चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के नये रिश्तों की आहट!

देश-दुनिया , नई दिल्ली, शुक्रवार , 31-08-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। बदलते घटनाक्रम में पड़ोसी चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों की एक नई तस्वीर सामने आ रही है। हालांकि इसको लेकर किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता है। लेकिन है ये बिल्कुल नयी और बदली बात। ये किसी मजबूरी में किया जा रहा है या फिर उसके पीछे कोई दूसरा उद्देश्य है कह पाना मुश्किल है। 

गौरतलब है कि आजकल भारत और पाकिस्तान की सेना एससीओ के सदस्य के तौर पर रूस में संयुक्त सैन्य अभ्यास कर रही है। वहां से एक वीडियो सामने आया है जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इसमें भारत और पाकिस्तान के सैनिक संगीत की धुन पर भांगड़ा कर रहे हैं। ये अब तक के भारत और पाकिस्तान के इतिहास में अपने तरह की अभूतपूर्व घटना है। सीमा के आर-पार रहने वाले जो सैनिक अब तक एक दूसरे से गोलियों से बात करते थे इस मौके पर वो एक दूसरे के गले मिलकर डांस कर रहे हैं।

बहरहाल संयुक्त सैन्य अभ्यास पर अभी तक दोनों देशों की तरफ से कोई बयान नहीं आया है। लेकिन इस दौर में पाकिस्तान की तरफ से भले ही रिश्तों को लेकर सकारात्मक रुख रहा हो लेकिन भारत अभी भी बातचीत न करने के अपने पुराने रुख पर कायम है। ऐसे में इस नये विकास को किस नजरिये से देखा जाए ये एक बड़ा सवाल बना हुआ है।

इसी तरह की एक दूसरी प्रगति चीन के साथ रिश्तों को लेकर है। बीजेपी के एक प्रशिक्षण शिविर में छपी बुकलेट में कुछ ऐसी बातें की गयी हैं जिसे दोनों देशों के बीच रिश्तों में प्रगति के लिहाज से एक नया संकेत समझा जा सकता है। पार्टी के महिला मोर्चा कैडरों के प्रशिक्षण शिविर के लिए जारी एक हिंदी बुकलेट में चीन को भारत और उसके हितों के लिए खतरा बताया गया था।

लेकिन उससे दो महीने बाद बुकलेट के अंग्रेजी संस्करण में उसे बदलकर कहा गया है कि “ चीन के साथ हमारा सीमा विवाद बहुत पुराना है। हालांकि पहले ऐसा लगता था कि चीन इसका हल नहीं चाहता है लेकिन अब पीएम नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति जी जिनपिंग की मुलाकात के बाद इस मोर्चे पर एक सकारात्मक संकेत है।” 

जबकि हिंदी की बुकलेट में इस बात का जिक्र किया गया था कि ऐसा लगता है कि चीन की मामले को हल करने में कोई रुचि नहीं है। हालांकि 1962 के बाद सीमा पर किसी तरह की फायरिंग नहीं हुई है और न ही कोई बड़ा तनाव खड़ा हुआ है। लेकिन चीन लगातार सरहद पर हथियारों को जुटाने का काम कर रहा है। हाल में चीन ने यूएन में 26/11 हमले के साजिशकर्ता जकी-उर-रहमान लखवी से जुड़े पाकिस्तान के एक प्रस्ताव का समर्थन किया है।

पाकिस्तान और चीन के संदर्भ में दोनों चीजें भारत के एक नये रुख की तरफ संकेत करती हैं। लेकिन इसमें सबसे बड़ा सवाल ये रह जाता है कि अगर पाकिस्तान के साथ किसी सद्भावनापूर्ण रिश्ते को विकसित करने की कोशिश की जा रही है तो देश के भीतर अल्पसंख्यकों के खिलाफ ध्रुवीकरण में क्यों नहीं कोई ढिलाई आ रही है।

इसी तरह से जब चीन के साथ रिश्तों में सुधार की भारत सरकार वकालत कर रही है तब उसने घरेलू मोर्चे पर अर्बन नक्सल के नाम पर वामपंथी बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं के खिलाफ अभियान को तेज कर दिया है। कहीं ऐसा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सरकार के घरेलू अभियान में किसी तरह के दखल की आशंका को ध्यान में रखते हुए तो नहीं किया गया है।








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