धर्म/जाति व किसान नेताओं का मारा किसान!

मुद्दा , , रविवार , 21-04-2019


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मदन कोथुनियां

हाल ही में एक खबर आई कि जिन 111 किसानों ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का ऐलान किया था उन्होंने यह कहकर ऐलान वापस ले लिया कि हमारी अमित शाह से बात हो गई है और उन्होंने हमारी मांगें मान ली हैं तब से सोच रहा हूं कि पिछले पांच सालों बड़े-बड़े किसान आंदोलन हुए थे वो क्या सिर्फ दिखावा थे! और इन्होंने जो मांगें मानने की बात कही है वो भी चुनाव आचार संहिता में और मांगे भी ऐसी कि सारी नदियां जोड़ने की बात हो गई!

मुझे यह महसूस हो रहा है कि किसान फसल पैदा नहीं करता है बल्कि किसानों के नाम पर भी फसल तैयार हो रही है और शातिराना अंदाज में किसान का खून चूस रही है। चार साल किसानों को बरगलाकर आंदोलनों में झोंका जाता है और पांचवें साल में किसान नेता बनकर बिक जाते हैं! पिछले 3 दिन से बेमौसम बारिश उत्तरी भारत मे कहर बनकर टूटी है मगर चौतरफा खामोशी है। कोई किसान आयोग नहीं जो राजनीति से परे स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करे और इस आचार संहिता के दौर में भी किसानों के नुकसान का आकलन करके उनकी भरपाई कर सके, बीमा कंपनियों के हलक में हाथ डालकर किसानों को मुआवजा दिलवा सके!

आज इस देश की आधी से ज्यादा आबादी शुद्ध रूप से खेती पर निर्भर है मगर उसके लिए ऐसा कोई तंत्र नहीं जो इनकी आवाज उठा सके, इनके हितार्थ नीति-निर्माण कर सके, इनके दुःख में उम्मीद जगा सके! आपको चंद उदाहरणों के माध्यम से बताता हूं कि सत्ता किधर जा रही है! नीतियां किसके लिए बन रही हैं! कौन लोग किसानों की बर्बादी के जिम्मेदार हैं!

2008 में कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ला के नेतृत्व में आईपीएल खेलों की शुरुआत हुई और महज 10 सालों में यह संघ हजारों करोड़ रुपये का खेल बन गया। जनता के खून-पसीने की कमाई से बनाये गए सेंकड़ों स्टेडियम इनको उपलब्ध करवाए गए और कानून व्यवस्था के नाम पर पूरा सरकारी तंत्र इनके लिए तैनात हो गया! खिलाड़ी/पदाधिकारी मिलाकर 1000 के करीब लोग होंगे जो इससे कमा रहे हैं! दूसरी तरफ 50 करोड़ से ज्यादा किसान खेती में लगे हैं और पूरे देश का पेट इन्हीं के हाथों भरा जा रहा है। इनकी पकी हुई फसलें खुली मंडियों में बारिश में बर्बाद हो रही हैं लेकिन पिच की तरह ढकने के लिए कोई तिरपाल लेकर दौड़ता नजर नहीं आता है! आजादी के 70 साल बाद भी हम भंडारण की व्यवस्था नहीं कर पाए क्योंकि सरकारें कह रही हैं कि हमारे पास संसाधन नहीं हैं! आप खुद तय करिये कि कमी संसाधनों की है या नियत की?

2 साल पहले देश में दाल की कीमत बढ़ी थी तब सारी राजनैतिक पार्टियों व मीडिया ने बवाल काटा और उसकी आड़ में अडानी की कम्पनी ने अफ्रीकी देशों से दाल सस्ते में आयात कर ली। शहरी लोगों को सस्ती कीमत पर दाल जरूर मिल गई मगर देशी किसानों की दलहन की फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे बिकीं और किसानों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। एक तरफ गरीबों के लिए मुफ्त में खाद्य पदार्थों का वितरण किया जा रहा है तो दूसरी तरफ शहरी मानसिक गरीबों के लिए सस्ता खाद्य उपलब्ध करवाने का टेंडर भी सरकार अपने पास रखती है और इसका पूरा बोझ किसानों के कंधों पर लाद रही है। अगर शहरों के पास देने के नाम पर कुछ नहीं है तो गांवों से यह भीड़ क्यों एकत्रित करके पाली जा रही है?

पाकिस्तान से सस्ती चीनी मंगाकर देश के बाजार में डाली गई जिससे देशी चीनी मीलों ने उत्पादन में कमी कर दी व कई घाटे में चली गई व गन्ना किसानों का बकाया 2000 करोड़ से बढ़कर 8000 करोड़ से ज्यादा हो गया और दावा चुनाव से पहले 14 दिन में बकाया देने का किया गया था! क्या सरकार की नीति किसानों को बचाने वाली रही?आप खुद सोचिये!

मलेशिया व इंडोनेशिया से कच्चे पाम आयल और सरसों व मूंगफली के रिफाइंड आयल पर मोदी सरकार ने इम्पोर्ट ड्यूटी घटा दी जिसके कारण भारत मे 26%तेल की आवक बढ़ गई और भारतीय रिफाइनरी की उत्पादन क्षमता 30%कम कर दी गई जिसके कारण शहरी वर्ग को तो सस्ता तेल मिल गया मगर किसान वर्ग को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ क्योंकि देशी रिफाइनरी द्वारा उत्पादन घटाने के कारण किसानों की फसलें ओने-पौने दामों में बिकी।

ये मात्र उदाहरण नहीं हैं बल्कि सत्ता में बैठे लोगों की कथनी व करनी का दोगला रवैया है जो यह स्पष्ट करता है कि इनके लिये चुनाव में किसान का क्या महत्व है और सत्ता मिलने के बाद महत्व क्या रह जाता है! मैंने अपने कई लेखों के माध्यम से बताया है कि किसानों की समस्या क्या है और उनका समाधान क्या है मगर किसान नेता इस देश का सबसे खराब बिकाऊ माल है जो किसानों को रौंदकर, उनके सपनों की हत्या करके कुर्सी के लिए बिक जाता है। बिकाऊ नेता कभी भी अपने वर्ग की नुमाइंदगी नहीं कर सकता, नीति-निर्माण में अपने वर्ग के हितों की हिफाजत नहीं कर सकता।

भूमि अधिग्रहण बिल पर सेंकड़ों किसानों के नाम पर जीते हुए उजले बगुले संसद में बैठे रहे मगर एक का भी मुंह नहीं खुला! एक भी किसान नेता खाद्य आयात पर नहीं बोलता! एक भी किसान नेता प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की लूट पर नहीं बोला! एक भी किसान नेता नहीं पूछ रहा है कि स्वामीनाथन रिपोर्ट का क्या हुआ! साइल हेल्थ कार्ड का क्या हुआ! किसानों की आय दुगुनी करने के कौन से ठोस कदम उठाए गए! कृषि औजारों पर जीएसटी 18 से 28%तक क्यों की गई?

किसानों की सबसे बड़ी समस्या धर्म व जाति के रूप में विभाजन है जिसका दोहन करके बेईमान लोग सत्ता पर कब्जा कर लेते हैं। किसान जब तक अपनी साझी समस्याओं को देखकर एकजुट नहीं होगा तब तक इनकी सुनने वाला कोई नहीं होगा, नदियों को जोड़ने की बातें पिछले 20 सालों से सुन रहे हैं मगर इस पर कार्य शुरू कोई नहीं करेगा! खाद-बीज की उपलब्धता कोई सुनिश्चित नहीं करेगा! इनकी फसलों के लिए पर्याप्त मुआवजे व भंडारण की व्यवस्था कोई नहीं करेगा! जब तक किसान विरोधी लोग सत्ता पर काबिज रहेंगे और फर्जी किसान नेता उनके पीछे बैठकर संसद की टेबलें बजाते रहेंगे तब तक भारत में तो किसानों की बर्बादी रोकने का दावा मृग-मरीचिका बनकर किसानों को चिढ़ाता रहेगा।

(मदन कोथुनियां पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)








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