जान लो...आदिवासियों की चीखें और लाशें आने वाली पीढ़ियों को सोने भी नहीं देंगी!

एक नज़र इधर भी , , शनिवार , 10-03-2018


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हिमांशु कुमार

ठीक इसी समय जब मैं यह लिख रहा हूं

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में आदिवासी महिलाओं को पुलिस डंडों से पीट रही है 

इन महिलाओं का कसूर यह है कि इनके पुरुषों और बच्चों का पुलिस ने अपहरण कर लिया है और यह महिलाएं अपने परिवार के निर्दोष सदस्यों को छुड़वाने के लिए पुलिस से प्रार्थना करने गई हैं 

कल सुबह सिंगारम और वेंगलवाया गांव के 45 आदिवासियों का पुलिस ने अपहरण कर लिया 

इनमें 15 नाबालिग बच्चे हैं 

गांव वालों को डर है कि पुलिस इनका एनकाउंटर कर सकती है 

या फर्जी केसों में फंसा कर जेल में डाल सकती है 

या इनाम और तरक्की के लालच में इन्हें नक्सलवादी घोषित करा कर फर्जी आत्मसमर्पण का प्रचार कर सकती है 

सिंगारम गांव ने बड़े दुख झेले हैं

इस गांव में कुछ साल पहले एक बड़ी फर्जी मुठभेड़ हुई थी 

8 जनवरी 2009 को सलवा जुडूम के तहत सरकार द्वारा बनाए गए विशेष पुलिस अधिकारियों ने सिंगारम गांव में 19 आदिवासियों को लाइन में खड़ा करके गोली से उड़ा दिया था 

जिसमें 4 लड़कियां थी 

जिनके साथ बलात्कार करके उनके पेट में चाकू घोंपकर मार डाला गया था 

हमारी संस्था ने इस फर्जी मुठभेड़ के खिलाफ हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया था 

यह मामला छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी जोर-शोर से उठा था 

बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस घटना की जांच करी

और रिपोर्ट में कहा कि यह मुठभेड़ फर्जी थी 

और सरकार को आदेश दिया कि वह सभी मारे गए आदिवासियों के परिवारों को मुआवजा दे 

सरकार ने एक लाख का मुआवजा भी दिया था 

लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अभी भी मुकदमा बिना फैसले के लटका हुआ है 

इसी मामले को उठाने के बाद मेरे आश्रम पर बुल्डोजर चला दिया गया था।

सरकार कोर्ट में खुद को बचाने के लिए गांव वालों को नक्सली सिद्ध करने के लिए उनका अपहरण करके कोर्ट के दिमाग में यह असर डालना चाहती है कि इस गांव के लोग नक्सलवादी है 

और फैसले को अपने पक्ष में करवाना चाहती है 

इस समय भारत में आदिवासियों के साथ जो अत्याचार हो रहे हैं उसने दुनिया भर के क्रूरता के सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं 

वैसे तो भारत का शहरी समाज खुद के महान आध्यात्मिक और धार्मिक होने का दावा करता है लेकिन भारतीय समाज आदिवासियों के साथ जैसा व्यवहार कर रहा है वह सामान्य इंसानियत के लिहाज से भी सहन करने योग्य नहीं है 

हमें आदिवासियों के ऊपर होने वाले यह अत्याचार तुरंत रोक देने चाहिए वरना आदिवासियों की चीखें और लाशें आने वाली पीढ़ियों को सोने भी नहीं देंगी 

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक हिमांशु कुमार प्रसिद्ध गांधीवादी कार्यकर्ता हैं।)









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