‘ब्लू व्हेल चैलेंज’: एक खेल नहीं साइबर अपराध है

बच्चों को बचाना है , , मंगलवार , 05-09-2017


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कुमुदिनी पति

विश्व भर में 12-19 वर्ष के बच्चे क्यों एक ख़तरनाक खेल में फंसकर अपनी जान गंवा रहे हैं, कोई समझ नहीं पा रहा है।

खेल का नाम है ब्लू व्हेल चैलेंज

इसके बारे में लिखते हुए भी मन में द्वन्द्व चल रहा है कि कहीं ऐसा हो कि इस लेख को पढ़कर ऐसे बच्चों में जिज्ञासा पैदा हो और वे इस खेल के लिंक खोजने लग जाएं।

आइए बात करना ज़रूरी है

मैं पहले ही बता देना चाहती हूं कि इस लेख का मकसद है बच्चों, युवाओं और उनके अभिभावकों शिक्षण संस्थानों के अध्यापकों से खुली बातचीत करना कि इस समाज में यह खेल मासूम ज़िन्दगियों को इतनी आसानी से कैसे लील जा रहा है? दरअसल, ब्लू व्हेल स्वयं समुद्र तट पर आकर इच्छा मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

खेल के नाम पर

सबसे पहली बात तो यह है कि यह कोई खेल नहीं है, यह साइबर बुलींगके रूप में साइबर-अपराध है, जो मासूम बच्चों की मनोवैज्ञानिक दशा को समझते हुए 50 दिनों का चैलेंज देता है और अन्त में बच्चों को इस स्थिति में पहुंचा देता है कि वे स्वयं अपनी जान ले लें।

आत्महत्या करने वाले बहुत ही भयानक मनोदशा में ऐसा करते हैं, खेल-खेल में कतई नहीं। केवल इस साइबर ब्लैकमेलिंग को एक खेल का रूप इसलिए दिया गया है कि मासूम बच्चे इसमें फंस जाएंकुछ ऐसे ही जैसे कोई ज़हर की गोली को चाश्नी में लपेटकर बच्चों को लालच देकर मार दे।

धीरे-धीरे फंसाया जाता है बच्चों को

50 दिन में जो कुछ करने को कहा जाता है वह अस्वाभाविक होता है पर बच्चों को चुनौतीपूर्ण लगता है, इसलिए वे कदम--कदम आगे बढ़ते जाते हैं। सभी कृत्यों का फोटो खींचकर संचालक को भेजना पड़ता है और वह एक-एक स्तर पार करने का सर्टिफिकेट देकर आगे का काम देता जाता है। धीरे-धीरे बच्चा उसके चंगुल में फंसता जाता है और तब यदि वह हटना चाहता है, तो ऐसी ख़तरनाक धमकियां मिलने लगती हैं कि वह डर जाए। कई बच्चों को अपने हाथ पर ब्लेड से एफ-57 लिखते हुए देखा गया या ब्लू व्हेल का चित्र बांह पर काटकर बनाए हुए पाया गया। सुईं से शरीर पर छिद्र करना, रात भर डरावनी फिल्में देखना या डरावने गाने सुनना, अकेले भोर 4-4.20 बजे छत पर जाना या रेल की पटरी पर चलना, ऊंची छतों पर ख़तरनाक जगहों पर खड़ा होना या पैर लटकाकर बैठना यह सब चैलेंज पूरा करने के क्रम में करना पड़ता है।

साभार : गूगल

आत्महत्या को मजबूर करना

खेलका अन्तिम पड़ाव होता है आत्महत्या कर लेना-उसके तरीके भी वीभत्स होते हैं, उदाहरण के लिए अपना गला तार से घोंट देना, फांसी लगा लेना, ऊंची छत से कूद जाना, पानी में कूद जाना और अपने शरीर को बोटी-बोटी काट डालना। कई बार आत्महत्या से पहले खेलने वाले पत्र लिख जाते हैं जिसमें कहा जाता है कि ब्लू व्हेल चैलेंज से ज़िन्दा नहीं निकला जा सकता।

भारत में इस खेल के बारे में लोग तब जाने जब मुम्बई के एक 14 वर्षीय बच्चे ने छत से कूदकर जान दे दी। अब तक भारत में 6 बच्चे मर चुके हैं और अब तो भारत के आईटी विभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने याहू, फेसबुक, वाट्सऐप, गूगल जैसे साइट्स पर इस खेल को प्रतिबन्धित करने को कहा है। पर इतना काफी नहीं है।

निर्माता-संचालक जेल में

इस खेल को बन्द करवाना फिलहाल असंभव जान पड़ता है। यद्यपि इसके निर्माता मनोचिकित्सक फिलिप बुडेकिन और संचालक इल्या सिदोरोव रूस के जेल में हैं, युवाओं के कई ग्रुप हैं जिनपर इसका लिंक साझा किया जाता है चैट साइट्स पर या किसी और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर इसके बारे में जानकारी मिल जाती है। फिर संचालक खेलने वाले के सारे व्यक्तिगत डीटेल्स जान लेता है, और उसके सारे संपर्क और रहने का स्थान भी पता कर लेता है।

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

बच्चे के दिमाग़ का अपहरण

बुडेकिन कहता है कि वह धरती से ऐसे बेकार तत्वों का सफाया करना चाहता है। तब बच्चा एक कमज़ोर स्थिति में पहुंच जाता है जैसे कि वह संचालक के समक्ष पूरी तरह नग्न हो गया हो, केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी। उसका व्यवहार बदल जाता है-वह बात नहीं करता, वह परिवार से कटता है और गुम-सुम रहता है, उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता इसलिए स्कूल या कॉलेज में नम्बर कम आते हैं, वह अवसाद-ग्रस्त भी हो सकता है और कई बार तो खाना-पीना, मिलना-जुलना, हंसना-खेलना सबकुछ छोड़ देता है।

अस्वाभाविक लक्षणों पर तुरंत ध्यान दें

ये सारे लक्षण असाधारण मनःस्थिति के द्योतक हैं, इसलिए केंद्रीय विद्यालय संगठन सहित कई निजी स्कूलों ने सर्कुलर जारी किये हैं और इन लक्षणों पर ध्यान देने और उन्हें तुरंत रिपोर्ट करने को कहा गया है। यदि समस्या गंभीर हो तो मनोचिकित्सक से मदद लेने की सलाह भी दी गई है। कई बार इन बातों की जानकारी होने पर भी मज़ाक समझकर छोड़ दिया जाता है, जैसे मुम्बई केस में हुआ।

साभार : गूगल

कई देश चपेट में

भारत के अलावा कई देशों में बच्चे जान गंवा रहे हैं, जबकि यह रूस से शुरू हुआ था। अब अमेरिका, वेनेज़ुएला, चीन, स्पेन, सऊदी अरब, यूके, अर्जेन्टीना, ब्राज़ील, इटली, केनिया, पुर्तगाल और पैराग्वे जैसे देशों तक इसका दंश फैल चुका है। यह आश्चर्य की बात है कि रूस के सबसे बड़े सोशल मीडिया नेटवर्क वीकोन्ताके में एफ-57 नाम का एक डेथ ग्रुपभी है जिससे बच्चे इस गेम को पा गए। इसी तरह चीन में टेनसेन्ट के माध्यम से। 

एक वायरस की तरह

यह न डाउनलोड करने वाला खेल है सॉफ्टवेयर है, बल्कि यह तो एक वायरस की तरह कहीं भी प्रकट हो सकता है, इसलिए रोका नहीं जा सकता। केवल एक ही रास्ता है कि बच्चों को इसके खतरों से अवगत कराया जाए और अभिभावकों को सतर्क और सचेत बनाया जाए; अध्यापकों की जिम्मेदारी बढ़ाई जाए और मनोविकित्सकों को काउंसलिंग के काम में लगाया जाए। हेल्पलाइन 1098 से बात भी की जा सकती है।

हाईकोर्ट सख़्त

मदुरई के छात्र विग्नेश की आत्महत्या के बाद मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरई पीठ ने जनहित के मद्देनज़र स्वयं संज्ञान लेकर एक याचिका दर्ज की और तमिलनाडु सरकार को इस खेल पर रोक लगाने को कहा। एक महिला को पुडुचेरी में आत्महत्या से बचाया गया है। अब तमिलनाडु पुलिस ने वाट्स-ऐप ग्रुप बनाया है जिससे अभिभावक शिकायत दर्ज करा सकते हैं। याहु, ट्विटर, वाट्स-ऐप और फेसबुक में खेल प्रतिबन्धित किया गया है और इसके लिंक को साझा करने वालों को कड़ी सज़ा मिलेगी। पीठ ने सरकार से कहा है कि गेम को बैन करने के उपाय निकालें। इधर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्यप्रदेश में घटनाएं जारी हैं।

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल

इसके अलावा यह भी समझना होगा कि हमारा समाज किस वजह से रुग्ण हो रहा है और बच्चे उसके सबसे प्रथम शिकार बन रहे हैं, क्योंकि भागम-भाग वाली दुनिया में किसी के पास बच्चों के लिए समय नहीं है। समय है भी तो साइबर दुनिया के बारे में अभिभावक बहुत कम जानते हैं। फिर भी उनके सामने चुनौती है कि वे अपने बच्चों और अगली पीढ़ी के नौजवानों को अलगाव, तनाव और अवसाद से कैसे बचाएं;‘पीयर प्रेशरसे कैसे बचाएं?

संचालक को परास्त करना ही होगा

माता-पिता को अब देखना होगा कि वे कहीं बच्चों को मात्र एक वंशज या पूंजी-निवेश का माध्यम तो नहीं बना रहे, क्योंकि 7 साल तक के छोटे बच्चे तक इस अजगर-रूपी खेल के चंगुल में फंस रहे हैं।

यदि इस दिशा में सही तरीके से प्रचार-प्रसार कर बच्चों को स्वस्थ विकल्पों की ओर आकर्षित किया जाय, उनके साथ सहानुभूतिपूर्ण संवाद जारी रखा जाए तो इस खेल में हम संचालक को परास्त कर सकते हैं।

(कुमुदिनी पति सामाजिक और राजनीतिक तौर पर सक्रिय रही हैं। आजकल इलाहाबाद में रहती हैं और तमाम ज्वलंत मुद्दों पर बेबाक लेखन कर रही हैं।) 










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