सत्ता के गुलाम चुनाव आयोग से निष्पक्ष चुनाव की अपेक्षा बेमानी !

गुजरात की जंग , , शुक्रवार , 27-10-2017


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महेंद्र मिश्र

चुनाव आयोग मोदी सरकार के पक्ष में काम कर रहा है। ये सबको पता था। लेकिन इतने नंगे तरीके से काम करेगा इसके बारे में किसी को जानकारी नहीं थी। पहले बाढ़ का बहाना बनाकर हिमाचल प्रदेश के साथ गुजरात का चुनाव कार्यक्रम इसलिए नहीं घोषित किया गया जिससे प्रधानमंत्री मोदी और गुजरात की बीजेपी सरकार को आखिरी मौके पर चुनावी रेवड़ियां बांटने का मौका मिल सके। और अब जब मोदी ने अपनी लगातार दो यात्राओं के जरिये इस काम को पूरा कर लिया। तब आखिर में कार्यक्रम घोषित कर दिया गया। देश की एक विश्वसनीय संवैधानिक संस्था इस गति को प्राप्त होगी किसी ने सोचा भी नहीं होगा। जिस सत्ता के बिस्तर से टी एन शेषन और उनके बाद के दूसरे चुनाव आयुक्तों ने इस संस्था को बाहर निकाला था आज उसी का एक मुखिया फिर उसे वहीं पहुंचा दिया है।

सरकार के पक्ष में चुनाव आयोग न केवल अंधा और बहरा हो गया है बल्कि अब पूरी तरह से धृतराष्ट्र की भूमिका में है। आयोग सरकार को लॉलीपाप देने तक ही अपने को सीमित नहीं रखा। उसने बाकायदा सत्ता के पिट्ठू तमाम चैनलों को चुनावी सर्वे करने और उसमें बीजेपी की जीत दिखाने का भी मौका दिया। आखिरकार सारे चुनावी सर्वे चुनाव की घोषणा के एक रात पहले ही क्यों आए? क्या ये नहीं बताता है कि सरकार, चुनाव आयोग और चैनलों के बीच एक नापाक गठजोड़ है? जिसमें तीनों मिलकर काम कर रहे हैं। और उनकी पूरी मंशा जगजाहिर है।

और वैसे भी अगर किसी एक सूबे का चुनाव कार्यक्रम घोषित हो जाता है तो कहीं और किसी भी तरह का हुआ सर्वे उसको प्रभावित कर सकता है। ऐसे में इस तरह के सर्वे आचार संहिता की मूल भावनाओं के खिलाफ हैं। और इस मसले को अगर अब तक चुनाव आयोग ने नहीं देखा तो उसे फिर से इस पर गौर करना चाहिए।

इसी के साथ गुजरात में सरकार को मदद पहुंचाने और विपक्ष को कमजोर करने के लिए एक और साजिश रची जा रही है। जिसके तहत कांग्रेस से निष्कासित और पूर्व मुख्यमंत्री शंकर सिंह वाघेला ने अपने राजनीतिक मंच जन विकल्प का गठजोड़ राजस्थान में बनी एक अज्ञात पार्टी ऑल इंडिया हिंदुस्तान कांग्रेस पार्टी से करने का फैसला किया है। उनका कहना है कि वो उस पार्टी के चुनाव निशान ट्रैक्टर पर सूबे की सभी 182 सीटों पर अपने प्रत्याशियों को मैदान में उतारेंगे। अमूमन तो किसी पार्टी का अगर किसी एक सूबे में आधार है और क्षेत्रीय पार्टी का उसे दर्जा हासिल है तो उसे दूसरे राज्य में जहां कि उसका कोई आधार नहीं है, एक ही सिंबल देने का कोई औचित्य ही नहीं बनता है। बावजूद इसके अगर शंकर सिंह वाघेला इस तरह का कोई दावा कर रहे हैं तो उसको गंभीरता से न लेने का कोई कारण नहीं बनता है।

दरअसल अमित शाह कहिए या फिर किसी भी राजनीतिक दल के चुनावी रणनीति का ये अहम हिस्सा होता है। जिसमें वो विरोधी वोटों को बांटने के लिए उनके बागियों या फिर उनकी जाति, समुदाय के लोगों को खड़ा कर देता है। जिससे विपक्षी वोटों के बंटवारे की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे में अपने पक्ष को मजबूत करना और विपक्षी खेमे में विभाजन इसका प्रमुख सूत्र होता है। अब अगर चुनाव आयोग ऑल इंडिया हिंदुस्तान कांग्रेस को गुजरात में उसके चुनावी सिंबल पर लड़ने की अनुमति दे देता है तो बीजेपी और आयोग के बीच का नापाक गठजोड़ बिल्कुल पुख्ता हो जाएगा।

  • एमपी में वीवीपीएटी की भी खुल गयी पोल
  • निष्पक्ष चुनाव न होने की आशंका और गहरी हुई

दो दिनों पहले मध्यप्रेदश के एक चुनाव से पहले डिमांस्ट्रेशन के दौरान वीवीपीएटी जिस तरह से फर्जी साबित हुआ है। उससे गुजरात को लेकर लोगों की आशंकाएं और गहरी हो गयी हैं। एमपी के उस खुलासे के बाद (जिसमें कोई भी बटन दबाने पर कमल की पर्ची निकलती थी) ये बात साबित हो गयी है कि वीवीपीएटी में भी छेड़छाड़ हो सकती है। ऐसे में अगर पूरे गुजरात का चुनाव वीवीपीएटी पर भी होता है तो उसके विश्वसनीय होने की संभावनाएं काफी कम हो गयी हैं। लिहाजा ऐसे में जबकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता न केवल संदिग्ध हो गयी है बल्कि वो पाताल लोक में गोते लगा रही है। तब गुजरात में निष्पक्ष चुनाव कैसे हो सकता है यह एक बड़ा सवाल बनकर खड़ा हो गया है और इस यक्ष प्रश्न का किसी के पास कोई जवाब नहीं है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)




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