गांधी ऐसा ही भारत चाहते थे !

एक नज़र इधर भी , , मंगलवार , 30-01-2018


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उपेंद्र चौधरी

विवधता किसी भी संस्कृति के व्यापक होने की निशानी होती है। विविधता का मतलब ही होता है कि हम अलग-अलग हैं और एक दूसरे से अलग होने के साथ-साथ हम विशिष्ट भी हैं। हम अपने अलग होने में ही एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं। ठीक उसी तरह जैसे हमारे शरीर के अलग-अलग अंग के नाम अलग-अलग हैं, उसके कार्य अलग-अलग हैं और इन भिन्नताओं के साथ हमारे सभी अंग अपने आप में विशिष्ट हैं; कोई भी अंग एक दूसरे की जगह नहीं ले सकता; कोई भी अंग किसी दूसरे का कार्य नहीं कर सकता; हमारे दैनिक मगर विशिष्ट कार्यों की पूर्ति के लिए विशिष्ट अंग ही चाहिए होते हैं। बहुत कम ही ऐसा होता है कि हमारा कोई अंग किसी दुर्घटनावश कार्य करना बंद कर देता हो या फिर हमारे शरीर से अलग हो जाता हो,तब हम किसी दूसरे अंग को उसका विकल्प बनाने की कोशिश करते हों।

मगर इस कोशिश की सफलता भी स्वाभाविक नहीं होती है। उदाहरण के लिए, हमारे बीच ऐसे कई लोग मिल जाते हैं, जिनके दायें हाथ किसी दुर्घटना के भेंट चढ़ गया और उन्होंने अपने बचे हुए बायें हाथ से अपने दायें हाथ के कार्य कर रहे हों; या किसी के दोनों हाथ दुर्घटना के शिकार हो गये हों और उन्होंने अपनी ग़ज़ब की कोशिश से हाथों वाली कूची या क़लम पैरों के हवाले कर दिये हों; अपने पैरों के सहारे बहुच अच्छी पेंटिंग कर रहे हों या बहुत तेज़ी के साथ बहुत सुंदर हस्तलेखन की जगह सुंदर पादलेखन कर रहे हों।

ऐसे लोग अपने पैरों को कूची या क़लम थमाने के अलावे वो बहुत सारे कार्यों की ज़िम्मेदारी नहीं दे सकते, जो कभी उनके हाथ किया करते थे; मसलन, बोझ उठाना, मशीनें चलाना, हाथ से खेले जाने वाले खेल खेलना आदि। हमारी शारीरिक रचना में राष्ट्रीय रचना की तरह ही विविधता है और जब तक ये विविधता क़ायम रहती है, हम एक स्वस्थ व्यक्ति या राष्ट्र कहलाते हैं। जैसे इस शारीरिक या राष्ट्रीय विविधता पर आंच आती है, हम विकलांग हो जाते हैं। विकलांगों के प्रति हमारा नज़रिया सहानुभूति वाला होता है। इसका कारण सिर्फ़ इतना है कि हम अपनी सहानुभूति से उस अंग विशेष के विकल होने का अनुभव करते हैं और विकलांगता के शिकार व्यक्ति को यह अहसास कराते हैं कि एक व्यक्ति के रूप में उनकी उपयोगिता ख़त्म नहीं हुई है।

इसी उपयोगिता का आधार वह सरकारी प्रावधान भी बनता है, जिसमें विकलांगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। यह दुर्घटना में गुम हो चुके अंगों वाले व्यक्ति के प्रति यह हमारा ऐसा क़ानूनी या नैतिक नज़रिया है, जो विकलांग हो चुके व्यक्ति को उसके शरीर के संपूर्ण होने का सामाजिक अहसास कराते हैं। यह समाज की आख़िरी इकाई को लेकर हमारी एक विविधता को स्वीकार करने वाली अद्भुत दृष्टि है,जो दृष्टि हमे एक मनुष्य होने के अहसास के अनुपम धरातल पर ले जाता है।

जिस आरक्षण को राजनीतिक रूप से हम सामाजिक न्याय के लिए ज़रूरी बताते हैं, वह आरक्षण भी दरअसल मनुष्य होने का वही धरातल है, जो विकलांगों के लिए आरक्षण देकर हम उसे हासिल करने का संतोष पाते हैं। सामाजिक रूप से विकलांग बना दिये गये जाति या वर्ग विशेष की संपूर्ण उपयोगिता के स्वीकार किये जाने की तरफ़ एक क़दम है। अपनी विविधता के साथ ये तमाम जातियां कभी महत्वपूर्ण हुआ करती थीं। ये जातियां किसी सिस्टम की ऊपज नहीं थी। यह कथित तौर पर ईश्वर द्वारा बनायी गयी भी नहीं है। काल क्रम में यह सामाजिक ज़रूरत बनी होगी और श्रम विभाजन की आवश्यकता ने भारतीय संदर्भ में जाति विभाजन का रूप ले लिया होगा। ऐसा होने में सदियों लगे होंगे। व्यवस्था ने सुविधा के लिए इस श्रम विभाजन वाले जाति विभाजन को एक रूढ़ रूप दे दिया। मध्यकाल और आधुनिक काल की शैशवास्था तक भी इस श्रम विभाजन के लिए ज़रूरी दिखती जाति व्यवस्था चलती रही। उसमें बदलाव की ज़रूरत नहीं रही। मगर वैज्ञानिक तरीक़े से उत्पादन की नई तकनीक ने इस जाति व्यवस्था को श्रम विभाजन से देखने वाली दृष्टि पर ही सवाल उठा दिया।

व्यवसाय विशेष के साथ विकसित हुए इस जाति विभाजन के साथ जो सबसे बड़ा अन्याय हुआ, वह इसका शुचिता या पवित्रता के साथ सम्बन्ध का स्थापित हो जाना। वास्तव में, भारतीय संस्कृति की इस परिघटना को विविधता के टूट जाने की तरह ही देखा जाना चाहिए। क्योंकि विविधता में विशिष्टता का बोध होना ज़रूरी है। लेकिन इस परिघटना से उलटा हुआ, चंद जातियों में यह बोध अपने चरम पर गया और पिरामिडिकल संरचना से होते हुए विशिष्टता की अंतिम परिणति अनगिनत जातियों में हीनताबोध की शक्ल में व्यापक हो गयी। भारतीय समाज या सामाजिक संस्कृति भले ही सवर्ण या ग़ैर सवर्ण जैसे स्पष्ट रूप से दो भागों में बंटा हुआ दिखते हो, लेकिन इतना भर देखकर इसे पारिभाषित कर पाना संभव नहीं है। इसकी वजह यह है कि ग़ैर सवर्णों ने भी अपने भीतर सवर्णों का एक विशेष पिरामिडिकल संरचना बना ली । यह संरचना इतनी जटिल है कि इसे खोज पाना और उसे समझ पाना क़रीब-क़रीब संभव नहीं है। समझ नहीं पाने की इस स्थिति के अनेक आयाम बन जाते हैं।

जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं, वह कुछ-कुछ वैसी ही समझ है,जिस तरह भारतीय समाज को सवर्ण या ग़ैर सवर्णों में बांटकर देख लेने की समझ। सच्चाई तो यही है कि भारतीय समाज की तरह हिन्दू धर्म भी एक जटिल संरचना वाला धर्म है। इसका कोई ओर-छोर नहीं है। अंग्रेज़ों ने भी हिन्दू धर्म को वेद, उपनिषदों या पुराणों से खोदकर और उसे झाड़ पोंछकर अपने हिसाब से रूप-रंग देने की कोशिश की थी। लेकिन वह वैसा था ही नहीं, लिहाज़ा अंग्रेज़ों ने हिन्दू धर्म को आधा अधूरा ही समझ पाया। संभव है कि भारत के किसी कोने में आपको कोई समुदाय किसी ऐसे देवता को पूजता नज़र आये, जिसका आपने कभी नाम ही नहीं सुना हो। संभव है कि उन देवताओं की चर्चा न वेद में हो,न उपनिषद में और न ही पुराणों में हो।लेकिन तब भी वह हिन्दू हैं।

उत्तर भारत के लोग दक्षिण भारत के अनेक देवताओं के नाम नहीं जानते,गुमान पालने की ज़रूरत नहीं है कि दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारतीय तमाम देवताओं के नाम जानते-समझे और पूजते हों।फिर भी दोनों ही हिन्दू हैं। यही कारण है कि सर्वोच्च अदालत ने कभी कहा था कि हिन्दू कोई धर्म नहीं,बल्कि जीवन जीने का एक  दृष्टिकोण है। असल में जब सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष को सामने रखता है,तो इसका मतलब विविधता का वही धरातल होता है,जहां एक-एक जाति,समुदाय,विचार और संप्रदायों की अपनी-अपनी विशिष्टता है।यह विशिष्टता ही असल में भारत की पहचान है। विशिष्टता का अर्थ,उसकी विशेष जीवन शैली,विशेष पूजा पद्धति से है।    

हम विविधता के स्वर्ग वाले इस देश में अच्छी तरह जानते हैं कि जाति एक हक़ीक़त है और राजनीति ने इसे बेहद मज़बूती दे दी है। लेकिन किसी जाति विशेष के हो जाने भर से कोई भी मनुष अपने आदमी होने को लेकर न तो कमतर होता है और न ही बेहतर होता है। लेकिन रूढ़ हो चुके जातीय सिस्टम ने जाति के साथ उसकी ग़रीबी या अमीरी को भी जोड़ दिया है। इसलिए अपवादों को छोड़कर जाति विशेष की अमीरी और ग़रीबी स्वाभाविक मानी जाती रही है। जिस तरह किसी दुर्घटना में कोई सर्वांग व्यक्ति विकलांग हो जाता है,उसी तरह ऐतिहासिक विकासक्रम की दुर्घटना ने जातियों की सामाजिक विकलांगता पैदा कर दी है। विकलांग को वैज्ञानिक उपकरणों के ज़रिये कृत्रिम अंगों से सर्वांग बनाने का सफल प्रयत्न हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि सामाजिक रूप से विकलांग बना दिये गये जातियों के लिए आरक्षण क्या आख़िरी बैसाखी है ? नहीं। सर्वांग होने तक ही इस वैसाखी की ज़रूरत है।

अगर सिर्फ़ सवर्ण की तरह सोचा जाय, तो इसे समझ पाना मुश्किल है। लेकिन अगर मनुष्य होने के धरातल पर खड़े होकर विचारा जाय,तो समझना उतना ही आसान है।यह भी कोई तर्क नहीं कि जब इस जटिल समाज में एक सामान्य मनुष्य होकर चलने फिरने की आज़ादी सहज हो जाये, तो फिर आरक्षण की वैसाखी भी ग़ैर-ज़रूरी हो जाता है। लेकिन इस राह की सबसे बड़ी दिक़्क़त यही है कि क़ानूनी रूप से हम आरक्षण का उपयोग भले ही एक उपकरण की तरह कर लें, लेकिन सोच के स्तर पर जाकर बदलाव लाना कठिन है। राजनीतिक व्यवस्था में भले ही बदलाव ले आया जाय, लेकिन सामाजिक हैसियत की निगाह से ये बदलाव एक चुनौती है। मगर राष्ट्रवाद का असली चेहरा तो इस चुनौती के ख़िलाफ़ लड़ाई में ही सामने आता है। राष्ट्र चूंकि एक-एक नागरिक की समग्रता का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए राष्ट्र के प्रति अपनेपन के अहसास से बने उस राष्ट्रवाद में भी उसी की झलक मिलनी चाहिए। एकता भले ही सैद्धांतिक रूप से दिखाने वाला मंज़र हो, मगर विविधता को स्वयं में जज़्ब कर लेने की कला अब भी इसे सीखना है। सीखने की प्रक्रिया की गति से ही तय होगा कि हम संस्कृतियों की विविधता की शक्ल में एक मुकम्मल राष्ट्रवाद कब हासिल कर पाते हैं। संस्कृतियों की इस विविधता में धर्मों से निकली संस्कृतियां भी शामिल हैं।

इसी समझ को अगर धार्मिक रूप से विकसित किया जाय, तो फिर हमें साफ़-साफ़ दिखेगा कि इस्लाम के व्यवहारिक और सैद्धांतिक पक्ष भी बेहद जुदा-जुदा हैं। इतना अलग कि किसी मुसलमान को देखकर अगर आप इस्लाम को समझना चाहें, तो इस्लाम को समझ पाना उतना ही मुश्किल है, जितना किसी गाय को पूजते हिन्दू को देखकर गाय की बलि चढ़ाते हिन्दू को समझ पाना चुनौतीपूर्ण है। इस्लाम को आज हम जिस रूप में देखते हैं, उसका एक प्रचलित पहलू ज़रूर है,मगर इस्लाम वही नहीं है।इस्लाम के भीतर भी हिन्दुओं वाली विडंबनात्मक विरोधाभास हैं। ओसामा-बिन-लादेन के इस्लाम और अलग-अलग फिरकों के मौलानाओं के इस्लाम से पैग़म्बर मोहम्मद का इस्लाम बहुत अलग है। जब कभी आप पैग़म्बर मुहम्मद को समझने की कोशिश करेंगे, तो मनुष्य के इतिहास में वह उन्हीं शख़्सियतों की फेहरिस्त की कड़ी लगेंगे, जिन्होंने दुनिया की बेहतरी के लिए उसे बदलने की कोशिश की है। इस अर्थ में राम की तरह पैग़म्बर भी अपने आप में विशिष्ट हैं।

राम को अपना अराध्य मानने वालों के बीच जिस तरह की विविधता है,इस्लाम के इस आख़िरी पैग़म्बर को मानने वालों के बीच भी उतनी ही विविधता है। विविधता को अगर हम अपनी विशिष्टता की तरह स्वीकार करते हैं, तो सही अर्थों में राष्ट्रवाद की तरफ़ बढ़ने की यह सबसे बड़ी शिष्टता होगी। ऐसे में न कोई टकराहट होगी, न तो दंगों की अब तक जल चुकी अनगिनत भट्टी में स्वाहा हो चुके नागरिकों की तरह हमारा हस्र होगा, न कोई छ: दिसम्बर बानवे होगा,न कोई गोधरा और साबरमती एक्सप्रेस कांड होगा,न कोई हमें संप्रदायिक बनाकर हमारे ही वोट की पीठ पर अपने चुनाव का पैर रखकर हमारे ही ख़िलाफ़ सत्ता पर जा बिराजने वाली राजनीति होगी और जाति और धर्मों की आग से तपकर राष्ट्रवादी कुंदन बनने वाली जाति निर्पेक्ष राजनीति और धर्मनिर्पेक्ष सियासत के न कोई खोखले दावे होंगे। मोहनदास करमचंद गांधी ऐसा ही भारत तो चाहते थे।

गांधी सचमुच विविधता से भरा एक ऐसा भारत चाहते थे, जहां हर विशिष्टता स्वयं में समग्र हो, और इन अनगिनत समग्रताओं में इकाई बन जाने की क्षमता की गुंजाइश इतनी अद्भुत हो कि भारत की एकता के खांचे में गुंथकर ये इकाईगत समग्रता एक सुंदर भारत का निर्माण करता हो। गांधी का संपूर्ण दर्शन गुजराती कवि नरसिंह मेहता के उस भजन में अपना आकार पाता है, जिसमें परायी पीड़ा को महसूस करने की बातें हैं, समदृष्टि जैसे उन उदार पहलुओं को अपनाने का आह्वान है, जिस पर चलकर भारतीय संस्कृति सिर्फ़ राष्ट्रवादी नहीं रह जाती है,‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का आह्वान करने लगती है।  

(उपेंद्र चौधरी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 






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