आम आदमी के कुचले सपनों पर खड़ी बुलंद अर्थव्यवस्था

विशेष , , बृहस्पतिवार , 14-12-2017


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डॉ. राजू पाण्डेय

एफआरडीआई बिल आम आदमी के आर्थिक जीवन को अस्तव्यस्त करने का न तो पहला प्रयास है न ही अंतिम। अपितु यह ऐसे अनेक श्रृंखलाबद्ध प्रयासों की एक कड़ी मात्र है जिनका आरंभ आज से ढाई दशक पूर्व हुआ था जब हम उदारीकरण की राह पर चल पड़े थे। 


क्या अब आम आदमी का धन बैंकों में सुरक्षित नहीं रहेगा? इस सवाल पर चर्चा जारी है। 


प्रधानमंत्री जी ने 13 दिसंबर को फिक्की की वार्षिक आम बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार लोगों की जमा राशि को सुरक्षित करने के लिए कटिबद्ध है किंतु प्रचार इसका उल्टा हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि जब किसी देश के बैंक और जमाकर्ता सुरक्षित होंगे तभी वह देश भी सुरक्षित रह सकेगा। 

सांकेतिक तस्वीर। साभार : गूगल


एफआरडीआई बिल के अनेक प्रावधान इतने गंभीर और दूरगामी परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं कि प्रधानमंत्री जी के आकर्षक सूक्ति वाक्यों का प्रतिपरीक्षण आवश्यक हो जाता है। 


भारत बनाम न्यू इंडिया

नोटबन्दी और जीएसटी के बाद के भारत और मोदी जी के न्यू इंडिया के बीच जो भयानक खाई है वह यह बताने के लिए पर्याप्त है कि उनके और आम भारतीय के सपने बिल्कुल अलग अलग हैं। 

सामान्यतया बैंक और उसके जमाकर्ताओं के हित परस्पर विरोधी नहीं होते किन्तु जब उद्योगपतियों को दिए गए विशाल कर्जों की माफी के लिए बेल आउट पैकेज और इस कारण दिवालियेपन की कगार पर पहुंचे बैंकों को बचाने के लिए बेल इन का सहारा लिया जाता है तब बैंकों और जमाकर्ताओं के हितों में टकराव पैदा हो जाता है। 

63% लोगों का सरकारी बैंकों पर भरोसा

देश के 63 प्रतिशत नागरिकों ने अपने धन की सुरक्षा के लिए पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग बैंकों पर भरोसा किया है। प्राइवेट बैंकों पर विश्वास करने वाले भारतीयों की संख्या भी कम नहीं है -लगभग 18 प्रतिशत। इन बैंकों में भारतीय नागरिकों के धन की सुरक्षा के प्रावधान अब भी बहुत सशक्त नहीं हैं। वर्तमान में डिपाजिट इंश्योरैंस एंड क्रेडिट गारंटी कारपोरेशन के माध्यम से जमाकर्ताओं को एक लाख रुपए तक की गारंटी मिलती है चाहे उनकी जमा राशि कितनी भी अधिक हो। 

एफआरडीआई बिल

फाइनेंसियल रेसोल्यूशन एंड डिपाजिट इंश्योरैंस बिल दरअसल घाटे में चल रही वित्तीय संस्थाओं के भविष्य को निर्धारित करने के लिए एक रेसोल्यूशन कारपोरेशन बनाने से संबंधित है जो रिज़र्व बैंक के स्थान पर इनके विषय में निर्णय लेगा। 


इस बिल में यह भी प्रस्तावित है कि अब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक घाटे या दिवालियेपन की दशा में यह निर्धारित कर सकेंगे कि उन्हें अपने ग्राहकों की कितनी जमा राशि वापस करनी है और इसका स्वरूप क्या होगा। 


हो सकता है कि वे अपने ग्राहकों का धन दीर्घावधि फिक्स्ड डिपाजिट या बांड्स के रूप में लौटाएं जिनका भुगतान लंबी परिपक्वता अवधि के बाद लिया जा सकेगा। संभव है कि जन असंतोष को देखते हुए सरकार रिज़र्व बैंक एम्प्लॉयी एसोसिएशन की उस मांग को अंशतः मान ले कि गारंटी की राशि को दस लाख रुपये तक बढ़ा दिया जाए। किन्तु मूल मुद्दा तब भी बरकरार रहेगा। 

यह मुद्दा है लोगों की जमा राशि पर सरकार और बैंकों के नियंत्रण का, जरूरत पड़ने पर निकासी के अधिकार से उन्हें वंचित करने का, रिज़र्व बैंक के अधिकारों में कटौती का और आम आदमी के पैसे का उपयोग उद्योगपतियों को दिए गए न वसूले जा सकने वाले कर्ज के कारण बैंकों को होने वाले घाटे की भरपाई हेतु करने का। 

6 लाख करोड़ एनपीए 

शासकीय बैंकों का नॉन परफार्मिंग एसेट इस समय 6 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है इस बैड लोन में एसबीआई की हिस्सेदारी 1 लाख 88 हजार करोड़ रुपये की है। सरकार कॉरपोरेट घरानों को दिए गए कर्ज के कारण दिवालियेपन की ओर अग्रसर बैंकों की समस्याओं के समाधान के लिए आम लोगों के धन का उपयोग करने के लिए लालायित रही है और पहले भी पेंशन फण्ड की राशि का उपयोग इस प्रयोजन हेतु करने की उसकी कोशिशें को भारी विरोध के कारण मुल्तवी करना पड़ा है।

भूतकाल के उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि जब जब बैंकों को ऐसे विशेषाधिकार मिले हैं जो ग्राहकों के हितों का अतिक्रमण करते हैं तब तब इनका दुरूपयोग ही हुआ है। बेल इन जैसे प्रावधान 2008 की विश्वव्यापी भयानक मंदी के दौर के बाद आई एम एफ़ आदि द्वारा चर्चा में लाए गए थे और जी 20 देशों ने भी इन्हें अमल में लाने की संभावनाओं पर विचार किया था। 2011 में डेनमार्क ने जमाकर्ताओं के हितों को सुरक्षित रखते हुए इसका सफल प्रयोग भी किया किन्तु साइप्रस में 2013 में इसका प्रयोग विफल और विनाशक सिद्ध हुआ। भारत जैसी विशाल और भ्रष्टाचार से ग्रस्त अर्थव्यवस्था में ऐसे प्रावधान सांघातिक बन सकते हैं।


जिस प्रकार कॉरपोरेट रणनीतिकार किसी उत्पाद की मूल्यवृद्धि, किसी सेवा शुल्क में बढ़ोत्तरी या ग्राहक के अधिकारों में कटौती कर उस पर अनुचित शर्तें थोपने के लिए पहले कुछ भरमाने वाले सजावटी ऑफर्स देते हैं फिर धीरे धीरे अपने एजेंडे को क्रियान्वित करते हैं वैसा ही कुछ सरकार कर रही है। संगठित जन प्रतिरोधों के अभाव में वह सफल भी हो रही है। 


जन आंदोलन का अभाव

आर्थिक मुद्दों पर अन्याय का विरोध करने के लिए बड़ा जनांदोलन कभी खड़ा नहीं हो पाया। प्रायः राजनीतिक दृष्टि से इन मुद्दों को वाम दलों के लिए छोड़ दिया जाता है जिनके द्वारा संचालित ट्रेड यूनियनें अब अर्थवाद का शिकार होने लगी हैं और वेतन भत्तों के लिए हड़तालों पर इनका जोर बढ़ता गया है। वाम दलों का संख्याबल भी संसद में कम हुआ है और गठबंधन सरकारों का युग भी बीत गया सा लगता है। कुछ बड़े आंदोलन भी हुए हैं और कुछ हड़तालें भी किन्तु न ये दीर्घावधि रही हैं और न व्यापक। विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने मजदूर और किसान संगठन बना लिए हैं। अधिकारियों और कर्मचारियों की अलग यूनियनें तो हैं ही इनके भीतर भी अनेक उप संगठन खड़े कर दिए गए हैं। इनका समेकित प्रभाव जन प्रतिरोधों को कमज़ोर करने वाला ही रहा है। भौतिक समृद्धि को माया समझने वाला भारतीय जनमानस आर्थिक मुद्दों पर नहीं किन्तु जातीय और धार्मिक अस्मिता के लिए जल्दी संगठित और आंदोलित होता रहा है और उसकी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा भी दिया जा रहा है।

देश के आर्थिक विकास के लिए आम जनता की खुशियों को कुर्बान करने का यह सिलसिला पहले से जारी है। देश के करोड़ों लोगों के आर्थिक नियोजन का आधार रही स्माल सेविंग्स योजनाओं के साथ छेड़छाड़ यूपीए के कार्यकाल में ही प्रारंभ हो चुकी थी। 

 

1882 में पोस्ट आफिस सेविंग्स बैंक के अस्तित्व में आने के साथ ही प्रारंभ हुई इन योजनाओं को स्वतंत्र भारत में और महत्व मिला। पंडित नेहरू के शब्दों में – राष्ट्रीय बचत आंदोलन मेरी दृष्टि में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल इसलिए महत्वपूर्ण है कि हम चाहते हैं लोग बचत करें और बचत की इस राशि का उपयोग हम विकास कार्यों में करें बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह समाज के एक विशाल भाग तक पहुंचता है (नेशनल सेविंग्स आर्गेनाईजेशन की स्थापना पर 1948 में दिया संदेश)। 


केंद्र सरकार द्वारा डेढ़ लाख पोस्ट ऑफिसों और पब्लिक सेक्टर बैंकों एवं कुछ चुनिंदा प्राइवेट सेक्टर बैंकों की 8 हजार शाखाओं तथा 5 लाख अल्प बचत अभिकर्ताओं के जरिए चलाई जाने वाली ये स्मॉल सेविंग्स योजनाएं केंद्र सरकार के ट्रेज़री बैंकिंग ऑपरेशन्स के अंतर्गत आती हैं और इन पर सेबी व रिज़र्व बैंक जैसे नियामकों का नियंत्रण नहीं होता। इनके नेट कलेक्शन का उपयोग केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा घाटे के वित्तीय प्रबंधन में किया जाता है। यह राशि आर वी गुप्ता समिति की सिफारिशों के आधार पर 1999-2000 में गठित नेशनल स्मॉल सेविंग्स फण्ड में रखी जाती है जो सरकार के पब्लिक एकाउंट्स का एक भाग है। यह अल्प बचत योजनाएं लघु और मध्यम आय वर्ग के नौकरीपेशा और व्यापारी जनों, घरेलू महिलाओं, मजदूरों तथा किसानों एवं वरिष्ठ नागरिकों की फाइनेंसियल प्लानिंग का एक महत्वपूर्ण भाग रही हैं और इनके जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण घटनाक्रम -शादी, संतानोत्पत्ति, शिक्षा, गृह निर्माण व वृद्धावस्था प्रबंधन – आदि इन योजनाओं के इर्दगिर्द बुने जाते रहे हैं।

यह माना जाता है कि रिज़र्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में कमी, उधार की लागत में कमी लाती है और अर्थव्यवस्था पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है अर्थात इससे रोजगार के अवसर बढ़ते हैं,जीडीपी में वृद्धि होती है और स्टॉक तथा बांड मार्केट में मजबूती आती है। 

वर्तमान सरकार अल्प बचत योजनाओं पर ऊंची दरों से मिलने वाले ब्याज का युक्तियुक्तकरण करने की ओर तेजी से अग्रसर है। अल्प बचत योजनाओं और बैंक जमा के बीच ब्याज के अंतर को मिटाने की चेष्टा हो रही है। तर्क यह दिया जा रहा है कि ब्याज दरें बराबर होंगी तो बैंकों में निवेश बढ़ेगा। कहा जा रहा है कि बैंकों में जमा धन अधिक गतिशील होता है। इसका उपयोग ऋण देने व अन्य आर्थिक औद्योगिक गतिविधियों को संचालित करने हेतु होता है। अल्प बचत योजनाओं में ब्याज दरों में कमी आने पर लोग म्युचुअल फंड्स और शेयर मार्केट में निवेश करेंगे जिससे बाजार में मजबूती आएगी। लोगों को निवेश के नए विकल्प मिलेंगे आदि आदि। 


यह तर्क कि अधिक ब्याज दर के कारण लोग अल्प बचत योजनाओं की ओर आकर्षित होते हैं और बैंक डिपॉजिट्स में कमी आ रही है तथ्यों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। मार्च 2013 के अंत में अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों का कुल जमा 7428200 करोड़ रुपये था जबकि इसी समय स्माल सेविंग्स स्कीम्स में जमा राशि इस राशि के लगभग 10 वें भाग के बराबर 814545 करोड़ रुपये थी। 


वैसे भी विमुद्रीकरण के बाद सरकारी दावों के अनुसार भी बैंकों के पास पर्याप्त पैसा है। अल्प बचत योजनाओं की ब्याज दरों को फिक्स्ड इनकम मनी मार्केट एंड डेरिवेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के द्वारा निर्धारित गवर्नमेंट सिक्युरिटीज की ब्याज दरों के आधार पर तय किया जाना है। इन दरों की जानकारी इस संस्था द्वारा शुल्क लेकर अपने सदस्य बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को ही उपलब्ध कराई जाती है। 

जब आम निवेशक की जमा राशि को मार्केट रेट्स के अनुसार हर तीसरे महीने समायोजित किया जाना तय है तो इन दरों की जानकारी उसे भी अवश्य ही निःशुल्क उपलब्ध कराई जानी चाहिए। 

नेशनल स्मॉल सेविंग्स फण्ड को भी अब गैर जरूरी बताया जा रहा है। सरकार समर्थक अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि यह फण्ड बजट से अतिरिक्त होता है और इसकी जवाबदेहियां राजकोषीय प्रबंधन में सम्मिलित नहीं होतीं इसलिए इसके आय और व्यय में बड़ी विसंगति मौजूद है। राज्य भी इस फण्ड से विवशता में ऋण लेते हैं और अवसर मिलने पर वे बाजार से ऋण लेना उचित समझेंगे। अतः इस फण्ड को बनाए रखने का औचित्य नहीं है। 

दु:ख ही सुख है!

यह भी बताया जा रहा है कि कम ब्याज दरें भी ज्यादा रिटर्न दे रही हैं क्योंकि महंगाई कम है। आम आदमी को समझाया जा रहा है कि उसकी छोटी छोटी बचतों पर दिया जाने वाला ब्याज देश को कैसे पीछे धकेल रहा है। उसे निश्चित सुरक्षित रिटर्न देना अब संभव नहीं है और अब उसे अपनी जमा राशि को बाजार की ताकतों को सौंपना होगा। उसके सुख, सुख नहीं हैं बल्कि वह जिन्हें दुःख समझता है वही सुख हैं।

2003 की एनडीए सरकार के समय प्रारम्भ हुआ नेशनल पेंशन सिस्टम यूपीए के कार्यकाल में फला फूला और अब पुनः एनडीए के दौर में परवान चढ़ रहा है। यह सरकार को अपने कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद सुनिश्चित पेंशन देने की जरूरी जिम्मेदारी से छुटकारा दिलाने का उपाय तो था ही। किन्तु इससे भी ज्यादा चिंताजनक था इन कर्मचारियों के साथ साथ असंगठित क्षेत्र के लाखों मजदूरों, किसानों, छोटे व्यापारियों और गृहणियों की खून पसीने की कमाई का निवेश इसके माध्यम से असुरक्षित शेयर मार्केट में कराना। सुरक्षित भविष्य के सपने दिखाकर इन्हें मंदी के दौर से गुज़रती अर्थव्यवस्था के शेयर बाजारों में जान फूंकने वाले नासमझ निवेशकों में बदल दिया गया है। लैटिन अमेरिकी देशों और कुछ यूरोपीय देशों में इसकी विफलता से सबक के बजाय प्रेरणा ही ली गई है।

आर्थिक विकास के इस सैडिस्टिक मॉडल की सफलता के लिए आत्मपीड़क जनता आवश्यक है। धार्मिक राष्ट्रवाद का उन्माद आर्थिक पीड़ा में भी आनंद की अनुभूति करा सकता है। फिर जनता को भरमाने के लिए बाजार की आभासी दुनिया के लटके झटके तो हैं ही।

(डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र रूप से लेखन करते हैं और आजकल रायगढ़, छत्तीसगढ़ में रहते हैं।)










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