जमकर आजादी का जश्न मनाइये, लेकिन!

ज़रूरी बात , , बुधवार , 15-08-2018


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जितेंद्र भट्ट

आज का दिन सिर्फ देशभक्ति के गीत पर झूमने का नहीं है। यह सोचने का दिन है कि फिजा में जिस तरह की गर्मी फैली है; उसमें आने वाले दिन-साल, क्या हम यह गीत इसी शान से गा पाएंगे?

बेधड़क गर्व के साथ तिरंगा लहराने का दिन है, आज।

पर वक्त यह सोचने का भी है कि जैसे तिरंगे के तीन रंग अलग-अलग होकर भी एक हैं। बावजूद अलग-अलग धर्म, जाति, समुदाय के होने पर भी हम एक कैसे रह पाएंगे? मोटरबाइक पर बेशक तिरंगा यात्रा निकालने का दिन है यह।

पर यह याद करने का दिन भी है कि मोटरबाइक की तिरंगा यात्रा के जरिए कोई हमारे समाज, हमारी तहजीब में जहर न घोलने पाए।

बेशक देशभक्ति के तरानों में झूमने का दिन है, आज।

पर यह भी याद रखिए। देशभक्ति की आड़ में तिरंगे के एक रंग के साथ कोई खेल तो नहीं रहा है?

जमकर भारत माता की जय के नारे लगाने का दिन है, यह।

पर याद रखिए, देशभक्ति का टेस्ट लेने का हक किसी को नहीं। किसी को भी नहीं। कोई यह तय नहीं कर सकता कि किसी को भारत माता की जय का नारा लगाना है; या वंदे मातरम कहना है; या फिर सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्ता की धुन पर खुश होना है।

और जब तिरंगे के सामने राष्ट्रगान पर सावधान की मुद्रा में खड़ें होंगे आप। तब यह सोचने का वक्त होगा कि देश संविधान से चलेगा, या किसी झुंड की मर्जी से।

यह भी सोचना पड़ेगा कि क्या हम इसके लिए तैयार हैं, कि एक दिन आपके दरवाजे के सामने कोई आएगा और खुद को किसी संगठन का सबसे बड़ा देशभक्त बताएगा; फिर कहेगा - ऐसे चलना होगा, ऐसा करना होगा; नहीं करोगे तो पाकिस्तान भेजा जाएगा।

वंदे मातरम शान से गाइए। गर्व के भाव से अपने दिलों को भरने का हक है सबको। पर सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा को भी न भूलिएगा। इकबाल का यह गीत भी करोड़ों लोगों के दिल में बसता है।

इकबाल की इन बातों को याद रखने का दिन है यह।

“मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना;

हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा।।

सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा;

हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसतां हमारा।।

और जैसा इकबाल कहते हैं - “मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना” देशभक्ति आपका अधिकार है। इस अधिकार का इस्तेमाल जमकर करिए। पर उन लोगों को माफ मत करिएगा, जो हिंदू-मुसलमान का मुद्दा छेड़ रहे हैं।

ऐसे चेहरों को भी आज याद रखने का दिन है; जो गरीबी गुरबत, शिक्षा, रोजगारी, खेती-किसानी, बीमारी, घर के सवालों पर नैतिक शिक्षा की किताब के किसी पन्ने पर छपी इबारतों सरीखी बात करते हैं; पर फिर वहां से सीधे उठकर लव जेहाद पर आकर टिकते हैं। या फिर ताजमहल के तेजोमहालय होने का जिक्र छेड़ देते हैं।

आज के दिन ऐसे चेहरों को मत भूलिएगा। जिन्होंने जनता को मंदिर-मस्जिद की जंग में उलझा रखा है। जो मंदिर-मस्जिद की दीवारों के रंग बदलने में लगे हैं। जो मील के पत्थर पर नाम क्या हो, इसी उधेड़बुन में मशगूल हैं।

आजादी के इस दिन को दिल में बसाकर रखिए। आजादी के क्या मायने हैं, इसे समझने का दिन है आज।

तब आपको उन लोगों की तस्दीक भी करनी होगी, जो सौ दो सौ फीट ऊंचा तिरंगा लहराकर अपनी देशभक्ति साबित करेंगे; और उसी पल किसी अखबार के पन्ने पर कौन सी खबर छपेगी, कौन सी हटेगी, ये तय कर रहे होंगे।

इस आजादी का क्या मतलब है, इसे समझिए। अगर किसी दिन अखबार के पन्ने खामोश होंगे, तो फिर अगले दिन आपकी आवाज का नंबर भी आ सकता है।

इस आजादी को सहेजकर रखिए। कैसे होगा ये सब? बड़ा कठिन काम है। उन लोगों की पहचान करिए, जो हिंदू-मुसलान के फर्क का मुद्दा छेड़ें। ऐसे लोगों की पहचान करिए – जो मंदिर-मस्जिद का झगड़ा लगाएं। ऐसे लोगों को पहचानिए – जो लव जेहाद, वंदे मातरम्, भारत माता की जय के नारों में आपको उलझा दें।

काम इतना मुश्किल भी नहीं है। आखिर सवाल आपकी आजादी का है।

 (जितेंद्र भट्ट पेशे से पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली स्थित एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल में कार्यरत हैं।)










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