बस्तर में एक पुलिसकर्मी को बेगुनाह ग्रामीणों की पैरवी करने की भुगतनी पड़ी सजा, जिंदा है मुर्दा महकमे को भी नहीं पता

विशेष , बस्तर, मंगलवार , 19-06-2018


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तामेश्वर सिन्हा

बस्तर। बस्तर में एक आदिवासी पुलिस आरक्षक को पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर बेगुनाह ग्रामीणों को नक्सली बता कर पकड़े जाने का विरोध करने की सजा उच्च अधिकारियों की  प्रताड़ना से चुकाना पड़ा है। वो पुलिस आरक्षक जिसे कभी नक्सली मुखबिरी के शक में मारने को बेताब थे, और अपनी जान बचाने के लिए पुलिस में भर्ती हुआ अब अपनी ही पुलिस उसकी जान की दुश्मन बन गई है । आरक्षक को पुलिस के आला अफसरों ने देशद्रोही, भगोड़ा साबित करने पर तुली हुई है, लेकिन आज तक आरक्षक जिंदा है या मर गया या फिर दर-दर की ठोकरे खा रहा है। इसको जानने के लिए उसका परिवार बेताब है। 

मामला बस्तर संभाग के नारायणपुर जिले का है । 2012-13 में सहायक आरक्षक पुलिस की वैकेंसी निकाली गई थी, जिसमें भर्ती हुए शिवराम कवाची की पहली पोस्टिंग नारायणपुर जिला मुख्यालय पर हुआ था।  पिछले 5 वर्षों से सहायक आरक्षक नारायणपुर जिले में ड्यूटी कर रहा था । बीते अप्रैल की 18 तारीख को आरक्षक डीआरजी टीम के साथ नारायणपुर जिला मुख्यालय से ओरछा की ओर गस्त पर गया था। पुलिस के अनुसार गस्त की टीम जब ग्राम रेंगाबेड़ा पहुंची थी तभी सहायक आरक्षक शिव राम कवाची पर अपने साथी का हथियार छीन कर भाग जाने का पुलिस के अधिकारियों ने आरोप लगाया है। पुलिस के अनुसार पिछले 3 महीनों से आरक्षक लापता है । 

वहीं आरक्षक की पत्नी सोनबत्ती कावाची ने पुलिस के इस कथन को सिरे से खारिज करते हुए लिखित में आरोप लगाया है कि मेरे पति को बिना हथियार के नक़्सल गस्त पर भेजा गया था। आगे कहती हैं कि उनका उच्च अधिकारियों के साथ विवाद हुआ था तभी से तनाव की स्थिति बनी हुई थी। मेरे पति को शारीरिक अथवा मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था।  मैंने पुलिस थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो मेरे पति को भगोड़ा, देशद्रोही कह कर थाने से भगा दिया गया । सोनबत्ति बताती हैं कि मेरे पति की गुम होने की सूचना मुझे बहुत समय बाद बतायी गयी । मेरे घर के सामने एक महीने तक दो पुलिस वाले तैनात थे। सोनबत्ति कहती हैं मैं अपने दो छोटे बच्चों के साथ भय के साए में जीने को मजबूर हूँ।

लापता पुलिसकर्मी की पत्नी और बच्चे।

आप को बता दें कि पुलिस के कथन अनुसार आरक्षक द्वारा हथियार छीन कर भाग जाने की कथित घटना के बाद पत्नी के अनुसार आरक्षक की वर्दी,जूता, बेल्ट तथा दो सौ रुपए जिसे वो घर से लेकर निकले थे वापस घर भिजवा दिया गया। पत्नी शंका जाहिर करते हुए कहती हैं जब पुलिस कह रही है कि मेरे पति हथियार छीन कर भागे हैं तो जो वर्दी पहन कर गए थे और पैसा लेकर निकले थे वो कैसे वापस आया । पत्नी कहती हैं हमारे साथ अपराधियों जैसा सलूक किया जा रहा है । 

वहीं आरक्षक के परिजनों ने बताया कि आरक्षक के लापता होने से पहले कोहकमेटा, इरकभट्ठी, कच्चापाल के बेकसूर ग्रामीणों को पुलिस नक्सली बता कर उठा लाई थी। जिसका विरोध लापता आरक्षक ने किया था। इसी बीच अधिकारियों के साथ काफी नोक-झोंक भी हुई थी । परिजन आरोप लगाते हैं कि अधिकारियों ने आरक्षक को नक्सली सहयोगी बोल कर मारा-पीटा भी था । आप को बता दें कि लापता आरक्षक का गृह ग्राम कोहकमेटा है । 

आरक्षक शिवराम कवाची के बड़े भाई बताते हैं कि शिवराम के लापता होने के बाद पुलिस ने उन्हें 3 दिन तक थाने में बैठाए रखा। उनके द्वारा पूछे जाने पर किसी तरह का जवाब नहीं दिया जाता था। जब थाने से बाहर आए तब उन्हें सारे घटनाक्रम के बारे में पता चला। 

आप को यह भी बताते चलें कि नारायणपुर जिले में ही बीते सालों में पुलिस जवानों को सरकारी निर्माण कार्यों में मजदूर की तरह उपयोग में लाने की खबर सुर्खियों में आई थी । स्थानीय लोग जो पुलिस में भर्ती हैं उनके साथ उच्च  पदों पर विराजमान अफसरों द्वारा शोषण की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं । बहरहाल लापता आरक्षक वर्तमान में जिंदा है या मर गया कोई सुध लेने वाला नहीं है या बेगुनाहों की पैरवी करने के चलते मौत के मुंह में समा गया। 

(तामेश्वर सिन्हा पेशे से पत्रकार हैं और आजकल बस्तर में रहते हैं।)








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