ज्ञानी और ज्ञानखोर का अंतर ही अभिव्यक्ति की आज़ादी की अंतरकथा है!

मत-मतांतर , , शनिवार , 09-03-2019


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अमित मौर्या

ज्ञानी और ज्ञानखोर का अंतर ही अभिव्यक्ति की आज़ादी की अंतरकथा है। इसके बीच से जाती है पत्रकारिता की पगडंडी। चूंकि पत्रकारिता बाजार है इसलिए बाजार का आचरण और बाजार का व्याकरण लागू होना ही था, सो हो गया। जब पत्रकारिता बाजार में है तो बिकाऊ होगी ही। ऐसे में सच दो प्रकार का हो जाता है, एक- बिकाऊ सच और दूसरा टिकाऊ सच। टिकाऊ सच वाले ज्ञानी कहे जाने के हकदार हैं और बिकाऊ सच गढ़ने और मढ़ने वाले ज्ञानखोर। आज राजनीति और नौकरशाही में लुटेरे तथा पत्रकारिता में बुद्धिखोर प्रचुर मात्रा में हैं-एक खोजो हजार मिलते हैं। मांग से ज्यादा आपूर्ति है। इसलिए इन लोगों का बाजार भाव गिर गया है। पत्रकारिता में किसी विचारधारा को चिन्हित कर प्रसार संख्या बढ़ाने का हथकंडा उतना ही पुराना है जितनी हमारी आजादी। जैसे ही देश में समाजवादी विचारधारा का उदय हुआ याद करें पत्रकारिता के क्षेत्र में "दिनमान" नामक समाचार पत्रिका ने दस्तक दी।

अनजाने में समाजवादी विचारधारा ने दिनमान का काम किया और दोनों ही खूब चलीं। फिर समाजवादी विचारधारा का लोहिया की मृत्यु के बाद पराभव हुआ तो दिनमान भी बंद हो गयी। 1977 में कोंग्रेस विरोधी लहर पर सवार हो कर आई समाचार पत्रिका "माया" को याद करें। ग़ैर कांग्रेसवाद के प्रथम दौर का खात्मा वीपी सिंह से मोहभंग के साथ ही हो गया सो माया भी बंद हो गयी। इस बीच अंग्रेजी में सन्डे और हिन्दी में रविवार आयीं किन्तु ग़ैर कांग्रेसवाद की नकारात्मक विचारधारा के पतन के साथ इनका भी प्रकाशन बंद हो गया। किन्तु इस बीच इंडियन एक्सप्रेस प्रकाशन ने हिन्दी में जनसत्ता का प्रकाशन किया यह उस कालखंड की घटना थी जब इन्दिरा गांधी की ह्त्या हुई थी और फिर राजीव गांधी विराट बहुमत हासिल कर प्रधानमंत्री बने थे लेकिन दिल्ली की नाक के नीचे हरियाणा में देवीलाल ने ग़ैर कांग्रेसवाद का झंडा फहरा कर सरकार बना ली। जब जनता दल की सरकार बनने जा रही थी तब वीपी सिंह और चन्द्रशेखर के बीच कौन प्रधानमंत्री बनेगा यह द्वंद्व हुआ।

ऐसे में शक्ति संतुलन के पासंग देवीलाल थे और देवी लाल को रहस्यमय तरीके से चन्द्रशेखर से विश्वासघात करके वीपी सिंह की तरफ करने का मायाबी काम किसी राजनैतिक व्यक्ति ने नहीं किया था बल्कि जनसत्ता के प्रधान सम्पादक प्रभाष जोशी ने किया था। क्या यह राजनैतिक धड़ेबाजी पत्रकारिता का काम था या पत्रकारिता में लाइजनिंग जैसी विधाओं का घालमेल? खैर ग़ैर कांग्रेसवाद के अवसान के साथ ही जनसत्ता भी ख़त्म हो गया। आपातकाल की प्रेस सेंसरशिप (1975-77), फिर राजीव गांधी का मानहानि विधेयक (1984-85) और अब मनमोहन सिंह का सोशल साइट सेंसर का प्रयास लोगों को यह दलील देता है कि प्रेस की स्वतंत्रता पर तीनों बार कांग्रेस के समय ही हमला किया गया। पर यह अर्ध सत्य है। क्या समाजवादी मुलायम सिंह की सरकार ने उत्तर प्रदेश में प्रेस पर हल्लाबोल नहीं किया था? क्या कांसीराम ने लखनऊ में दैनिक जागरण पर हमला नहीं किया था? क्या ममता बनर्जी अभिव्यक्ति की आजादी बर्दाश्त करती हैं ? क्या कारगिल युद्ध के बाद ताबूत घोटाले के आक्षेपों से क्षुब्ध अटल सरकार ने प्रेस पर दबाव नहीं बनाया था?

रही सही कसर प्रातः स्मरणीय श्री श्री 1008 मोदी जी महाराज ने तो अखबार और चैनल को “प्रेस्टीट्यूट” ही बना दिया। इस परिदृश्य में पत्रकारिता में बुद्धिजीवी लुप्तप्राय प्रजाति है और बुद्धिखोर उपलब्धप्। यह बुद्धिखोर पत्रकार ख्याति पाने के लिए विवाद का मवाद बनने की जुगत लगा ही लेते हैं। अन्ना आन्दोलन इसका ताजा उदाहरण है। कई बुद्धिखोर अपने बिलों से निकल पड़े और देश में क्रान्ति के कुटीर उद्योग ही चल पड़े। प्यार की ईलू -ईलू कवितायें लिखने वाले कुमार विश्वास क्रान्ति के स्वयंभू प्रवक्ता हो गए और कवि सम्मलेन में उनकी दिहाड़ी बढ़ गयी। इस प्रकार एक विचारधारा पर चढ़ कर वह बाजार के कीमती कवि और सफल बुद्धिखोर हो गए। असीम त्रिवेदी भी कुछ वर्ष पहले तक देश में ढंग से नहीं जाने जाते थे लेकिन आज फिर ऐसे चर्चो की गुलेल पर सवार सवार हो गए। पर सवाल है कि क्या बाजारू हथकंडे से राष्ट्रीय प्रतीकों से खेला जा सकता है ? क्या राष्ट्रीय प्रतीक हमारा खिलौना है या उनका सार्वभौमिक सम्मान हम सभी की संवैधानिक वाध्यता?   

क्या सपा नेता आज़म खान द्वारा भारत माता को डायन कहना जायज था ? ...क्या कश्मीर में तिरंगा झंडा अलगाववादियों द्वारा सड़क पर जूतों से कुचला जाना जायज था ? क्या कहीं भारतीय संविधान को जलाया जाना जायज है ? --अगर नहीं तो फिर किसी कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी द्वारा भारतीय संप्रभुता के प्रतीक चिन्ह अशोक की लाट के शेरों के मुंह को कुत्ते का मुंह बना कर प्रस्तुत करना भला कैसे जायज है ? आप राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों को कुरूप भला कैसे कर सकते हैं ? यह सही है कि अन्ना के आन्दोलन को उकेरते हुए असीम अच्छे सम्प्रेषण वाले कार्टून बना रहे थे पर यह भी सही है कि इसी अतिरेक में उन्हें अपनी सीमाओं का ध्यान नहीं रहा और मर्यादा का उल्लंघन कर बैठे। स्वतन्त्रता और स्वच्छंदता में अंतर होता है। व्यंग्य व्यवस्था पर होना चाहिए अव्यवस्था का प्रतिपादक नहीं। यहां फेसबुक पर अभिषेक तिवारी (राजस्थान पत्रिका ), श्याम जगोटा और श्री कुरील बहुत ही पैनी  अभिव्यक्ति के व्यंग्य चित्र बना रहे हैं। व्यंग्य व्यवस्था के स्वरुप को बरकरार रखने के लिए हो तो आग्रह है और व्यवस्था को कुरूप बनाता तो तो दुराग्रह। व्यंग्यों की भी एक आचार संहिता तो है ही। 

(लेखक अमित मौर्य वाराणसी से प्रकाशित होने वाले एक स्थानीय पेपर के संपादक हैं।)

 








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