खुद आईसीयू में पहुंची सरकार क्या खाक ठीक करेगी किसानों की सेहत!

मुद्दा , , सोमवार , 04-06-2018


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प्रवीण मल्होत्रा

मध्यप्रदेश सरकार पर मार्च 2018 तक 160,000 करोड़ रुपये का कर्ज था, जिसमें से 88,000 करोड़ रुपये का कर्ज सिर्फ बाजार का है। वित्त वर्ष 2017-18 में राज्य सरकार ने 12,000 करोड़ रुपये ब्याज के रूप में चुकाये हैं। वित्त वर्ष 2018-19 की शुरुआत में ही राज्य सरकार बाजार से 3000 करोड़ रुपये का कर्ज पुनः ले चुकी है। कर्ज और ब्याज के बोझ में डूबी राज्य सरकार की आर्थिक हालत निरन्तर खराब हो रही है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इस समय राज्य सरकार 'Economic ICU' में भर्ती है। इसके बावजूद मध्यप्रदेश के घोषणावीर मुख्यमंत्री नवंबर--दिसम्बर का विधानसभा चुनाव जीतने के लिये बेसिरपैर की घोषणाएं किये जा रहे हैं। उन्हें मालूम है कि वे आखिरी राजनीतिक पारी खेल रहे हैं। इसलिये कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते हैं। लेकिन भविष्य की सरकार के लिये वे कर्ज का विंध्याचल अवश्य छोड़ कर जाएंगे।

प्रदेश में किसान आंदोलनरत हैं। पिछले वर्ष 6 जून को पुलिस की गोली और पिटाई से मंदसौर जिले में 6 किसानों की मौत हो गयी थी। उसके बाद मुख्यमंत्री ने आनन-फानन में उपवास की नौटंकी कर किसानों के हित में कई घोषणायें की थीं। जो किसान पुलिस की गोली से मारे गए थे उनके परिजनों को 1-1 करोड़ रुपये मुआवजा देने तथा उपज का समर्थन मूल्य नहीं मिलने पर भावान्तर योजना की घोषणा की गई थी। राज्य सरकार का कहना है कि भावान्तर योजना के तहत किसानों को 20,000 करोड़ रु बांटा गया है, किन्तु राज्य के किसान इससे सन्तुष्ट नहीं हैं।

अभी भी किसानों के लिये उपज की कुल लागत का डेढ़ गुना एक सपना ही बना हुआ है। किसान संगठनों ने 1 जून से 10 दिन का 'गांव बन्द' का आंदोलन छेड़ रखा है, जिसका प्रभाव मालवा और निमाड़ अंचल में अधिक तथा महाकौशल और ग्वालियर अंचल में आंशिक ही है। लेकिन इस आंदोलन के कारण दूध और सब्जियों की आपूर्ति में कमी अवश्य आयी है। 

इस बार के किसान आंदोलन की एक अच्छी बात यह है कि पूरा आंदोलन अभी तक सामान्यतः शांतिपूर्ण ही रहा है। किसानों ने अपनी ओर से कोई उग्र व्यवहार तथा प्रदर्शन नहीं किया है। राज्य प्रशासन भी पिछले वर्ष की गलती से सबक सीख कर चुस्ती दिखा रहा है। किसान आंदोलन को दबाने के लिये पुलिस की गाड़ियां गांव-गांव घूम रही हैं। सोशल मीडिया पर उत्तेजक मैसेज फैलाने वालों पर भी सख्ती की जा रही है और उन्हें निरुद्ध भी किया जा रहा है।

पुलिस-प्रशासन ने आंदोलन आरम्भ होने से पहले ही सक्रिय किसान नेताओं से मुचलके (बॉन्ड) भरवा लिये थे। प्रशासन की इस कार्रवाई से उनमें असन्तोष है तथा उनके स्वाभिमान को ठेस भी लगी है। 6 जून को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी मंदसौर आ रहे हैं। वे श्रद्धांजलि सभा और किसान सम्मेलन को सम्बोधित करेंगे। पिछले साल गोली काण्ड तथा पुलिस की पिटाई में मारे गए 6 किसानों के परिजनों से मुलाकात भी करेंगे। इस दौरान राज्य सरकार और जिला प्रशासन को संयम और उदारता का परिचय देना चाहिये। यदि विपक्ष के राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यक्रम को बलपूर्वक रोकने का प्रयास किया गया तो इससे किसानों में भी असन्तोष उत्त्पन्न होगा तथा वे उग्र भी हो सकते हैं। अतः 6 जून राज्य सरकार के लिये परीक्षा का दिन होगा।

आशा है प्रशासन ऐसा कोई कार्य नहीं करेगा जिससे उत्तेजना पैदा हो तथा यही अपेक्षा किसान नेताओं और उनके संगठन से भी रहेगी। आंदोलन के दौरान भी किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बदस्तूर जारी हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे राधारमण सिंह जैसे बीजेपी के नेता किसानों की आत्महत्या को "पब्लिसिटी के लिये की गई आत्महत्याएं" बता कर जले पर नमक छिड़कने का ही काम कर रहे हैं। प्रधानमन्त्री से भी यह अपेक्षा है कि वे अपने इन बड़बोले मन्त्रियों को यदि कैबिनेट से हटा नहीं सकते हैं तो कम से कम उनके मुंह पर लगाम तो लगा ही सकते हैं।

(लेखक राजनीतिक टिप्पणीकार हैं और इंदौर में रहते हैं) 








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???? ????? ? :: - 06-04-2018
किसानों के असन्तोष से उपजा आक्रोश बिल्कुल जायज है। जबतक वेतन, कृषि उत्पाद और औद्योगिक उत्पाद के बीच आमदनी का असन्तुलन समाप्त नही होता किसानों के बीच का असन्तोष दब तो सकता है समाप्त नही होगा।