हुजूर भगवान से एक मुलाकात, मैं धन्य हो गया...!

पड़ताल , , शनिवार , 26-08-2017


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पुष्पराज

सच्चा सौदा डेरा की डायरी जून, 2004, सिरसा, हरियाणा

हरियाणा का सिरसा पर्यटन का केन्द्र तो नहीं है पर अगर आप पत्रकारिता से जुड़े हैं और मूल्यपरक पत्राकारिता से आपकी किसी तरह की आपसदारी है तो सिरसा आपके लिए एक तीर्थ की जगह हो सकती है। पत्रकारिता की एक लीक आजाद भारत में सिरसा से शुरू होती है जो जल्दी ही खत्म हो सकती है अगर हम आप सबने मिलकर उस लीक को बचाने की कोशिश नहीं की। सिरसा को पत्रकारिता का तीर्थ आप इस तौर पर मान सकते हैं कि इस सिरसा के पत्राकार रामचंन्द्र छत्रापति ने सच लिखने के आरोप में अपनी शहादत दी है। 21 नवम्बर 03 को मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी ने छत्रपति की पहली बरसी पर छत्रपति की शहादत को माथा टेकते हुए हम सबको चेताया है- पत्रकारिता के सामने छोटे-बड़े हिटलर खड़े हैं आप अगर इन हिटलरों से नहीं लड़ेंगे तो अपनी प्यारी पत्रकारिता को घुन खा जायेगा। प्रभाष जोशी की चुनौती को अगर आप स्वीकार करते हैं तो सिरसा की तरफ मुड़िये।

सतसंग में जुटे श्रद्धालु।

छत्रपति की शहादत के बारे में कुछ भी जानने के लिए हमें शहादत के वजहों की तह में जाना पड़ता है और उन कारणों की जड़ में पहुंचने पर परिणाम हमें खबरदार करता है। छत्रपति के निकट मित्र हरियाणा के प्रतिष्ठित अधिवक्ता लेखराज ढोट कहते हैं छत्रपति को याद करने का मतलब ही है सच्चा सौदा डेरा और उनकी धमकियों के खिलाफ लिखना। सच्चा सौदा डेरा का भूत अगर इतना डरा रहा है। इस भूत का खौफ अगर पत्राकारिता के लिए इतना भयानक है तो हमें खौफ का निकट दर्शन जरूर कर लेना चाहिए। डेरा है और डेरे में सच की सौदेबाजी है सब कुछ खुला-खुला है तो क्या अंदर जाना और सब कुछ अपनी खुली आंखों से देख लेना भी उतना ही आसान है। रामचन्द्र छत्रपति की हत्या के बाद हरियाणा के पत्रकारों की महापंचायत ने डेरा का हुक्का-पानी तो बंद किया ही, कुछ डेरा चारण पत्रकारों को पत्रकार बिरादरी से निकाल बाहर भी किया। महापंचायत के कठोर फैसले से पत्रकार विरादरी से निकाल बाहर हुए पत्रकार डेरा की कमेटी, प्रबंध कार्यकारिणी कमेटी और डेरा के मुख पत्र ‘सच कहूं’ की पत्रकारिता में लग गये हैं। प्रेस कमेटी के मान्यवर आपका डेरा का दर्शन करा सकते हैं। शर्त यह है कि आपके बारे में यह तय हो कि आप डेरा के पक्ष में ही लिखने वाले हैं। हम सोचते हैं सिरसा में छत्रपति की शहादत को सलाम कर लौटने के साथ उस ‘सच्चा सौदा डेरा’ के सच को निहार लेना भी उतना ही जरूरी है जिसके सौन्दर्य का सारा छद्म छत्रपति को मालूम हो चुका था। तीसरे दिन की कोशिश पर जगदीश सिंह सिंह, पवन बंसल, रामाश्राय गर्ग नामक तीन चेहरे गेस्ट हाउस पधारे हैं। ये जन सच्चा सौदा डेरा प्रेस कमेटी के सदस्य हैं और नये आगंतुक की विश्वसनीयता को परखने का पूरा हक है। हमने तय किया है हमें सच की सौदेबाजी का दर्शन करना है तो आज हर तरह का झूठ बोलने के लिए तैयार रहना होगा। हमारी वाकपटुता से वे मुग्ध् हो चुके हैं। किसी ने फोन से कहीं कोई इंडीकेशन दिया है क्या भगवान गुरमीत राम रहीम सिंह को हमारे बारे में बता दिया गया है। जगदीश सिंह सिद्धू ने मार्केट कमेटी के गेस्ट हाउस को छोड़कर डेरा के एसी गेस्ट हाउस में ही टिकने का अनुरोध किया है और एक दिन नहीं अपनी मर्जी से दो, चार दिन, हफ्ते।

सतसंग में जुटे श्रद्धालु।

 गर्मी काफी है, धूप में तपन है। वातानुकूलित स्टीम की ठंडई लूटते हुए दोपहर के भोजन के लिए हमें डेरा का आतिथ्य स्वीकार करना चाहिए। डेरा का अपना व्याकरण है, अपना शब्दकोश है। डेरा के परिसर क्षेत्र में सिरसा को सरसा लिखा जाता है। क्या पूरा सिरसा जब डेरा के कब्जे में होगा तो सिरसा बदलकर सरसा हो जायेगा। ‘सच कहूं’ डेरा का दैनिक समाचार पत्र है। समाचार पत्र है, अपना आफसेट है। हमें बताया जा रहा है पंजाबी गुरुमुखी और हिन्दी सहित रोज डेढ़ लाख सच कहूं छपते हैं। अपने हाथ में सच कहूं का एक विशेषांक है। तस्वीरें आलीशान किलानुमा इमारतों की हैं और इन तस्वीरों के बीच में खबर का शीर्षक है ‘गर्ल्स स्कूल या परीलोक’। थोड़ा विस्मय हुआ जरूर पर जल्दी ही सतर्क हो गया। यह सच का डेरा है, यहां झूठ कुछ भी नहीं है। यहाँ डेरा बेटियों को परी कहकर संबोधित करता है। डेरा के व्याकरण में बेटी को परी कहते हैं, तो हमें क्यों ऐतराज। हरियाणा समाज ने इन्हें इतनी छूट दी है। यह ‘सच कहूं’ डेरा के कच्चे चिट्ठे को परत-दर-परत उघाड़ने में लगे पूरा सच का जवाब ही है।

डेरा के भीतर का दृश्य।

   डेरा आने वाले अमीर सात संगतों के लिए ट्र वर्ल्ड की रंगीन हसीन दुनिया का आनंद लेना जरूरी है। स्वीमिंग पूल, नाचते झूले, कशिश रेस्टोरेंट का हसीन संसार। 140 कमरों का वातानुकूलित गेस्ट हाउफस। अंदर की दुनिया आपको एक पल के लिए फूलों के गुलदस्तों की तरह दिख सकती है। दो वर्ष पहले डेरा के पांच सात संगतों ने मिलकर महाराज जी के अर्शीवाद से सब कुछ बनाया है। कशिश रेस्टोरेन्ट में हम खाने के लिए बिठाए गए हैं। बाहर दूसरी दुनिया दिखती है। दायें बाजू शीशे का घेरा है और घेरे से बाहर पानी भरा है। चारों तरफ पानी भरे छोटे तालाब के बीच शीशे के घर में होकर हम जो देख रहे हैं, आप भी देखिए। शीशे पर पानी का रंग हरा-हरा दिखता है। आप हमें अभी बाहर से देख रहे हें तो हम मछलियों की तरह दिख सकते हैं। सोचिए ट्रन्न वर्ल्ड की दुनिया का प्रवेश ही इंसान को मछली बना देता है और अपन इक्वेरियम में कैद हो जाते हैं। बाहर वाटर स्लेटिंग, स्केटिंग करती लड़कियां दिखती हैं। जिनके देह के कुछ खास हिस्से कपड़ों के बिना हैं, वे हम महलियों को इस समय कितने अच्छे लग रहे हैं। सच्चा सौचा डेरा का दर्शन कराने वाले कृपावंत इस दुनिया में आकर हमारी पूरी पत्रकारिता एक पल के लिए निहाल हो सकती है। इधर 200 से ज्यादा भैंसे हैं, गायें हैं, सेवादार साधु हैं। डेरा वाले दूधो नहायो पूतो फलो। सच नर्सरी के अंदर सेवादार एक-एक पौधे को नया रूप देने मे लगे हैं। अंगूर, सेव, चीकू, लीची, लौंग, अमरूद, बादाम, शहतूत, नारियल यहाँ सब कुछ है। युवती कन्या बहनें गुलाब की पंखुड़ियों को गुलकंद बनाने के उपक्रम में लगी हैं। हमसे कहा गया युवती कन्या बहनों को साध्वी कहा जाये। डब्बे में पैक हो रहे गुलकंद और शहद का व्यापार लगातार बढ़ता जा रहा है। इस गुलकंद, शहद के व्यापार का क्या हिसाब है। साधु निर्मल कहते हैं- सब दातार की कृपा है, सब प्रभु की चरणों में। सच नर्सरी के अंदर एक दफ्तर है। यहां डेरा प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम की तस्वीरें सजी हैं। 23 वर्ष की उम्र में डेरा प्रमुख बनने वाले बाबा गुरमीत अभी युवा हैं और युवा बाबा तस्वीरों की दुनिया में खूब फबते हैं। मुस्काते बाबा, ट्रैक्टर चलाते बाबा, फावड़ा चलाते बाबा। अलग-अलग पोज के लिए अलग-अलग रंग बिरंगी पोशाकों में हंसते खिलखिलाते महाराज तस्वीरों की दुनिया में आज भी खूब जमते हैं। पानी, पहाड़, जंगल, उगते सूरज और डूबते सूरज को निहारते महाराज...।

  प्रेस कमेटी का दफ्तर सुव्यवस्थित है। फोन, फैक्स, इंटरनेट, एसटीडी, आईएसडी आगंतुकों के आतिथ्य के सब उपलब्ध हैं। पत्रकारों की महापंचायत से पत्रकार बिरादरी से निकाल बाहर हुए पत्रकार डेरा के पत्रकार हुए और हरियाणा के कुछ अखबारों ने डेरा की खबरों के लिए अपने डेरा खास संवाददाता भी नियुक्त किए। अश्रीत समाचार ;हिन्दी के संवाददाता विजय प्रेस कमेटी के प्रभारी हैं। सच्चा सौदा डेरा पर निर्मित फिल्म ‘सर्व धर्म संभाव का केन्द्र डेरा सच्चा सौदा’। दावा किया जा रहा है बाबा के चरणों में नामदान लेने वाले लाखों लोग रोगमुक्त हो चुके हैं। डेरा सिनेमा में हजारों एकड़ की खेतीबाड़ी, पेट्रोल पंप, मोर्केटिंग कांप्लेक्स, कई छोटे बड़े उद्योग, स्कूल, कॉलेज, मैनेजमेंट संस्थानों का समृद्ध-संपन्न संसार दिखाया जा रहा है। सिनेमा कहता है। डेरा की सारी आय देश भर के दीन-दुखियों के राहत में खर्च होता है। इस सिनेमा को आप भी देखिये और सोचिए अगर अपने मुल्क में दीन-दुखियों का दुख दूर करने का इतना बड़ा उपक्रम शुरू है तो आप भी इस पुण्य में क्यों नहीं हिस्सेदार बनें। दीन दुखियों का दुख जल्दी ही दूर होनेवाला है। संत हुजूर गुरमीत राम रहीम जी महाराज की जय कहिये।

 पत्रकार छत्रपति।

सच्चा सौदा डेरा के लाखों भक्त जिन्हें इंसान से ऊपर भगवान मान रहे हैं। उन भगवान के खिलाफ साध्वी के यौन शोषण का आरोप कितना जायज है। एक गुमनाम साध्वी के पत्र का रामचंद्र छत्रपति की शहादत से क्या रिश्ता है। वह गुमनाम साध्वी कब तक गुमनाम रहेगी। जब अज्ञात साध्वी के पत्र से गुरमीत राम रहीम के किस्से बाहर आये तो हरियाणा में बड़ा बवाल मचा। डेरा और समाज आमने-सामने हुए। डेरा भक्त, डेरा विरोधियों का टकराव सड़क से हाइकोर्ट तक पहुंचा। चंडीगढ़ हाइकोर्ट ने गुमनाम साध्वी के पत्र को अति गंभीर मानते हुए 24 सितंबर 02 को डेरा प्रमुख के यौनाचार के आरोप की जांच के लिए सीबीआई को छः माह का समय दिया। डेरा सच्चा सौदा की ओर से कहा गया जांच का विषय है क्या वह पत्र किसी लड़की ने लिखी है या किसी पुरुष ने? डेरा सच्चा सौदा की ओर से उच्च न्यायालय में जिन 8 साध्वियों ने याचिका दायर कर सीबीआई जांच का पुरजोर विरोध किया था । उन 8 साध्वियों में एक शीला पुनिया से मिलना हमारे लिए अद्भुत मुलाकात है। शीला पुनिया ने सीबीआई की विश्वसनीयता पर संदेह करते हुए हरियाणा पुलिस की सीआडी से जांच कराने का आग्रह किया था। यह अलग बात है कि अदालत ने इस बेवकूपफी भरी याचिका को खारिज कर दिया था। शीला पुनिया उस गर्ल्स स्कूल की प्राचार्या हैं जिसे डेरा के मुख पत्र ‘सच कहूं’ ने परी लोक की संज्ञा दी है। पुनिया बताती हैं, अम्बाला में एमए, बीएड, कंप्यूटर कोर्स कर डेरा भक्त पूर्व न्यायाधीश पिता के संपर्क से विद्यालय की टीचर बनी और अब प्राचार्या हैं। हमने सवाल किया, आप डेरा की वेतनभोगी प्राचार्या हैं, नहीं मैं साध्वी हूं ।

      प्र. - एकाकी जीवन में कोई युवती कैसे ज्वॉय फील कर सकती है ?

      शीला पुनिया - मेरे गुरूजी पूर्ण संत है, इसलिए मैं संतुष्ट हूं ।

      प्र. - क्या स्कूली लड़कियों को भी साध्वी बनने के लिए प्रेरित करती हैं ?

      शीला - सबको अपनी मंजिल बता दी जाती है । अपनी राह चुनना सबकी मनमर्जी पर है। यहां 2000 लड़कियां हैं, किसी पर दबाव नहीं है । कनाडा में रह रहे पिता भी अपनी बेटियों को यहां भेजकर सुरक्षित महसूस करते हैं । कुछ मेधावी लड़कियां हैं जो रोज मजलिस में जाती हैं ।

      प्र. - वैवाहिक जीवन के बिना आपकी संतुष्टि का रहस्य क्या है ?

      शीला - देखिए इस समय मजलिस का टाइम हो रहा है । बाबा जी सारे सवालों का जवाब दे देंगे। बाहर दो बस खड़ी है। सेवादार जज साहब आपने पढ़ी लिखी इल्म वाली बेटी को बाबा के चरणों मे सौंप दिया। अब आपकी बेटी मैडम पुनिया बसों में चुनिंदा लड़कियों को साथ कर साध्वी की अगली पीढ़ी तैयार कर रही है। हमने पूछा मेधावी लड़कियों का सेलेक्शन ;चयनद्ध अच्छा है। सब खूबसूरत हैं। मैडम ने कहा जो खूबसूरत होती हैं वही मेधावी होती हैं। परीलोक की चुनिंदा परियां साध्वी होने का प्रशिक्षण लेने मजलिस में शामिल हैं । मैडम ने चलते हुए नहीं भूलने वाली हंसी के साथ कहा आप भी मजलिस में जरूर चलिये। आपको भी पता चल जायेगा कि बाबा जी सचमुच पूर्ण संत हैं ।

मंत्री अनिल विज के साथ बाबा।

  मजलिस लगी है, दस हजार से बड़ी सात संगतों की भीड़ इंतजार कर रही है। बाबा जी साढ़े पांच में आयेंगे। मैडम शीला पुनिया एम.ए., एम. फिल साध्वियों के साथ बाबाजी के राज सिंहासन की तरफ टकटकी लगाये बैठी हैं । मैडम की देह पर कपड़ा भी है पर कपड़ा इतना ही रंगीन है कि दूर से देखने पर चमकते चेहरे की तरह देह भी चमकने लगता है। कई हैं, जिनके देह रूप सौन्दर्य सौष्ठव मैडम पूनिया से मेल खाते हैं। गीतों की महफिल खत्म हुई तो कहा गया बाबाजी आ रहे हैं। महिलाओं की भीड़ एक तरफ, पुरुष दूसरी तरफ। टीन चादरें की स्थायी छत । 10 हजार की इस भीड़ में हम अकेले नये सात संगत हैं। यह हर रोज सुबह-शाम की मजलिस का एक हिस्सा है । लोगों के पास इतना समय है कि सुबह शाम महाराज जी का प्रवचन सांस की तरह ग्रहण करते हैं । जो आया है, वह भूखा नहीं जायेगा । सबके लिए लंगर है । जी प्रसाद लेकर जाना है जी । सेवादार जिसे यहां लगना है, सेवा में लगा है ।

      महिलाएं पंखा झुला रही हैं । पांच हाथ लंबा कपड़े का भारी पंखा हिलाते आप जल्दी ही थक सकते हैं । महाराज जी सिंहासन पर विराजे तो सबने हाथ जोड़कर आंख मूंदकर माथे को धरती पर नवाया । सिंहासन पर विराजे हुजूर महाराज हाथ सामने हिलाते हैं, सब धन्य हो रहे हैं, मैं भी धन्य हो गया । पसीने से तर-ब-तर सेवादार भारी पंखा झुलाते थकता है तो दूसरा खड़ा हो जाता है । महाराज जी खुद मयूर के पंख से अपनी लंबी लहलहाती दाढ़ियों को हवा पिला रहे हैं । सर पर लाल-हरा कसीदेदार चमकती टोपी है । टेबुल पर फूलों का सुंदर गुलदस्ता, सिंहासन के पीछे परदे पर चकमते चकमक सितारे और सितारों की तरह चमकती हुजूर की आंखें । अभी जो हो रहा है पूरा शहर देख रहा है । हुजूर सिरसा को जिलाते हैं, सिरसा की सांस हुजूर से चलती है । साध्वी शीला पुनिया के पूरण आनंद को बाकी लोग प्रभु अवतार भगवान मानते हैं । मैं जीवन में पहली बार किसी सक्षात भगवान को अपनी आंखों से देख रहा हूं । आप सब भी जानिए भगवान परलोक में नहीं सिरसा में रहते हैं । अभी जो सेवादार भगवान को पंखा झेल रहा है एक अवकाश प्राप्त न्यायाधीश है ऐसा बंसल जी बता रहे हैं। जीवन भर न्याय बेचने की नौकरी करने वाले पंच परमेश्वर भगवान के चरणों में तृप्त हो रहे हैं। अभिजन समाज ने 6 से 7 साल की नन्ही बेटियों को सिंहासन के सामने भेज दिया है । यही नन्ही बेटियां है जो कल गर्ल्स होस्टल जाकर परी हो जायेंगी । स्वर्ग लोक में नृत्य करती परी शिशु कन्याएं भगवान को रिझा रही हैं । संगीत की धुन पर नृत्य भगवान की आंखों को आराम देता है । हमें बताया जा रहा है कि आज हमें मानसिक शांति मिलेगी भगवान हमारा सारा दुख हर लेंगे । हम सोचते हैं अगर आज हमें चंगा कर दिया जायेगा तो इस भगवान को पूरे मुल्क में ले चलो । अपने मुल्क को चंगा करो, भगवान आ रहे हैं। 

खट्टर के साथ बाबा।

 संगीत का स्वर अचानक थम गया, कोलाहल कम हो गया । भगवान बोलने लगे इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है । जो आया है वह जायेगा, खत्म हो जायेगा । एक दिन सबको रवाना होना है । दिल किसी का नहीं करता संसार को छोड़ने को । संसार सबको मीठा लगता है । कोई व्यापार कर बाजार से लौट जाता है, इंसान इसी तरह संसार में आया है । जो दुख जन्म लेने और शरीर छोड़ने में आत्मा को है, वह अति दुखदायी है । ;भगवान ऐंड़ी नोचते हैं, भगवान को खुजली भी होती है आत्मा छोड़ते समय शरीर को सैकड़ों बिच्छू-सांप काटने जैसा दुख होता है । ऐसा हिन्दू धर्म कहता है । मुस्लिम धर्म कहता है कंटीले झाड़ियों को मुख से होकर गुदा मार्ग से गुजरने तरह का दुख मौत से आत्मा को होता है । भगवान को खतरा है । आधे दर्जन स्टेनगनधरी, राइफलधारी आजू-बाजू तैनात हैं । भगवान आज मृत्यु दर्शन पर बोल रहे हैं । क्या मुझे मौत से डरना चाहिए ? प्यार मोहब्बत मत करो । साजो-सामान के मोह-लाभ में मत फंसो । मालिक के साथ प्यार बढ़ाओ, तुम्हारा नाम अमर हो जायेगा, दुनिया से बढ़ाओगे, दुख बढ़ेगा । तुम राम-नाम अल्ला या, वाहे-गुरू से जुड़ो, कभी पतझड़ नहीं आयेगा । लोगों ने कहा-वाहे गुरू, धन-धन सतगुरू तेरा ही आसरा...! भगवान गुफा से निकले थे, गुफा में समा गये ।

  भगवान गुफा में चले गये हैं क्या अब हम भगवान से मुलाकात कर सकते हैं ? भगवान के प्रेस प्रवक्ता आदित्य अरोड़ा कहते हैं हुजूर भगवान की ओर से वे हर सवाल का जवाब देंगे । पत्रकारिता का मतलब हर हाल में सच होता है लेकिन ऐसा सच नहीं जो लोगों की भावना को ठोकर मारे । कुछ लोगों की भावना को ठेंस लगी और ऐसे में कुछ बेवकूफी की गयी तो उन बेवकूफों को बख्शा नहीं जाना चाहिए । महाराज जी तो पशु-पक्षी क्या चीटियों को भी देखकर रास्ता बदल लेते हैं ।

      — लेकिन प्रवक्ता महोदय हमें सवालों का जवाब सीधे भगवान से चाहिए क्योंकि आरोपी भगवान हैं ?

      — देखिए हमारे डेरे का अपना प्रोटोकोल है । संतों का फकीरों का अपना जीवन होता है । संतों के पास राम नाम का धन होता है । संतों को मांपने का एक ही पैमाना है । संतों ने जो राह दिखायी है, उस पर चला जाये ।

      — प्रवक्ता महोदय देश में भूमिगत लड़ाई लड़ने वाले नक्सली भी अपना जीवन गोपनीय नहीं रखते फिर किसी संत-फकीर के निर्मल जीवन को छुपाने की जिद क्यों ?

      — देखिए बाबा जी जहां रहते हैं, वहां तक मुझे भी जाने की अनुमति नहीं है फिर आप कैसे जा सकते हैं ? किसी घर के कायदों में हस्तक्षेप ठीक नहीं ।

      — यह घर नहीं किसी संत-फकीर का आश्रम है । किसी संत के जीवन को जानना पत्राकारिता का धर्म है । आप वैधानिक तौर पर गलत कर रहे हैं ।

      — आप परेशान मत करिये । आप ई-मेल से सवाल करिये, सही-सही जवाब दिया जायेगा ।

      — लेकिन गुफा के भीतर जाकर हुजूर से मिलने की पाबंदी क्यों ?

      — बाबाजी कंसट्रक्सन के कामों को खुद देखते हैं फिर मजलिस की व्यस्तता अलग । बाबा बहुत थक जाते हैं । संत-फकीर को उनके गुरू वचन से जानिए परखिए ।

      — आप समझते हैं, गुफा के अंदर हमें जाने की इजाजत नहीं देने से डेरे के प्रति गलतफहमी बढ़ती है ।

बाबा राम रहीम के ठाट बाट।

      — आप कुछ भी लिखने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने से बचना चाहिए । बाबा जी के गुफा के अंदर देश के किसी प्रेस, किसी पत्रकार को प्रवेश की इजाजत नहीं है यह देश भर में प्रचार कर दीजिए । हमें इच्छी तरह मालूम है आप डेरा के खिलाफ लिखने आये हैं । आपको मालूम होना चाहिए मैं भी एमबीबीएस डॉक्टर और पॉयनियर का खोजी पत्रकार रहा हूँ । गर्ग कहते हैं महाराज जी के बारे में प्रेस ने ऐसे गलत लफ्ज लिखे कि लाखों भक्तों ने हफ्ते खाना नहीं खाया । तो क्या महाराज जी के लिए गलत लफ्ज लिखने वाले पत्रकार की हत्या पर भक्तों को खुशी हुई होगी? भक्तों ने छत्रपति की हत्या पर जश्न मनाया ? गर्ग चुप रह गये । सिद्धू ने कहा-छत्रपति भी केाई अच्छा आदमी नहीं था ।

  प्रेस कमेटी के मान्यवरों ने कहा आपको गुफा के अंदर जाने की जिद नहीं करनी चाहिए । चलिये आपको बाहर से दिखा देते हैं । गुफा के अंदर है ही क्या कि देखना जरूरी है । बस दो कमरे की कुटिया । महाराज जी का सीध-सादा जीवन है । 50 हजार लोगों के साथ बैठने का सतखंज हॉल देखते हुए हम गुफा की तरपफ बढ़ रहे हैं । दो उजले-चमकते हाथियों का आपस में जुड़ता हुआ सुर प्रवेश से पहले का तोरण द्वार है । धरातलीय सतह से 40 फीट ऊंचाई पर चमकता-जगमगाता किला । रास्ता नीचे से ऊपर की तरफ ढ़ाल की तरह चढ़ता है । हर 10 गज की दूरी पर एक सुरक्षा प्रहरी वॉकी-टॉकी और जरूरी शस्त्रों के साथ...! जिसे उन्होंने गुफा कहा है, वह गुफा नहीं किला है । मजबूत लौह फाटक की आकृति किला के द्वार पर गुफा की तरह दीखती है। लौह द्वार पर लौह निर्मित केले के पेड़ों में बड़े-बड़े केले लटक रहे हैं । किनारे कोने में 25 फीट ऊंचा दो उजला हंस खड़ा है । सामने 15 फीट ऊंचा प्याला पड़ा है । हंस को देखकर हम आशावान होते हैं । एक दिन हंस दूध का दूध, पानी का पानी कर देगा ।

अभिनेत्रियों के साथ बाबा।

 हम गुफा के पास से होकर देख रहे हैं । जिस राह से होकर हम गुजर रहे हैं, यह एक डेग चैड़ी है और नीचे 30 फीट गहरी कृत्रिम घाटी है । दूध की तरह चमकते संगमरमरी किले के सौन्दर्य को देखिये और फूंक-फूंककर चलने का अभ्यास भी करिये । किसी भी तरह की अनहोनी कुछ भी आश्चर्य नहीं । सिरसा के कुछ पत्रकारों ने हमें पहले ही बताया है कि डेरा के बाहर हर माह एक-दो आज्ञात लाशें मिल जाती हैं और डेरा के अंदर भी अंत्येष्टि की बेहतर व्यवस्था है । हमने डेरा के भीतर छत्रपति का कभी नाम नहीं लिया । गुफा के द्वार पर हम देख रहे हैं सुरक्षा कर्मी को कोई खास निर्देश दे रहा है । गुफा के प्रवेश द्वार के बायीं तरफ कुछ खूबसूरत साध्वी बहनें अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं । भगवान के प्रवक्ता कहते हैं गुफा के अंदर कोई नहीं जा सकता है तो साध्वी बहनें आप अपनी बारी का इंतजार क्यों कर रही हैं । रात ढ़लती जा रही है, गुफा का सौन्दर्य बढ़ता जा रहा है । गुरूजी को पूरन आनंद बताने वाली शीला पुनिया गुफा के बाहर इंतजार की कतार में खड़ी हैं ।

  डेरा परिसर में बाहर सातसंगत विचर रहे हैं। चेहरे पर कुछ अचेतनता दिखी । हमने हिलाया तो कहा-उफं, फिर देह हिलाया तो ऐं, ऐं, ऐं...! बाद में एक रिक्शा चालक ने इस उफं, ऐं का रहस्य बताया-बुक्की ;अफीम के दाने का कमाल है । डेरा भक्तों के लिए बुक्की डेरा की तरफ से प्रसाद है । भगवान मस्त हैं पूरण आनंद में, भक्त बुक्की फांककर मगन हैं । वापसी में हम फिर कशिश रेस्टोरेंट लाए गए । दिन में इक्वेरियम की मछली होकर निकले थे । अभी ट्रू वर्ल्ड की सच्ची दुनिया में हम नाचती हुई दुनिया में पहुंचा दिए गए । कुर्सी-टेबल, खाते हुए लोग, पानी का तालाब, सब घूमते हुए चक्र पर घूम रहा है । हुजूर अपनी मजलिस में कहते होंगे - धरती गोल है, कुछ भी स्थिर नहीं है । सच्चा सौदा डेरा की सौदागिरी भी है तो सब साफ-साफ खुल्म-खुल्ला...!

बाब राम रहीम के आश्रम के भीतर का दृश्य।

      भगवान, साध्वी और डेरा...! हम जो देख रहे हैं आपको दिखा रहे हैं । जो धार्मिक विश्लेषक हैं वे कह सकते हैं कलयुग में भगवान का यह उदारवादी संस्करण है । क्या चंडीगढ़ और दिल्ली की सत्ता इस भगवान के लिए अंब्रेला की तरह है ? छत्रपति की हत्या अगर भगवान के आदेश से हुई है तो क्या इस लोकतंत्र में इस हत्यारे के लिए कोई सजा नहीं है ? छत्रपति हत्याकांड की जांच सहित डेरा प्रमुख के खिलाफ जारी सीबीआई की तीन-तीन जांच कारवाई किसके दवाब में पूरी नहीं हो रही है । भगत सिंह की लीक पर छत्रपति की शहादत को अगर आप सलाम कहने की हिम्मत रखते हैं तो साफ-साफ कहिये यह धर्म का डेरा नहीं धर्म का धोखा है । यह फरेब और व्यभिचार का अड्डा है । यह जुआ घर है इसे ध्वस्त किया जाये...!

(पुष्पराज पत्रकार हैं और नंदी ग्राम डायरी पुस्तक के लेखक हैं।)










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