कार्यकाल के अंत में रमन सिंह को याद आए आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार

मुद्दा , , सोमवार , 30-07-2018


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तामेश्वर सिन्हा

रायपुर। चुनावी मौसम में रूठे आदिवासियों को मनाने के लिए छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार 22 साल से लंबित आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा करने को मजबूर हो गई है। प्रदेश में आदिवासी अपने संवैधानिक अधिकारों को लेकर संघर्षरत हैं जिसे छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार लगातार अनदेखा कर रही है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ सरकार के आदिमजाति अनुसूचित जाति विकास विभाग तीन मुद्दों पर राजधानी रायपुर में प्रदेश के सभी 27 जिलों के समाज प्रमुख और बुद्धिजीवियों के साथ कार्यशाला का आयोजन राज्य प्रशासनिक प्रशिक्षण भवन निमोरा में किया गया। जहां सरकार पेसा एक्ट को जागरूकता और रूढ़िजन्य परम्पराओं पर राज्य में विधि बनाने के लिए आदिवासी प्रमुखों के बीच पेश करना चाह रही थी। 

लेकिन कार्यशाला में मौजूद आदिवासी समाज प्रमुख एवं बुद्धिजीवी,सरकार के नुमाइंदों पर ही भारी पड़ गए,जो सरकारी हुक्मरान पेसा कानून का पाठ पढ़ाने आए थे वे आदिवासियों से पेसा कानून सीख कर गए। प्रशासनिक अधिकारी पेसा एक्ट के व्यावहारिक अनुप्रयोग को समझाने में असफल रहे। आदिवासी आयोग के सदस्य कार्यशाला में मुद्दे से हट कर भाजपा सरकार की वाहवाही करने लगे, जबकि आयोग एक संवैधानिक संस्था है। इससे नाराज आदिवासी समाज प्रमुखों ने "शासन-प्रशासन संविधान पढ़ो" के नारे लगाने लगे। समाज ने मांग किया कि अनुसूचित क्षेत्रों में कलेक्टर से लेकर चपरासी तक सारे सरकारी महकमे को पांचवी अनुसूची, पेसा एक्ट, वन अधिकार कानून के बारे में प्रशिक्षित किया जाए और यह बन्द कमरे में नहीं अपितु समाज प्रमुखों के समक्ष प्रशिक्षण देकर अगवत कराया जाए। 

संवैधानिक अधिकार कार्यशाला का पोस्टर

जानकारी के अनुसार कार्यशाला में सरकारी अफसरों और आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों के बीच काफी तना-तनी हुई । एक ओर जहां सरकार जबरिया पारम्परिक रूढ़ि एवं जन्य परंपरा पर विधि बनाकर असंगत रूप से थोपना चाह रही थी तो वहीं दूसरी ओर इस कानून के थोपे जाने और पारम्परिक आदिवासियों के रूढ़ि को नुकसान पहुंचाने को लेकर आदिवासी समाज के लोग भड़क गए।

रूढ़िजन्य विधियां अलिखित होती हैं

रूढ़ि प्रथा अलिखित व्यवस्था है जिसे लिखित रूप में व्याख्या नहीं किया जा सकता है क्योंकि रूढ़िजन्य विधियां हजारों वर्षों से आदिम जनजाति समुदाय में पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः संचालित होते आ रहे हैं और समय के अनुरूप संधारित और नियंत्रित होते हैं। जैसे अनुसूचित जनजातियों में टोटम व्यवस्था का पालन करना परिवार गोत्र को आनुवंशिक रूप से सुरक्षित रखना है। यह रूढ़िजन्य विधि है जो कि अलिखित है परंतु पूर्णतः वैज्ञानिक दृष्टिकोण अथवा प्रमाणित है।  

चुनावी मौसम में आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार पर चर्चा

संवैधानिक अधिकार कार्यशाला में आदिवासी

आदिवासी समाज प्रमुखों के अनुसार सरकार को आदिवासियों के संवैधानिक हक-अधिकार के कार्य बहुत पहले करने चाहिए थे। इतने वर्षों से बीजेपी सत्तासीन है लेकिन आदिवासी समुदाय की मूलाधार पांचवीं अनुसूची, 275 मद, पेसा एक्ट, वनाधिकार अधिनियम 2006 को अमल करने से बचती रही है। जबकि आदिवासी क्षेत्रों का सम्पूर्ण सम्यक विकास इन अधिनियमों के प्रभावी अनुप्रयोग से ही सम्भव है। यह बात उच्च अधिकारी भी जानते हैं अब आदिवासी समुदाय के बुजुर्गों के साथ ही युवाओं को भी यह समझ आ गया है।अब युवाओं के हाथ में संविधान की किताब, अधिनियमों की किताब देखने और मुंह में पांचवी अनुसूची व अधिनियमों की चर्चा आम है। लेकिन आगामी चुनाव को देखते हुए सरकार आदिवासियों को मनाने के लिए संवैधानिक कार्यशाला का ढोंग कर खानापूर्ति कर रही है।

कार्यशाला बना सरकारी प्रचार का जरिया

सर्व आदिवासी समाज नारायणपुर के अध्यक्ष बिसल नाग कहते हैं कि समाज ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है, सरकार के इस फैसले का कि सरकारी योजनाओं की जानकारी को स्थानीय बोली में पहुंचाया जाएगा का समाज ने स्वागत किया है। समाज वर्षों से यह बात करता रहा  है लेकिन कार्यशाला में विषय से हटकर शासन की वाहवाही से सामाजिक प्रमुख नाराज है, इस हरकत से सरकार की ही किरकिरी हो रही है, शासन हमको पेसा एक्ट और आदिवासियों के रूढ़ि के बारे में पाठ पढ़ा रही थी। लेकिन पेसा एक्ट में प्रावधानों के बस्तर में घोर उल्लंघन पर आयोग के अध्यक्ष व संचालक आदिम जाति विकास विभाग से जब जवाब चाहा गया तब उनका मुंह बंद रहा। इसलिए उपस्थित समाज प्रमुखों ने प्रशासन को ही पेसा एक्ट को नहीं मानने वाला करार दिया। 

सिखाने आये थे सीख के गए

कार्यशाला में मौजूद लोगों के अनुसार पेसा कानून और रूढ़िजन्य विधि मामले के सवाल के जवाब में सरकारी अफसर कुर्सी छोड़ने पर मजबूर हो गए थे। आयोग के सदस्य रामकिशुन सिंह और विकास मरकाम कुर्सी छोड़ चले गए, जैसे-तैसे शासन द्वारा कार्यशाला के समापन की घोषणा कर इज्जत बचाई गई। आप को बता दें कि आदिवासियों के महत्वपूर्ण कानून पेसा एक्ट को सरकार ने ढुलमुल तरीके से लागू कर रखा है। अनुसूचित क्षेत्र के जिले के कलेक्टर के साथ ही अन्य विभाग के अधिकारी कर्मचारी आज भी पेसा एक्ट से अनभिज्ञ हैं,इसलिए सामान्य क्षेत्रों के नियम कानूनों को जबरन थोपते हैं। जिसके कारण आदिवासी समुदाय का विकास नहीं हो पा रहा है। इन अधिकारियों को रूढ़िजन्य कानूनों की तनिक भी जानकारी नहीं है और उन्हीं के भरोसे आदिवासी क्षेत्रों में शासन चल रहा है।  

 










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??????????? ????? :: - 07-31-2018
Very good sinha ji

Dayaram chhaidahiya very :: - 07-30-2018

Mohan Komre :: - 07-30-2018
अतिसुंदर रिपोर्ट, मैं भी इस कार्यक्रम में शामिल था।