विद्रोह की कगार पर खड़े हैं इंसान और जंगली जानवरों के रिश्ते

त्रासदी , , रविवार , 29-07-2018


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वीना सुखीजा

पटाखों और आग के गोलों की चपेट में आकर बदहवास होकर भागती हथिनी और उसके पीछे आग की लपटों से घिरा उसका बेटा यानी हाथी का बच्चा। इस कारुणिक तस्वीर ने पिछले साल सोशल मीडिया में लाखों लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। बहुत संभव है कि आपने भी यह फोटो अपने फेसबुक या ट्विटर की टाइमलाइन पर देखी हो। पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले की इस तस्वीर को फोटोग्राफर विप्लव हाजरा ने खींचा था। तस्वीर को सैंक्चुअरी वाइल्डलाइफ फोटॉग्राफी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। इस तस्वीर ने इस सच्चाई को बेपर्दा कर दिया है कि किस तरह भारत के जंगल और जंगलों के आसपास के इलाके इंसानों व जानवरों की रणभूमि में तब्दील हो चुके हैं। यहां दोनों ही अपने-अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। दोनों का एक दूसरे पर से भरोसा उठ चुका है। 

जानवरों को बचाने का काम करने वाले वॉलंटियरों के मुताबिक पश्चिम बंगाल के बांकुरा में हाथियों पर इस तरह का अत्याचार आम है। इसके अलावा असम, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और तमिलनाडु के भी कई हिस्सों में हाथियों को ऐसे ही प्रताड़ित किया जाता है।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2014 से मई 2017 के बीच करीब 84 हाथियों को लोगों द्वारा मार दिया गया। गौरतलब है कि हाथी अपने दांतों की वजह से शिकारियों के निशाने पर रहते हैं। जानवरों पर इंसान किस कदर अत्याचार कर रहा है, इसे इसी बात से जाना जा सकता है कि पिछले 50 सालों में दुनिया से लाखों जीव प्रजातियों का खात्मा हो चुका है। आज की तारीख में दुनिया में इंसानों की आबादी करीब 7.6 अरब है, इंसानों की यह आबादी हर दिन अरबों किलो जानवरों का गोश्त खाती है, जिसके लिए हर दिन लाखों जानवर काटे जाते हैं। 

यह इंसान की भूख ही है कि आज की तारीख में हर दिन धरती से करीब 100 जीव प्रजातियां खत्म हो रही हैं। इनके खात्मे की सबसे बड़ी वजह यह है कि लोग या तो जानवरों के रहने के इलाके खत्म कर दे रहे  हैं या उनका तब तक शिकार करते हैं, जब तक कि वह खत्म नहीं हो जाते। लेकिन इस पर भी कुछ भोले लोगों का मानना है कि चिड़ियाघर या नेशनल पार्क जानवरों को खत्म होने से बचा सकते हैं। दरअसल जब से इस आधुनिक सभ्यता ने अपने पैर जमाये हैं, तब से ही जंगली जानवरों को इसकी कीमत लगातार देनी पड़ी है। कभी इंसान जानवरों को सिर्फ भूख लगने पर अपना शिकार बनाया करता था, लेकिन जब इंसान की अक्ल ने विकास के नये सोपान गढ़े और अपनी भूख मिटाने के लिए वह सिर्फ जानवरों के मांस पर ही निर्भर नहीं रहा बल्कि अनगिनत किस्म के फल और अनाज पैदा करने लगा, तब भी जानवरों को उसके अत्याचारों से मुक्ति नहीं मिली। 

इंसान के भोजन में जानवरों की संख्या कुछ कम हुई तो क्या हुआ, रईस लोग विशेषकर राजा-महाराजा अपने शौक और रोमांच के लिए जानवरों का शिकार करने लगे। वे लोग इन्हें सिर्फ अपनी खुशी के लिए मारने लगे। कुछ तो चुपके से जानवरों का शिकार करके इसे अपनी बहादुरी का परचम बनाने लगे।

इंसान ने जानवरों का अपनी मौज-मस्ती और खुशी के लिए शिकार 4000 साल पहले ही शुरु कर दिया था, जब चीन में सियावंश के राजा-महाराजा ऐसा किया करते थे। बाद में यह सिलसिला मेसोपोटामिया से लेकर असीरियाई नवाबों तक पहुंचा और वे अपने स्टेट्स के लिए घर में मगरमच्छ पालने लगे व पिंजरे में शेर रखने लगे। तमाम तरह की चिड़ियों की कैद तो उन दिनों मायने ही नहीं रखती थी। इटली से लेकर यूरोप के दूसरे भव्य शहरों तक दुर्लभ जानवरों की शिकार स्मृतियां बैठकों पर सजाना 14वीं और 15वीं शताब्दी में आम बात थी। 

हालांकि बाद में इन्हीं शिकारबाज महाराजाओं ने दुनिया के पहले चिड़ियाघर की भी स्थापना की। साल 1792 में फ्रांस स्टीफन प्रथम ने वियना में दुनिया के पहले चिड़ियाघर का उद्घाटन किया। लेकिन इस बर्बर दौर में भी जानवर आज से कहीं ज्यादा सुरक्षित थे, क्योंकि तब इंसान की तमाम क्रूरता, बर्बरता और रोमांचप्रियता में भी कारोबारी नजरिया नहीं शामिल था। लोग सिर्फ अपने खाने के लिए ही शिकार किया करते थे, लेकिन बाद में जानवरों का शिकार करके इसके गोश्त का कारोबार किया जाने लगा और आज की तारीख में यह खरबों डॉलर का उद्योग है। आज दुनिया में हर दिन इतना गोश्त खाया जा रहा है, जितना 5000 साल पहले दुनिया में मौजूद तकरीबन 50 फीसदी जानवरों के शरीर का गोश्त था। 

कहने का मतलब यह है कि आज की तारीख में 5000 साल पहले के जानवरों की दुनिया को हर दो दिन में खत्म किया जा रहा है। इसका साफ मतलब है कि गुजरते वक्त के साथ दुनिया में जानवरों की आबादी भी बढ़ी है। अगर इसे आंकड़ों के लिहाज से देखें तो हर दिन करीब 4 लाख इंसानी बच्चे पैदा होते हैं और चूंकि कुछ जानवरों को खाद्य फसलों के रूप में भी पैदा किया जा रहा है, इसलिए अगर तथ्यात्मक रूप में देखें तो कुछ जानवरों की हर दिन की आबादी करोड़ों में जन्मती है मसलन हर दिन करीब 6.5 करोड़ मुर्गी के अंडे, चूजे बनते हैं। 

लेकिन जानवरों की दुनिया में मौजूदगी का यह कोई संतुलन नहीं है। सच्चाई यह है कि कुछ जानवर बहुत तेजी से खत्म हो रहे हैं और कुछ दूसरे जानवर अपनी आबादी से दुनिया के लिए संकट भी बन रहे हैं।

आज जो हर दिन करीब 100 से ज्यादा जीव प्रजातियां नष्ट हो रही हैं, वे वही हैं जिनकी दुनिया में उपयोगिता नहीं है। लेकिन उनके न रहने से दुनिया का जैविक संतुलन बुरी तरह से गड़बड़ा जायेगा। जानवरों पर आधुनिक विकास के तौर तरीकों का भी जबरदस्त संकट है। शायद इसलिए भी अब इंसान और जानवर तमाम इलाकों में एक दूसरे के आमने सामने आ चुके हैं। हिंदुस्तान में खास तौरपर इंसान और जंगली जानवरों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ती जा रही है। भारत में 13 राज्य ऐसे हैं जहां जंगली जानवरों की मौजूदगी बाकी राज्यों से ज्यादा है, वहां ये टकराव तल पर पहुंच गया है। 

हिंदुस्तान में हाथी और बाघ करीब हर दिन एक आदमी को मार रहे हैं, लेकिन अगर इन जानवरों के द्वारा इंसान को मारे जाने की प्रतिशोध की बात करें तो इंसान हर दिन 100 से ज्यादा विभिन्न तरह के ऐसे जानवरों को मार रहा है जो उसके लिए खतरा हैं या बन सकते हैं। इंसान द्वारा सबसे ज्यादा सांप, बाघ, हाथी, तेंदुआ जैसे जानवरों को मारा जा रहा है।

भारत के शहरी इलाकों में जो बस्तियां जंगलों के नजदीक हैं, वहां हाल के सालों ने तेंदुओं ने काफी आक्रमण किया है, जिस कारण मुंबई, पुणे, बंग्लुरु, देहरादून, नैनीताल, गोहाटी जैसे शहरों में मिलाकर हर दिन औसतन एक तेंदुआ मारा जा रहा है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के एक आंकड़े के मुताबिक जो उसने साल 2014 में पेश किया था, 1143 दिनों में इंसान ने 1144 दुर्लभ जंगली जानवरों को मारा है। इंसान द्वारा मारे गये इन जानवरों में 345 बाघ और 84 बड़े साइज वाले हाथी भी थे।

हालांकि जानवरों की इन हत्याओं को एक तरह से इंसान के गुस्से का नतीजा बताया गया लेकिन तह में जाने पर साफ होता है कि ऐसा नहीं था। वास्तव में ज्यादातर जानवरों को शिकारियों द्वारा उनके कारोबारी फायदे के लिए मारा गया। मसलन हाथियों को उनके कीमती दांतों के लिए मौत के घाट उतारा गया तो बाघों को उनकी बेहद कीमती हड्डियों के लिए, जिनकी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में प्रतिकिलो की कीमत करोड़ों रुपये में है। 

इसमें कोई दो राय नहीं है 1143 दिनों की जिस अवधि में सरकारी रजिस्टरों में दर्ज 1144 दुर्लभ जानवरों को मौत के घाट उतारा गया, उसी दौरान उन 4 सालों में 1052 लोगों को भी हाथियों द्वारा मौत के घाट उतारा गया। करीब 92 लोगों को शेर ने मौत के घाट उतारा। राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरों के मुताबिक साल 2015 में 950 लोग विभिन्न जंगली जानवरों के हमले में मारे गये। देश का कोई ऐसा इलाका अछूता नहीं है, जहां जंगली जानवर हों और उनके तथा इंसानों के बीच खूनी मुठभेडें न होनी शुरु हुई हों।

दरअसल बेतरतीब शहरीकरण और बिना इकोलाॅजी को ध्यान में रखकर बनायी गई विकास नीतियों के चलते इंसान और जानवर एक दूसरे के लिए खतरा बन गये हैं और इस खतरे के कारण आमने-सामने आ खड़े हुए हैं। इंसान ने कभी ये नहीं सोचा कि अगर वह विकास के आधुनिक प्रबंधन के बारे में नहीं सोचेगा तो जीव जंतुओं के लिए जरूरी आहार और पानी कहां से आयेगा? इंसान और जानवरों के बीच जो खूनी टकराव की स्थितियां पैदा हो गई हैं, उसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि इंसान ने जानवरों के समूचे आहार, चक्र को ही बाधित कर दिया है। अपने विकास की प्राथमिकताओं में इंसान ने जानवरों के बारे में जरा भी नहीं सोचा इसलिए न तो आज उनके पास चरने के लिए घास बची है और न ही पानी पीने के लिए प्राकृतिक जलस्रोत। अब अगर जानवरों को चारा जंगल में नहीं मिलेगा तो वे कहां जाएंगे? जाहिर गांवों और शहरों की तरफ आएंगे और जानवर यही कर रहे हैं। आज देश का कोई ऐसा बड़ा शहर नहीं है जो बाघ, तेंदुआ और बंदरों के अतिक्रमण से परेशान नहीं है। हां, बाघ हर जगह न होने की वजह से बहुत लोग बाघ के गुस्से से बचे हुए हैं। 

लेकिन तमाम तरह की रिपोर्टें बताती है कि देशभर में करीब 3.5 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जो करीब 14000 के आसपास तेंदुए हैं, उन्होंने लोगों का जीना हराम कर दिया है। क्योंकि उन तेंदुओं के लिए न सुरक्षित भोजन बचा है न ही पानी। नतीजतन ये घने जंगलों से बाहर आ रहे हैं और चीतल, चिंकारा व संभार की तालाश में इंसानी बस्तियों में घुस रहे हैं। 

इंसान और जानवर किस तरह एक दूसरे के सामने दुश्मन की तरह आकर खड़े हो गए हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश में करीब 15 फीसदी किसानों ने किसानी का काम करना जानवरों के आंतक से बंद कर दिया है। देश में हर साल करोड़ों रुपये की फसलें बंदर बर्बाद कर रहे हैं। हिमाचल के चंबा और कुल्लू जैसे जिलों में भालू दिन दहाड़े लोगों पर हमला कर रहे हैं और ऊना जैसे समतल इलाके में नील गाय मुसीबत की नयी पर्याय बन गई हैं। कुछ साल पहले हेमा मालिनी के मुंबई स्थित बंगले में भी तेंदुआ घुस गया था, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इंसान और जानवरों की यह टकराहट कितनी भयंकर हो गई है। अगर अब भी सरकारों ने इंसान के साथ जानवरों के जिंदा रहने के लिए बुनियादी सुविधाओं का प्रबंधन नहीं किया तो वे दिन दूर नहीं जब जंगली जानवर भी समूह में आकर प्रशिक्षित फौजों की तरह इंसानी बस्तियों पर हमला किया करेंगे

(लेखिका विशिष्ट मीडिया एवं शोध संस्थान इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर में कार्यकारी संपादक हैं।)








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