपाड गयी थीं। वहां वे मड़कम हिड़मे की मां का नाम लक्ष्मी मड़कम से मिलकर तिरंगा फहाराने को कहा। लक्ष्मी मड़कम ने यह कहते हुए तिरंगा उनके हाथों में वापस कर दिया कि मेरी बेटी को तो न्याय नहीं मिला उल्टा हमारे गांव गोमपाड से 6 लोगों को और मौत के घाट उतार दिया गया, मुझे अब इस लोकतंत्र में विश्वास नही है जहां आदिवासियों के नाम मे सिर्फ मौते लिखी हो। लक्ष्मी मड़कम ने कहा कि जिस दिन मेरी बेटी को न्याय मिलेगा उस दिन मैं तिरंगा अपने हाथ से लहराऊंगी। 

सोनी सोरी को तिरंगा वापस करते हुए लक्ष्मी

लक्ष्मी ने तिरंगा झंडा वापस करते हुए कहा कि ये तिरंगा झंडा मैं इसलिए रखी थी कि जिस दिन मेरी बेटी को न्याय मिलेगा मैं फिर से इसे फहराऊंगी। लेकिन हमारे गांव वालों को मार-मार के खत्म किया जा रहा है। अपने हाल पर जिंदगी जी रहे जनता को मारा जा रहा है। लक्ष्मी आगे कहती हैं ये सरकार मार नहीं रही है, सलवा जुडूम वाले मार रहे हैं। सलवा जुडूम बन्द होना चाहिए, हमारे ऊपर अत्याचार बन्द होना चाहिए। ये जो हमारे ऊपर हो रहा है यह गलत हो रहा है। पहले पुलिस वाले ठीक थे, थाना ठीक था लेकिन अभी पुलिस वाले ठीक नहीं है। ये झंडा रख के मैं क्या करूंगी, हम मरने से थोड़ी न बचेंगे। 

2016 में 15 अगस्त के दिन तिरंगा झंडा फहराते हुए लक्ष्मी ने कहा था मेरी बेटी और गांव वालों को तिरंगा झंडा फहराने से न्याय मिलेगा, जिस क्षेत्र में काला झंडा फहरा कर नक्सली विरोध जताते हैं,लक्ष्मी ने नक्सलियों से लड़ कर तिरंगा झंडा फहराया था। 

सोनी सोरी कहती हैं कि यह मेरे लिए बहुत दुःख की बात है कि 200 किमी पैदल चल कर देश के कोने-कोने से आए बुद्धिजीवियों के साथ गोमपाड में तिरंगा झंडा फहराया था, मैने इसलिए तिरंगा फहराया था ताकि इनको लोकतंत्र, न्याय, संविधान की मुख्यधारा में लाया जाए जिनसे ये अनभिज्ञ थे। लेकिन हिड़मे की मां लक्ष्मी ने मुझे यह कह कर यह झंडा वापस कर दिया की गांव के 6 लोगो को पुलिस ने मार दिया है। सोनी आगे कहती है दो साल तक लक्ष्मी ने झंडे को संभाल कर रखा था, अब मैं कैसे इस झंडे का महत्व और विश्वास दिलाऊ। सरकार से मैं अपील करती हूं कि लोकतंत्र को शर्मशार न करे आदिवासी जनता को न्याय दिलाए। 

आप को बता दें नुलक़ातोंग गांव में 6 अगस्त को पुलिस ने 15 कथित नक्सलियों को मारने का दावा किया था। जिसे ग्रामीण सिरे से खारिज करते हुए आम आदिवासी ग्रामीणों को मारने की बात कह रहे है। 15 निर्दोष ग्रामीणों में से 6 ग्रामीण गोमपाड गांव के रहने वाले थे जो पुलिस के डर के चलते नुलकातोंग में रूके हुए थे। गोमपाड में लगातार आम आदिवासियों को नक्सली बता कर मारने की खबर से गांववासी भय के वातावरण में जी रहे हैं।  










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