संवेदनहीन सिस्टम की लाश इस बार साइकिल पर

ज़रा सोचिए... , , बुधवार , 26-04-2017


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बद्रीनाथ वर्मा

अपनी पत्नी का शव कंधे पर रखकर पैदल चलते दाना मांझी और उनके पीछे बिलखती चलती उनकी बेटी की तस्वीरें तो आपको याद ही होंगी। अभी बहुत दिन नहीं हुए सिर्फ आठ महीने पहले का यह वाकया है। इसके ठीक बाद एक और तस्वीर आई थी जिसमें कानपुर के एक नामी गिरामी अस्पताल में एक बीमार बच्चे को स्ट्रेचर तक नहीं उपलब्ध हो पाई थी। बुखार से तप रहे उस बीमार बच्चे को अपने कंधे पर लादे उसके मजबूर पिता कभी इस डॉक्टर के पास तो कभी उस डॉक्टर के पास चक्कर लगाते रहे। अंत में पिता की बेबसी देख उस अभागे बच्चे ने अपने पिता के कंधे पर ही दम तोड़ दिया था। अगर जरा सी भी संवेदनशीलता दिखाई गई होती तो बच्चा बच सकता था। लेकिन घंटों तक अपने कलेजे के टुकड़े को कंधे पर लादे इधर-उधर भटकने व डॉक्टरों की चिरौरी करने के बाद अंत में उसी अस्पताल के एक डॉक्टर ने देखा और बच्चे को मृत घोषित करते हुए अफसोस जाहिर किया कि यदि दस मिनट पहले आ जाते तो बच्चे की जान बचाई जा सकती थी।  

एक सूबा नहीं पूरा देश

ऊपर के दोनों वाकयों में समानता बस इतनी भर है कि दोनों ही मामलों में सिस्टम की संवेदनहीनता उजागर हुई थी। वर्ना कहां कालाहांडी और कहां कानपुर। दोनों स्थानों के दरम्यान हजारों किलोमीटर की दूरी। एक ओडिशा में तो दूसरा उत्तर प्रदेश में। एक अत्यंत पिछड़ा तो दूसरा एशिया का मैनचेस्टर कहा जाने वाला। इन दोनों घटनाओं का जिक्र करने का अभिप्राय यहां बस इतना है कि इनसे केंद्र के साथ कई राज्यों की सत्ता में काबिज व देश को कांग्रेस मुक्त करने पर उतारू भाजपा किनारा कर सकती है कि ये घटनाएं उन राज्यों की हैं जहां उसकी सरकार नहीं था। सच भी है। ओडिशा में नवीन पटनायक की सरकार है तो उत्तर प्रदेश में उस वक्त अखिलेश यादव की सरकार थी।

मुख्यमंत्री का क्षेत्र भी अछूता नहीं

लेकिन जो नई तस्वीर सामने आई है उससे भाजपा बच नहीं सकती। ताजा मामला असम का है, जहां भाजपा की सरकार है। सोशल मीडिया में वायरल हुई एक तस्वीर में एक शख्स अपने 18 साल के भाई के शव को साइकिल पर बांधकर ले जा रहा था। आश्चर्य इस बात का है कि जिस इलाके की यह घटना थी वह राज्य के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के विधानसभा क्षेत्र का है। मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र के माजुली में एक शख्स सरकारी अस्पताल से अपने 18 वर्षीय भाई के शव को साइकिल पर बांधकर ले गया। कहने को तो यहां 108 नंबर पर एंबुलेंस सेवा उपलब्ध है, लेकिन गरीबों व असहायों को भेड़-बकरी से अधिक अहमियत न देने वाले सिस्टम को इससे क्या फर्क पड़ता है। भाई को असमय खो चुकने वाले उस अभागे ने एंबुलेंस सेवा पर फोन लगाया लेकिन उसकी गुहार किसी ने नहीं सुनी। अंत में उसने साइकिल पर बांधकर ही अपने भाई के शव को अपने घर ले जाने का निर्णय लिया।  

प्रशासन नींद से जागा

जैसा कि होना था। इस तस्वीर के वायरल होने के बाद प्रशासन की नींद खुली और उसके बाद वह इसकी जांच में जुट गया। माजुली जिले के डीसीपी पल्लव गोपाल झा के मुताबिक साइकिल से लाश ले जाने वाले मामले की जांच दो बिंदुओं पर हो रही है। पहला यह कि क्या लाश को घर तक ले जाने के लिए 108 नंबर पर एंबुलेंस पर कॉल करने की बात सच है और दूसरा कि क्या अस्पताल के कर्मचारियों ने लाश को साइकिल से बांधते देखा था।

बीजेपी के लिए अच्छे संकेत नहीं

बहरहाल, हद तो यह कि प्रशासन की जांच टीम जब उस शख्स के घर जा रही थी तभी रास्ते में बना पुल गिर गया। यह पुल बांस का बना था। इस दुर्घटना में राज्य स्वास्थ्य विभाग के डायरेक्टर तो बाल-बाल बच गये लेकिन टीम के कई अन्य सदस्य घायल हो गये। एक तरफ जहां लाश को साइकिल से घर ले जाने की घटना चैंकाती है, वहीं दूसरी तरफ पुल के टूट जाने की घटना सोनोवाल सरकार के कामकाज पर सवलिया निशान खड़े करती है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि विकास के वादे के साथ यह सरकार सत्ता में आई है। पूर्वोत्तर के इस प्रवेश द्वार पर अगर सवालिया निशान खड़े होते हैं तो फिर यह भाजपा की राजनीतिक सेहत के लिए ठीक नहीं होगा।

(बद्रीनाथ वर्मा वरिष्ठ पत्रकार)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 










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