जन्म शतवार्षिकी पर विशेष: मंडल कैसे बने इतिहास के एक पाठ?

जयंती पर विशेष , , शनिवार , 25-08-2018


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प्रेम कुमार मणि

25 अगस्त उस विन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल का जन्मदिन है, जिनकी अध्यक्षता वाले आयोग के प्रस्तावित फलसफे को लेकर 1990 में भारतीय राजनीति में एक भूचाल आया और उसने राजनीति की दशा-दिशा बदल दी। यह जन्मदिन कुछ खास है। आज उनके जन्म की सौवीं सालगिरह है। इसलिए आज उन्हें याद किया ही जाना चाहिए। लेकिन मैं अपने ही अंदाज़ में उन्हें याद करूँगा। मेरी कोशिश हालिया इतिहास के उस पूरे दौर पर एक विहंगम ही सही नज़र डालने की होगी जिसने वीपी मंडल और उनकी राजनीति को आगे लाया। 

हाई स्कूल का छात्र था, जब वीपी मंडल का नाम मैंने पहली दफा सुना था। साल के हिसाब से वह  1967-68 का जमाना था।  तब बिहार में संयुक्त विधायक दल, जिसका  संक्षिप्त रूप संविद था, की सरकार  थी, जिसके मुखिया महामाया प्रसाद सिन्हा  थे। यह गैर कांग्रेसी सरकार थी। कांग्रेस विरोधी लगभग सभी राजनीतिक दलों का जमावड़ा था यह संविद। इसमें पूर्व कांग्रेसी, जनसंघ, सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट से लेकर राजा रामगढ़  की पार्टी जनक्रांति दल तक शामिल थे। सच्चे अर्थों में यह एक ऐसा राजनीतिक पंचमेल था, जिस पर विचार करना दिलचस्प हो सकता है। 

 महामाया  प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री कैसे हुए? इसे जाने बगैर हम शायद आगे नहीं बढ़ सकते। सिन्हा राजा रामगढ़ की पार्टी जनक्रांति दल के विधायक दल के उपनेता थे, जिनके विधायकों की संख्या 27 थी। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी सबसे बड़ी पार्टी थी, जिसके 68 सदस्य थे। इसके नेता कर्पूरी ठाकुर  थे ।  स्वाभाविक रूप से वह  संयुक्त विधायक दल के नेता और मुख्यमंत्री होते। लेकिन कर्पूरी ठाकुर पिछड़ी जाति से आते थे। ऊंची जाति से आने वाले  समाजवादियों और साम्यवादियों के ही एक तबके ने निश्चय किया कि किसी कीमत पर कर्पूरी ठाकुर को सीएम नहीं बनने देना है।

इसलिए इन लोगों ने कहा कि जनभावनाओं का ख्याल किया जाना चाहिए। कैसी जनभावना! तर्क  यह  बना कि महामाया सिन्हा  ने चूंकि मुख्यमंत्री केबी सहाय को पराजित किया है, इसलिए वह मुख्यमंत्री होंगे। इसी दलील पर वह (सिन्हा) मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन हक़ीक़त यह भी थी मुख्यमंत्री केबी सहाय ने दो स्थानों से चुनाव लड़ा था और दोनों जगहों से पराजित हुए थे। दूसरी जगह से उन्हें पराजित किया था पिछड़े तबके के रघुनंदन प्रसाद ने। प्रसाद मुख्यमंत्री तो क्या, मंत्री भी नहीं बनाये गए। पिछड़े वर्ग के राजनीतिक कार्यकर्ताओं में इस बात की खूब चर्चा हुई।

बिहार में पिछड़े वर्गों की राजनीति को आगे करने में केबी सहाय की भी महती भूमिका रही थी। कांग्रेसी राजनीति के मध्य से ही उन्होंने पिछड़ों की राजनीति को बल दिया और इसे  अपने राजनीतिक दुश्मनों ,जो उनकी पार्टी के ही अन्य ऊँची जाति के लोग थे, को तहस-नहस करने में  इस्तेमाल किया। महामाया सरकार ने कांग्रेसी सरकार के भ्रष्टाचार की जाँच के लिए  अय्यर आयोग बैठाया था। कहते हैं इसके भय से भी कांन्ग्रेसी संविद सरकार को गिराने के लिए कटिबद्ध हुए। सहाय ने जाने अनजाने अपने पुराने राजनीतिक उपकरणों का इस्तेमाल किया। यानी पिछड़ा वर्गीय राजनीति के तुरुप के पत्ते को पटक दिया। कांग्रेस विधायकों की संख्या 128 थी। उस वक़्त बिहार झारखंड एक ही था। सरकार बनाने के लिए 32 या 35 विधायकों की दरकार  थी। यह वही समय था जब लोहिया का पिछड़ा पावें सौ में साठ का फलसफा चर्चित हुआ था और यथेष्ट संख्या में पिछड़े विधायक विधान सभा में आये थे। केबी सहाय ने अपने प्रतिद्वंदी महामाया को पराजित करने का बीड़ा उठा लिया था।

इसी के समानान्तर सत्ता पक्ष में राजनीतिक बुलबुले उठ रहे थे। संसोपा में ऊँची जातियों के नेता कसमकस कर रहे थे। राजनीतीक बदलाव के सामाजिक परिप्रेक्ष्य उन्हें सुहा नहीं रहे थे। इसके साथ ही पिछड़े राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भी तरह -तरह की प्रतिक्रिया हो रही थी। इन्हीं सब के बीच लोहिया ने हस्तक्षेप किया। 

उन्होंने अपनी ही पार्टी के लोगों की इस बात के लिए आलोचना की कि आखिर कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनने दिया गया। फिर पार्टी के दूसरे तौर तरीकों पर भी उंगली उठाई। वीपी मंडल कांग्रेस से आये थे और लोकसभा के लिए चुने गए थे। लेकिन बिहार में स्वास्थ्य मंत्री बना दिए गए थे। लोहिया ने पूछा यह क्यों हुआ? क्या इसलिए कि श्री  मंडल जमींदार परिवार से आते थे? मंडल को मजबूरन इस्तीफा देना पड़ा। सत्ता पक्ष में दरकन आ चुकी थी।

केबी सहाय ने इसे ही लेकर राजनीति शुरू कर दी। मंडल मुखर नहीं थे, लेकिन उनकी राजनीतिक औकात थी। कोसी इलाके से आये यादव -पिछड़े विधायकों के एक अच्छे-खासे समूह पर उनका कब्ज़ा था। एक अन्य सोशलिस्ट जगदेव प्रसाद राजनीति को फलसफा देने में सक्षम  थे। इन दोनों ने मिलकर शोषित दल बनाया। 1967 का  अगस्त का ही महीना था। भूल नहीं रहा हूँ तो 25 ही तारीख  होनी चाहिए। स्थान था पटना का ऐतिहासिक अंजुमन  इस्लामिया हाल जहां कभी जयप्रकाश नारायण  के प्रयासों से 1934  में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई थी। ध्यातव्य यह भी है कि लोहिया के जीवनकाल में ही यह विद्रोह हो चुका था। 

शोषित दल के निर्माण और संविद सरकार के पतन के पीछे इतिहास के अवचेतन साधन सक्रिय थे। इसे समझना बहुत आसान नहीं होगा। जातिवाद कुछ लोगों में महानता   के भाव भरती  है तो बहुतों में हीनता के झाग भी। दोनों की अलग-अलग प्रतिक्रिया होती है। इस मामले पर हमने यदि निष्पक्ष व वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं अपनाया तब गलत निष्कर्ष पाने के लिए अभिशप्त होंगे। 

किस्सा-कोताह ये कि एक नाटकीय प्रकरण से गुजर कर वीपी मंडल मुख्यमंत्री हो गए और चर्चित हुए। उनकी सरकार कोई सवा महीने ही चली। जातीय आधार पर जैसे सोशलिस्ट पार्टी टूटी थी, वैसे ही कांग्रेस भी टूटी और लोकतान्त्रिक कांग्रेस का निर्माण हुआ। पिछड़ा की प्रतिक्रिया में एक दलित भोला पासवान शास्त्री मुख्यमंत्री बनाये गए। कांग्रेसी राज में जो जातिवाद परदे के पीछे होता था, अब सामने होने लगा और उसमें दलित-पिछड़े पात्र  भी शामिल होने लगे। यह राजनीति की नई करवट थी ,नया मोड़ था। 

वीपी मंडल लम्बे अरसे तक राजनीतिक हाइबरनेशन में रहे। सितम्बर 1974  में जिस दिन जगदेव प्रसाद की हत्या हुई रेडियो पर गुस्से और दुःख में पगी  उनकी प्रतिक्रिया आई- 'सरकार को पिछड़े-दलित नेताओं के जान की कोई चिंता नहीं है। सरकार ने जगदेव बाबू की हत्या कर दी।'  अपने साथी की हत्या से दुखी वीपी मंडल की इस प्रतिक्रिया में दुःख से अधिक गुस्सा था। लेकिन इस गुस्से का राजनीतिक रूपांतरण वह नहीं कर सकते थे। इस स्तर के राजनेता वह शायद नहीं थे। यह उनकी सीमा भी थी।

1977 में वह जनता पार्टी के टिकट पर जीते और संसद पहुंचे। चुप्पे सांसद बने रहे। उनके स्तर से  किसी राजनीतिक सक्रियता की जानकारी नहीं मिलती। इस बीच बिहार में आरक्षण को लेकर सामाजिक -राजनीतिक कोहराम मचा था। कर्पूरी ठाकुर सरकार ने मुंगेरी लाल की अध्यक्षता वाले पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशें लागू कर दी थीं। राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की मांग उठने लगी। तत्कालीन जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में इन तबकों के लिए तैंतीस फीसद आरक्षण का वायदा किया हुआ था।

1953 में गठित काका कालेलकर  आयोग ने अपनी सिफारिशों में साढ़े बाईस फीसद आरक्षण देने की सिफारिश की थी। बहुत पुराने इस आयोग की समीक्षा जरुरी थी। इसी परिप्रेक्ष्य में मोरारजी सरकार ने एक जनवरी 1979  को  दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया, जिसके अध्यक्ष वीपी मंडल बनाये गए। 

अंतर्मुखी स्वभाव के मंडल ने इस अवसर को पहचाना और निष्ठा पूर्वक कार्य सम्पादित किया। मंडल ने पिछड़े वर्गों के लिए उसी स्तर का काम किया, जिस स्तर का काम दलितों के लिए डॉ आंबेडकर  ने किया था। पिछड़े वर्गों में शामिल जातियों  के  निर्धारण में संभव वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया। काका कालेलकर आयोग में केवल हिन्दू पिछड़ी जातियों की सूची थी। मंडल ने इसे मुस्लिम और अन्य  धर्मावलम्बियों को शामिल किया। इस तरह इसे व्यापक फलक मिला। उनकी पूरी कोशिश हुई कि पिछड़ी जातियों को एक वर्ग रूप दे सकें। बहुत हद तक वह सफल भी हुए।

ज्ञानी जैल सिंह को रिपोर्ट सौंपते मंडल।

आयोग की रिपोर्ट सौंप कर वह 1982  में चल बसे। उनके जीवन काल में इसे लागू नहीं किया जा सका। इसके लिए एक और वीपी का इंतज़ार था। लम्बे अरसे तक पड़े रहने के बाद इन सिफारिशों को 1990 के अगस्त में लागू किया जा सका। इसकी भीषण राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई। वीपी सिंह की सरकार गिर गई। पक्ष और विपक्ष में आंदोलनों का सिलसिला लग गया। लेकिन एक मुद्दा  चुपचाप भारतीय राजनीति का हिस्सा बन गया। वह था सामाजिक न्याय का मुद्दा। इस  राजनीति के आधार रखने वाले थे -वीपी मंडल और वीपी सिंह। इस तरह एक इंसान इतिहास का हिस्सा बन गया। मंडल इतिहास के एक पाठ बन गए।

वीपी मंडल की शतवार्षिकी पर उनका मूल्यांकन होना चाहिए, उन पर चर्चा होनी चाहिए। उनके बहाने सामाजिक न्याय की समीक्षा होनी चाहिए और कुल मिलाकर  समता मूलक समाज के पाठ को मजबूत करना चाहिए। इस विकासवाद की आंधी में समत्व के चिराग  मुश्किलें झेल रहे हैं। इन्हें बचाना जरुरी है। अन्यथा मनुष्यता खतरे में पड़ जाएगी।

उस ऐतिहासिक  व्यक्तित्व को मेरी श्रद्धांजलि।

(प्रेम कुमार मणि सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और आजकल पटना में रहते हैं।)








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