शाह के प्रति समर्पित सीबीआई ने उन्हें बचाने के लिए दिया था अपने इतिहास का सबसे हास्यास्पद कानूनी तर्क

मुद्दा , , शनिवार , 24-11-2018


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विकास नायारण राय

सीबीआई में भ्रष्टाचार और राजनीति के बड़े ख़ुलासों के बीच उनके इतिहास के सर्वाधिक हास्यास्पद तर्क पर एक नज़र डालने से उनका भ्रष्ट आचरण और उनकी राजनीतिक उठापटक में लिप्तता को आंकने में सहूलियत होगी। यह तर्क भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के दबाव की उपज है। पहले इसकी पृष्ठभूमि।

दिसम्बर 2014 में सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेश थे कि फ़र्ज़ी सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई जज को न बदला जाय। तब जज और कोई नहीं, बाद में विवादास्पद परिस्थितियों में मृत्यु का शिकार बने जज लोया ही थे।

लेकिन शाह का जलवा ऐसा था कि जब लोया को ख़रीदा न जा सका तो उन को हटाकर एक ‘अनुकूल’ जज लगाया गया जिसने शाह को डिस्चार्ज कर दिया। इतने सनसनीखेज हत्या के मामले में चार्ज लगने के स्टेज पर डिस्चार्ज करना न केवल दुर्लभ है बल्कि न्यायिक अजूबा ही कहा जाएगा।

यहां तक कि जज ने डिस्चार्ज करते समय टिप्पणी तक कर डाली कि अमित शाह को राजनीतिक कारणों से मामले में अभियुक्त बनाया गया है। इससे जज की मंशा एकदम नंगी हो जाती है। उस स्टेज पर अभी न तो कोई गवाही हुई थी और न ही केस फ़ाइल पर ऐसे कोई सबूत थे जिनके आधार पर यह न्यायिक टिप्पणी की जा सके।

ज़ाहिर है जज तो वही कर रहा था जो उसे करना था। पर मुंबई हाईकोर्ट और देश की सुप्रीमकोर्ट ने भी तब क्रमशः दख़ल देने से इंकार कर दिया था। तब के सीजेआई को मोदी सरकार ने पुरस्कार स्वरूप केरल का गवर्नर बना दिया।

हाईकोर्ट और सप्रीम कोर्ट इसलिये कन्नी काट सकीं क्योंकि सीबीआई में शाह को डिस्चार्ज किए जाने के आदेश के विरुद्ध अपील करने से इंकार कर दिया। उन्होंने अपील न करने के पीछे जो तर्क दिया, वही आसानी से, उनके इतिहास का सर्वाधिक हास्यास्पद क़ानूनी तर्क कहा जाएगा।

तत्कालीन सीबीआई डाइरेक्टर अनिल सिन्हा ने कहा कि सीबीआई को जो कहना था वह चार्जशीट में कहा जा चुका है, लिहाज़ा अपील में नया कहने को कुछ नहीं है। ऐसे में अपील करने का क्या फ़ायदा। सोचिए, कितने भोले अन्दाज़ में न्याय की हत्या होने दी गयी! मोदी सरकार तो ख़ैर शाह की जेब में थी पर कहां थे हाईकोर्ट और सप्रीम कोर्ट?

अगर सीबीआई के तर्क को मान लिया जाय तो यह भी मानना होगा कि कोई जांच एजेन्सी कभी अपील करेगी ही नहीं। बल्कि ज़्यादा संगत होगा यह कहना कि अपील की प्रक्रिया को क़ानूनी किताबों से हटा लिया जाना ही ठीक होगा।

दरअसल, शायद ही किसी दुर्लभ मामले में अपील नए तथ्यों के आधार पर की जाती हो। अन्यथा, अपील का सामान्यतः आधार होता है कि निचली अदालत ने तथ्यों या सबूतों या प्रक्रिया में ग़लती की है जिसे उच्च अदालत सुधारे। उच्च अदालत तदनुसार पुनः विचार कर निर्णय करती है।

बोफ़ोर्स मामले में भी दिल्ली हाईकोर्ट के एक ‘अनुकूल’ जज ने एफआईआर ही रद्द कर दी थी जिसे सीबीआई की अपील पर बड़ी बेंच ने पुनर्स्थापित किया था। मायावती मामले में भी सीबीआई ने अपील करना तो नहीं ही छोड़ा था। बेशक राजनीतिक दबाव में उनकी पैरवी कमज़ोर रही और सत्ता राजनीति के माफ़िक़ फ़ैसला ले लिया गया।

पर अमित शाह के वर्तमान मामले जैसा कुछ भी नहीं। न भूतो न भविष्यति!

(विकास नारायण राय हरियाणा के डीजीपी रहे हैं और आजकल करनाल में रहते हैं।)

 








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