मोदी का नाम लिखना भी हुआ गुनाह, माले प्रत्याशी के पंफलेट में लिखे गए कई शब्दों पर चुनाव आयोग ने जताई आपत्ति

मुद्दा , , सोमवार , 25-03-2019


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इंद्रेश मैखुरी

ख़वातीनों-हज़रात,ऐन चुनावों के मौके पर देश में प्रतिबंधित शब्दों की एक नयी सूची जारी कर दी गयी है। इस नयी सूची के अनुसार- नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, अजित डोवल, भगत सिंह कोशियारी जैसे नाम प्रतिबंधित शब्दों की सूची में डाल दिये गए हैं। इतना ही नहीं नोटबंदी, रफाल, जीएसटी जैसे तमाम शब्दों और इनके जिक्र वाले वाक्य के वाक्य प्रतिबंधित कर दिये गए हैं। 

बात सुनने में कुछ अजीबोगरीब जरूर है, लेकिन सच है। शब्दों पर रोक लगाने का यह कारनामा उत्तराखंड के नैनीताल-उधम सिंह नगर लोकसभा क्षेत्र में पर्चा,पोस्टर आदि छापने की अनुमति देने वाली एमसीएमसी ने कर डाला है। वाकया यूं है कि नैनीताल लोकसभा क्षेत्र से भाकपा (माले) के प्रत्याशी कामरेड कैलाश पांडेय ने चुनाव के लिए पर्चा छपवाने की अनुमति मांगी। बस फिर क्या था! एमसीएमसी के प्रभारी अधिकारी और सूचना विभाग के उपनिदेशक योगेश मिश्रा की अगुवाई वाली कमेटी ने पूरे पर्चे को लाल-लाल गोलों से रंग दिया।

और क्या गजब किस्म की आपत्तियाँ हैं, उनकी! पर्चे में लिखे “क्रांतिकारी अभिवादन” में क्रांतिकारी से उन्हें आपत्ति हो गयी। शायद मिश्रा साहब और उनकी कमेटी को प्रतिक्रांतिकारी ज्यादा सूट करता। “सांप्रदायिक फासीवाद के विरुद्ध” को भी कमेटी ने आपत्तिजनक करार दिया। तो क्या किसी भी राजनीतिक पार्टी से सांप्रदायिक फासीवाद के विरुद्ध होने के बजाय सांप्रदायिकता के साथ होने की अपेक्षा होगी, इस सरकारी कमेटी की? गौ रक्षा ने नाम पर भीड़ हत्याओं का जिक्र भी उक्त कमेटी को आपत्तिजनक लगा। लिखे हुए पर आपत्ति क्यों करते हैं, जनाब ! जब उन्मादी भीड़ ऐसी नृशंस वारदातों को अंजाम दे रही थी, तब यह तंत्र आपत्ति करता तो शायाद ऐसी बात लिखने की नौबत ही नहीं आती। 

पंफलेट पर आपत्ति वाले निशान।

एमसीएमसी के प्रभारी अधिकारी और सूचना विभाग के उपनिदेशक योगेश मिश्रा की अगुवाई वाली कमेटी संभवतः उन परंपरागत परिवारों को अपना प्रेरणास्रोत समझ बैठी जहां ससुर और जेठ का नाम लेने पर पाबंदी होती है। जनाब मिश्रा साहेब, न तो प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार देश के ससुर और जेठ हैं और ना ही विपक्षी पार्टियों की स्थिति उत्पीड़ित बहू जैसी है, जिसे इनका नाम लेने से ही रोक दिया जाये! विपक्षी पार्टी यदि सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं करेंगी तो क्या चुनाव आयोग के तहत काम करने वाले एमसीएमसी जैसे निकाय और योगेश मिश्र जैसे अफसर, उनसे सरकार के स्तुतिगान की अपेक्षा करते हैं ? आज सरकार की नीतियों पर टिप्पणी करने पर रोक लगाई जा रही है, कल को मिश्रा साहब जैसा ही कोई अफसर कह देगा कि विपक्षी पार्टियां चुनाव भी लड़ कर क्या करेंगी? मोदी जी लड़ तो रहे हैं चुनाव, कितना अच्छा लड़ रहे हैं,पूरे पांच साल चुनाव प्रचार के ही मोड में रहे !

पंफलेट पर आपत्ति वाले निशान।

यह हैरतअंगेज है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने का जिम्मा चुनाव आयोग ने ऐसे अफसरों के हाथ सौंपा है, जिनकी प्रतिबद्धता नियम और कायदों से ज्यादा सत्ता में बैठे लोगों के प्रति नजर आती है। आदर्श आचार संहिता का बिन्दु संख्या 4.3.1 तो कहता है कि व्यक्तिगत जीवन की आलोचना नहीं होनी चाहिए। हिंसा, घृणा को बढ़ावा देने वाली बात नहीं होनी चाहिए। तो नैनीताल जिले की एमसीएमसी के पास चुनाव संचालित करने के लिए कोई अन्य संहिता है,जिसके दम पर वे पूरा पर्चा ही बदलने को कह रहे हैं ? 

ये सरकार के अफसर हैं, जो सुझाव दे रहे हैं कि सरकार की आलोचना करनी हो तो भारत सरकार लिखिए, मोदी सरकार मत लिखिए। क्या किसी राजनीतिक पार्टी का भारत सरकार की आलोचना करना वाजिब है, लेकिन मोदी सरकार की आलोचना करना गैरवाजिब है? मिश्रा जी बताएं कि उनके जैसे अफसर भारत सरकार या उत्तराखंड सरकार से तनख्वाह पाते हैं या कि मोदी और त्रिवेन्द्र रावत सरकार के ? 

माडल कोड।

इस मामले से देश के लोकतन्त्र के मुकुट पर एक और कलगी, एमसीएमसी के प्रभारी अधिकारी और सूचना विभाग के उपनिदेशक योगेश मिश्रा की अगुवाई वाली कमेटी ने लगा ही दी है! मिश्रा जी जैसे अफसरों को कोई बताए कि वे जिस कमेटी के प्रभारी बनाए गए हैं, उस एमसीएमसी का अर्थ- मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी है, मोदी सर्टिफिकेशन एंड मैनिजिंग कमेटी नहीं है!

(इंद्रेश मैखुरी उत्तराखंड में सीपीआई (एमएल) के चर्चित नेता हैं।) 










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