बढ़ता प्रदूषण : ईपीआई रिपोर्ट को नकारिये मत खुद को सुधारिये

विशेष , विचार-विश्लेषण, सोमवार , 29-01-2018


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डॉ. राजू पाण्डेय

2018 के द्विवार्षिक एनवायरनमेंटल परफॉर्मेन्स इंडेक्स में भारत 180 देशों में 177वें स्थान पर रहा। दो वर्ष पहले हम 141वें स्थान पर थे। 

पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने इन आंकड़ों पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये केवल रैंकिंग्स हैं और कुछ नहीं। हम अपना काम गंभीरतापूर्वक कर रहे हैं। 

इस तरह उस चिरपरिचित और दुर्भाग्यपूर्ण सिलसिले का प्रारंभ हो गया जब सत्ता पक्ष इन रैंकिंग्स को नकारेगा और विपक्ष इनका लाभ उठाने की कोशिश करेगा। 

सत्तापक्ष एवं विपक्ष आज जरूर जन सरोकार के मुद्दों का घटिया राजनीतिकरण कर रहे हैं किंतु आने वाले समय में दोनों जरूरी सवालों की आपराधिक अनदेखी के दोषी माने जाएंगे।

रिपोर्ट यह बताती है कि सरकार के प्रयास ठोस ईंधन, कोयला और फसल अवशेष को जलाने से उत्पन्न वायु प्रदूषण को रोकने में नाकाफ़ी रहे हैं। मोटर वाहनों द्वारा उत्सर्जन भी वायु को जहरीला बना रहा है। 

इंस्टीच्यूट ऑफ हेल्थ मीट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन के 2017 के आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण हमारे देश में प्रति वर्ष 1640113 मौतों के लिए जिम्मेदार है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की 2017 की एक रिपोर्ट दर्शाती है कि देश में होने वाली असमय मौतों के मामलों में से 30 प्रतिशत वायु प्रदूषण के कारण होते हैं। यह आंकड़े जितने भयानक हैं उससे भी ज्यादा चिंताजनक है इन्हें नकारने की कोशिश। 

विगत वर्ष भी सरकार के तत्कालीन पर्यावरण मंत्री ने यह कहा था कि श्वास संबंधी रोगों के लिए वायु प्रदूषण एक कारक हो सकता है किंतु यह एक मात्र रूप से इनके लिए उत्तरदायी है यह मानना गलत है। कुछ पेशों की मजबूरियाँ, कुपोषण, सामाजिक आर्थिक दशाएं और आनुवंशिक कारण भी श्वास रोगों हेतु समान रूप से उत्तरदायी हैं।

प्रदूषण के बारे में हमारी सरकारों के नजरिये को समझने के लिए राजधानी दिल्ली का उदाहरण पर्याप्त होगा। पूरी सर्दियों में दिल्ली भयानक वायु प्रदूषण से ग्रस्त रही है। पड़ोसी राज्यों में फसलों के अवशेष जलाना इसके लिए उत्तरदायी कारकों में से एक था। किंतु इस विषय में राज्यों के पारस्परिक सम्बन्धों और केंद्र की भूमिका को लेकर जो खींचतान हुई वह हताश करने वाली है। समस्या के मूल स्वरूप को समझने और किसानों की समस्याओं का जमीनी स्तर पर  व्यवहारिक समाधान तलाशने के स्थान पर एक विवाद खड़ा किया गया जिसका उद्देश्य अपने प्रदेश के प्रति अपने राजनीतिक दल की चिंताओं और प्रतिबद्धताओं का भौंडा प्रदर्शन करना अधिक था। 

इसके पीछे समस्या को उलझाकर प्रदूषण की आग में राजनीतिक रोटियां सेंकने की कुत्सित इच्छा भी निहित थी। मोटर वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम का विकास करने की कोई दूरदर्शी योजना नहीं बनाई गई और ऑड इवन जैसे कॉस्मैटिक उपाय अपनाने का प्रयास किया गया जिनके बारे में यह भी सुनिश्चित नहीं है कि इनसे प्रदूषण कम होता है या नहीं। ओखला, गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल साइट्स पर कचरे के पहाड़, इनके कारण होने वाली दुर्घटनाएं और इनमें लगने वाली आग के द्वारा फैलता प्रदूषण हमारे सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट की असफलता को बयान करते हैं। 

स्थिति यह है कि दिल्ली में लोगों की संभावित आयु में से 6.3 वर्ष वायु प्रदूषण के कारण कम हो जाते हैं जबकि पूरे देश के लिए यह आंकड़ा 3.4 वर्ष का है। दिल्ली के हर तीसरे बच्चे के फेफड़े वायु प्रदूषण के कारण खराब हो चुके हैं। मॉर्निंग वॉक और आउट डोर स्पोर्ट्स भी अब दिल्ली के लोगों के लिए जानलेवा बन गए हैं। 

विमर्श का स्तर इतना गिर गया है कि प्रदूषण के लिए मोदी सरकार की उपेक्षा, केजरीवाल सरकार के निकम्मेपन और शीला दीक्षित की विरासत में से कौन सा कारण सही है, इसी पर सारे जहीन दिमाग लोग उलझे हुए हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल आदेश पर आदेश दिए जा रहा है किंतु अब न्यायलयीन फैसलों को कठघरे में खड़ा करना एक फैशन बन गया है।

राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति और भयानक है देश के 45 प्रतिशत जिलों में निवास करने वाली 50 प्रतिशत आबादी पीएम 2.5 के घातक स्तर वाली वायु में सांस लेने के लिए विवश है। दिल्ली और अन्य महानगरों के प्रदूषण के बारे में तो देश और विश्व का मीडिया चर्चा करता रहता है लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और मध्यप्रदेश के वनांचल- जहां कोल माइनिंग तथा पावर एंड स्टील इंडस्ट्रीज के कारण प्रदूषण चरम पर है- अचर्चित रह जाते हैं। इन क्षेत्रों में स्थानीय राजनेताओं, अधिकारियों, माफियाओं और उद्योगपतियों का घातक गठजोड़ पर्यावरण मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन में लगा हुआ है। 

अनेक ऐसे दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं कि एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट में किस प्रकार हजारों हेक्टेयर में फैले वनों, वन्य पशुओं और ऐतिहासिक धरोहरों को गायब करने की सफल असफल चेष्टा की गई है। किस प्रकार पर्यावरणीय जन सुनवाइयों को एक प्रहसन में बदल दिया गया है यह भी किसी से छिपा नहीं है। इन उद्योगों में पर्यावरण विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर किस प्रकार प्रदूषण नियंत्रक उपायों की अनदेखी की जाती है और किस प्रकार इलेक्ट्रोस्टेटिक प्रेसिपिटेटर्स को बंद रखा जाता है यह भी कई बार उजागर हो चुका है। किंतु यह मामले जितनी तेजी से उठते हैं उससे कहीं अधिक तेजी से दबा दिए जाते हैं। इन क्षेत्रों में निवास करने वाले निरीह ग्रामवासियों (जिनमें आदिवासियों की संख्या अधिक है) की कमजोर लड़ाई कुछ ईमानदार और कुछ संदिग्ध प्रतिबद्धता वाले गैर सरकारी संगठन लड़ रहे हैं जिन्हें व्यवस्था विरोधी की संज्ञा देकर उद्योग समर्थक सरकारें प्रताड़ित भी करती रही हैं।

इसी से जुड़ा विकास का प्रश्न है। वर्ल्ड इकॉनोनॉमिक फोरम के साथ मिलकर 10वीं एनवायरनमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स रिपोर्ट तैयार करने वाले येल और कोलंबिया विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार रिपोर्ट में चीन का 120वां स्थान और भारत का 177वां स्थान बढ़ते जनसंख्या दबाव और तीव्र गति से विकास करने की लालसा के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों की ओर हमारा ध्यानाकर्षण करता है। किंतु इन विशेषज्ञों के अनुसार ब्राज़ील का 69वां स्थान यह दर्शाता है कि यदि पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण सरकारों के नीति निर्धारण और क्रियान्वयन की स्थायी और दीर्घ कालिक प्राथमिकताओं में सम्मिलित हों तो उसके सुपरिणाम मिलते ही हैं। 

इन विशेषज्ञों की राय विकास के उस वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था आधारित मॉडल पर प्रश्नचिन्ह नहीं उठाती जो अंततः नवउपनिवेशवादी रणनीति का नवीनतम रूप है। जिस विकास के मॉडल को अधिकांश एशियाई देश अपना रहे हैं वह देशी और विदेशी उद्योगपतियों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन को बढ़ावा दे रहा है जिसके फलस्वरूप इन देशों का भौतिक और सामाजिक पर्यावरण तेजी से नष्ट हो रहा है। 

पर्यावरण को होने वाली यह क्षति ऐसी नहीं है जिसकी भरपाई की जा सके। भूजल स्तर कई स्थानों पर चिंताजनक रूप से गिरा है। जंगलों की कटाई से हजारों साल में स्थिर होने वाला पारिस्थितिक संतुलन नष्ट हो गया है। वृक्षारोपण अपर्याप्त और अविचारित दोनों है और इन दोषों को यदि नजरअंदाज कर दिया जाए तब भी इसके लाभदायक परिणाम वर्षों बाद ही मिल सकेंगे। एशियाई देशों में व्याप्त राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार ने उद्योगपतियों को पर्यावरण नियमों के साथ खिलवाड़ करने का खुला अवसर प्रदान किया है। इस विकास के परिणाम स्वरूप गिने चुने लोगों के पास विपुल सम्पदा और संसाधनों का एकत्रीकरण हुआ है और बहुसंख्यक लोगों का जीवन बदतर हुआ है। यदि विकास का स्वरूप समावेशी होता तो पर्यावरण रक्षा और प्रदूषण नियंत्रण अपने आप प्राथमिकताओं के एजेंडे में सबसे ऊपर होते।

एनवायरनमेंटल परफॉर्मेन्स इंडेक्स पर्यावरण के प्रत्येक पहलू को बहुत व्यापक रूप से स्पर्श करता है। इसमें 50 प्रतिशत भार  (वेटेज) पर्यावरणीय स्वास्थ्य (एनवायरनमेंटल हेल्थ) को दिया जाता है। इसके अंतर्गत तीन उपभाग होते हैं-  स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव, वायु की गुणवत्ता तथा जल एवं स्वच्छता। प्रत्येक को समान वेटेज दिया गया है। दूसरा भाग पारिस्थितिक तंत्र की जीवनी शक्ति (इकोसिस्टम वाईटेलिटी) से सम्बंधित होता है और इसे भी 50 प्रतिशत वेटेज दिया जाता है। इसके अंतर्गत 6 उपभाग होते हैं जिन्हें अलग अलग वेटेज दिया जाता है- जल संसाधन (25 प्रतिशत), कृषि एवं वन (प्रत्येक 10 प्रतिशत), जैव विविधता एवं आवास (25 प्रतिशत), जलवायु एवं ऊर्जा (25 प्रतिशत) तथा मत्स्यपालन (5प्रतिशत)। इतने व्यापक आकलन में भारत का लचर प्रदर्शन न केवल सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों पर प्रश्नचिन्ह लगाता है बल्कि सरकार द्वारा युद्ध स्तर पर चलाए जा रहे बहुचर्चित-बहुप्रचारित स्वच्छ भारत अभियान और उज्जवला योजना की सफलता के दावों को भी संदिग्ध बनाता है। 

स्वच्छ भारत अभियान स्वास्थ्य और स्वच्छता को केंद्र में रख कर चलाया जा रहा है। जबकि उज्जवला योजना गृहिणियों को एलपीजी कनेक्शन दिलाकर उन्हें लकड़ी और कोयला जलाकर भोजन बनाने से उत्पन्न प्रदूषण से मुक्ति दिलाने के ध्येय से लागू की गई है। सरकार को आत्ममुग्धता से बाहर निकलकर वस्तु स्थिति को स्वीकारना और सुधारना होगा। सरकार को यह भी देखना होगा कि मेक इन इंडिया को सफल बनाने की हड़बड़ी में वह पर्यावरण का और अधिक नुकसान न कर बैठे।

ईपीआई रिपोर्ट कई जटिल मुद्दों को स्पर्श करती है। रिपोर्ट के अनुसार आय, पर्यावरण की बेहतरी के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि हम सुरक्षित पेय जल एवं आधुनिक स्वच्छता तकनीकों में निवेश करते हैं तो इसके सकारात्मक परिणाम तत्काल दिखाई देते हैं। किंतु रिपोर्ट इस बात की ओर भी हमारा ध्यान खींचती है कि समान आर्थिक दशाओं और आय वाले देशों में से कुछ पर्यावरण के क्षेत्र में अच्छा करते हैं और कुछ खराब। रिपोर्ट के अनुसार नीतियों का सतर्क चयन व योजनाओं का सफल क्रियान्वयन अर्थात सुशासन अच्छा करने वाले देशों की सफलता के लिए उत्तरदायी है। रिपोर्ट यह दर्शाती है कि संधारणीय विकास या टिकाऊ विकास या सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए आर्थिक प्रगति आवश्यक है क्योंकि इससे पर्यावरणीय अधोसंरचना में निवेश के लिए संसाधन उत्पन्न होते हैं। लेकिन इसके साथ साथ नगरीकरण और औद्योगीकरण का कुशल प्रबंधन भी जरूरी है ताकि इनके कारण पैदा होने वाले प्रदूषण को रोका जा सके और पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान से बचाया जा सके। 

सरकार को चाहिए कि वह इस रिपोर्ट को झुठलाने या नकारने के स्थान पर इसमें निहित संदेश को समझे और अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और रायपुर, छत्तीसगढ़ में रहते हैं।)

 






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