मुद्दों से भटकाने का सियासी दौर

ज़रूरी बात , , चयन करें , 16-09-2018


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मदन कोथुनियां

यह मुद्दों से भटकाने की सियासत का दौर है। आम जनता के बुनियादी मुद्दों पर चर्चा न हो इसलिए रोज हवाई बवंडर हमारे बीच मे छोड़े जाते हैं और हम उसी के साथ बह जाते हैं।

आप याद करिये कश्मीरी पंडितों के पलायन के मुद्दे को! 30 साल हो गए। हजारों करोड़ के पैकेज ले लिए। दिल्ली, मुम्बई जैसे शहरों में आलीशान कोठियां बना ली, लक्जरी कारों में घूमते हैं और बीच-बीच में दबाव बनाकर अगले पैकेज की घोषणा करवा लेते हैं। एक जगह से दूसरी जगह हुए पलायन के जख्म सदा हरे रहते हैं!

किसानों के बारे में सोचिए! लाखों किसानों ने कर्ज में डूबकर इस दुनिया से पलायन कर लिया! हर चार घंटे में एक किसान आत्महत्या कर रहा है। लाखों किसान इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। किसानों के बच्चों को उचित शिक्षा नहीं मिल पाती। जो विपरीत परिस्थतियों में थोड़े बहुत पढ़ लिए वो बेरोजगारी का दंश झेलते हुए नशे व अपराध की दुनियां में जाकर दम तोड़ रहे हैं। पूरे देश के पोषण की पूर्ति करने वाले किसान के घर की ज्यादातर महिलाएं कुपोषित हैं। अपने बच्चों का पेट भरने के लिए अपने पेट के साथ समझौता करने को मजबूर हैं।

देश की 60%से ज्यादा आबादी घोर संकट में है लेकिन चर्चा की मुख्यधारा में नहीं है। बड़ी विडंबना देखिए कि किसान वर्ग के नेता किसानों की आवाज नहीं उठाते। किसान वर्ग के बुद्धिजीवी किसानों के लिए कलम चलाना अपनी तौहीन समझते हैं। किसानों के जो बच्चे नौकरी/व्यवसाय में थोड़े बहुत सक्षम हो गए उन्होंने किसानों से दूरी बनाकर खुद को उच्च व सभ्य होने के आवरण से ढक लिया है।

हमारी समस्याओं को मुद्दा बनाकर कौन लड़ेगा? एक गांव में बैठे किसान पुत्र को लगता है कि अयोध्या में मंदिर जरूर बनना चाहिए लेकिन खुद के घर की गिरती जर्जर ईंटों पर उसका ध्यान नहीं है। उसको यह जानने में बहुत रुचि है कि श्रीदेवी की टब में गिरने से मौत हुई या हत्या हुई लेकिन घर मे बैठी मां के पैर के फोड़े का इलाज करवाने पर ध्यान नहीं है। उसको टीवी पर सुबह-सुबह भाग्य बदलते पंडितों के मंत्रों में तो रुचि है लेकिन शिक्षा से वंचित घूमते छोटे भाई के भाग्य से कोई सरोकार नहीं है।

मैं हमेशा कहता हूं कि जो फर्जी धर्म, जाति, राष्ट्रवाद के शिगूफे छोड़े जाते हैं उनका विरोध जरूर करो व छोड़ने वालों को मुंहतोड़ जवाब दो लेकिन खुद के मुद्दे क्या हैं वो साथ में बताते चलो ताकि सबको ध्यान रहे  कि हमारे मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया तो हम इन झूठे बवंडरों का किस तरह कचूमर निकाला जाता है उसको भी जानते हैं। 

जब खुद के समाज पर आंच आये तो एक स्वर में बोलो और लिखो चाहे धारा कोई भी हो। 

जब किसानियत पर हमला हो या समस्या सामने आए तो सारे किसान पुत्र एकजुट होकर एक स्वर में बोलो/लिखो।

जब देश पर कोई आंच आये तो सारा देश एकजुट होकर उसका मुकाबला करे। 

देश के अंदर की एकतरफा लूट पर इसलिए खामोश मत हो जाना कि हम एक ही देश के नागरिक हैं आपस मे क्यों उलझें।

देश के अंदर एक ही जाति-विशेष की सत्ता, उन्हीं के मुद्दे व उन्हीं के लिए व्यवस्था हो तो विरोध करने से इस आधार पर कभी पीछे मत हटना कि धर्म खतरे में चला जायेगा।

आस्तिक-नास्तिक के बजाय वास्तविक बनकर हर मंच पर अपने मुद्दों पर खुलकर बोलो। डटकर लिखो। लिखने व बोलने की आजादी हमें संविधान ने दी है किसी के किये अहसान से आशियाना नहीं बनाया है।

(मदन कोथुनियां पत्रकार हैं और आजकल जयपुर में रहते हैं।)


 








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