निरंकुशतावाद के नग्न पैरोकार थे गोलवलकर

आरएसएस और उसकी विचारधारा , , बृहस्पतिवार , 17-08-2017


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अरुण माहेश्वरी

आरएसएस और उसकी विचारधारा की किस्त-3

प्रश्न सिर्फ राष्ट्र संबंधी विचारों का नहीं है। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत का निर्माण उपनिवेशवाद के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बीच से हुआ है। आजादी की लड़ाई के पूरे दौर में जिन लोगों ने भारत को एक उभरते हुए राष्ट्र के रूप में देखा, यहां के निवासियों के हितों और उनकी नियति को व्यापक अर्थों में साझा माना और देश के निवासियों के स्वशासन के लिये जिन्होंने कार्य किया - वे ही सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय कहलाने के हकदार हैं। इस कसौटी पर कसने पर कोई भी संकीर्ण स्वार्थों तक सीमित सांप्रदायिक दल या समूह कभी राष्ट्रीय नहीं कहला सकता है।

आरएसएस के सिद्धांतकार इस बात से ही इंकार करते हैं कि आजादी की लड़ाई के बीच से किसी नये राष्ट्र का उदय हो रहा था। गोलवलकर उन लोगों की खिल्ली उड़ाते थे जो कहते थे कि हमारा राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में है। इसके विपरीत उनका तर्क था कि भारत एक राष्ट्र के रूप में आज से नहीं, कितने सहस्त्र वर्षों से बना हुआ है, इसका अनुमान तक लगाना कठिन है। उनके अनुसार जो कहते हैं कि राष्ट्र अभी बन रहा है, वे धोखेबाज हैं और भारत के प्राचीन गौरव को छोटा करके दिखा रहे हैं।

हेडगेवार और गोलवलकर।

सच्चाई यह है कि आरएसएस और उसके तमाम संगठन प्राचीन राष्ट्रीय गौरव के बखान की आड़ में अपने इस अक्षम्य अपराध को छिपाते रहे हैं कि उन्होंने स्वतंत्र भारतीय राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया में कोई योगदान नहीं किया, उल्टे उदीयमान आधुनिक भारतीय राष्ट्र को तोड़ने की उपनिवेशवादी साजिश के वे हमेशा अंग बने रहे। इस सच्चाई को भी वे भुलवा देना चाहते हैं कि दुनिया के इतिहास में हमेशा राष्ट्रों के बनने और बिखरने की प्रक्रिया जारी रही है। स्वयं भारत का इतिहास इसका गवाह है। हमारी नजरों के सामने अंग्रेजों के शासन का भारत तीन भागों में बंट चुका है।

इतिहास के हर दौर में राष्ट्र का चरित्र भी एक नहीं होता। आजादी की लड़ाई के बीच जिस भारतीय राष्ट्र का निर्माण हुआ था वह इसके सभी नागरिकों के साझा आर्थिक हितों पर आधारित एक स्वतंत्र, जनतांत्रिक मूल्यों से प्रतिबद्ध राष्ट्र है जिसमें धर्म, जाति, लिंग और भाषा के आधार पर भेदभाव को कोई स्वीकृति नहीं मिल सकती। भारत के राष्ट्रवादियों ने हमारे देश के वैविध्य और विश्व इतिहास के अनुभवों के आधार पर इन मूल्यों को अपने लिये अनिवार्य माना और भारत को एक गणतांत्रिक धर्मनिरेपेक्ष राष्ट्र के रूप में घोषित किया। चूंकि आरएसएस हमेशा उपनिवेशवादियों का पिट्ठू रहा और तमाम जनतांत्रिक सामाजिक मूल्यों का सख्त विरोधी, इसीलिये अपनी शर्म को छिपाने के उद्देश्य से ही आरएसएस और उसके तमाम चेले-चपाटे जोर-शोर से इस सच्चाई की खिल्ली उड़ाते रहते हैं कि भारतीय राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया अब भी जारी है। आज भी जब हमारे राष्ट्रीय ताने-बाने को विभिन्न प्रकार के अलगाववादियों से चुनौती मिलती है तथा जनतांत्रिक मूल्यबोध के विकास को हम अवरुद्ध पाते हैं, तब हमें कहना पड़ता है कि आधुनिक अर्थों में हमारा राष्ट्र अभी भी निर्माण की प्रक्रिया में ही है।

सिर्फ आजादी की लड़ाई के दौरान नहीं, आजादी के बाद भी आरएसएस और उसके संघ परिवार ने हमारे देश के जन जीवन को उन्नत करने, उसे आर्थिक शोषण से मुक्त करने के लिए कोई काम नहीं किया है। ठीक इसके विपरीत, जनता के विभिन्न हिस्सों के बीच सदियों से जो तमाम धार्मिक अंधविश्वास और सामाजिक रूढ़ियां घर किये हुए हैं, आरएसएस ने हमेशा उन्हीं को अपनी पूंजी बनाने की भरसक कोशिश की। इसे हम सामाजिक भेद-भाव, शिक्षा, नारियों के उत्थान, जातिवाद और सांप्रदायिकता आदि तमाम विषयों पर आरएसएस के सिद्धांतकार गोलवलकर के विचारों में साफ तौर पर देख सकते हैं।

गोलवलकर के साथ सावरकर।

असमानता का पक्षधर

सामाजिक न्याय और समानता के बारे में गोलवलकर का कहना था कि हमारे समाज में अंतर्निहित असमानता अनादि काल से समाज का अविभाज्य अंग रही है। उनके शब्दों में - हमारे दर्शन के अनुसार ब्रह्मांड का उदय ही सत्व, रजस और तमस के तीन गुणों के बीच संतुलन के बिगड़ने के कारण हुआ है और इन तीनों में यदि बिल्कुल सही संतुलन, ‘गुणसाम्यस्थापित हो जाए तो यह ब्रह्मांड फिर शून्य में विलीन हो जायेगा। इसीलिये असमानता प्रकृति का अविभाज्य अंग है। ऐसी कोई व्यवस्था जो इस अंतर्निहित असमानता को पूरी तरह समाप्त करना चाहती है, वह विफल होने के लिये बाध्य है। [ एम एस गोलवलकर, बंच आफ थाट्स, 1960, पृ. 31 ]

इसी समझ के आधार पर गोलवलकर ने जनतंत्र और साम्यवाद, दोनों को ही ठुकराया। जनतंत्र के बारे में वे लिखते हैं :  ‘जनता के द्वारातथाजनता के लियेकी अवधारणा का अर्थ है राजनीतिक प्रशासन में सबकी समान भागीदारी का होना। यह काफी हद तक एक भ्रम मात्र है। (पृ.31)

एक शुद्ध ब्राह्मणवादी, वर्णवादी, रूढ़िवादी दृष्टिकोण को अपना कर शुरू से ही आरएसएस समाज सुधार या आधुनिक जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति नकारात्मकता और नफरत को फैलाने में लगा रहा। उसकी नजर जनतांत्रिक, धर्मनिरेपेक्ष और समाजवादी शक्तियों की विफलताओं पर ही टिकी रही है, और वह जनतांत्रिक शक्तियों की हर कमजोरी का लाभ उठाकर, जनतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करने की कोशिश में लगा रहा है।

समाज में असमानता को अनिवार्य समझने वाले आरएसएस के सिद्धांतकार की दृष्टि में भारत का आम, गरीब आदमी एक अधम, निकृष्ट प्राणी से अधिक कुछ नहीं है। वर्णवादी विचारों में शूद्रों के प्रति जो परंपरागत अपमानजनक दृष्टिकोण रहता है, गोलवलकर उससे कम तिरस्कार के साथ रोजी-रोटी के लिये जूझते आम आदमी के बारे में चर्चा नहीं करते। ऐसे नीचे के तबकों के लोगों के बारे में वे कहते हैंऐसे लोग बहुत जल्द संगठित हो जाते हैं। संगठित जीवन का वह सबसे अधम स्तर है। जीवन के इस निचले तबके में संगठन बहुत सरल होता है। मांस का एक टुकड़ा फेंकने पर हम देखते हैं कि सारे कौए इकट्ठे हो जाते हैं, यह झुंड की मानसिकता है। (वही, पृ. 65)

एक परिवार के साथ गोलवलकर।

वर्ण-व्यवस्था का समर्थक

आम गरीब लोगों को कौआ समझने वाले गोलवलकर जनता को राजनीतिक अधिकार देने के सर्वथा विरोधी थे। वे निरंकुशतावाद की नग्न पैरवी करते थे। जनतंत्र नाम के रोग को वेपरोपकारी निरंकुश शासक की अनुपस्थिति की उपजमानते थे। राज्य के पास कोई आर्थिक सत्ता रहे, अर्थात आर्थिक शोषण के अवसान या सामाजिक न्याय में राज्य की कोई भूमिका रहे, इसे ही वे राष्ट्र के लिये श्रेयस्कर समझते थे। वे लिखते हैं : दासता या खूनी क्रांति से बचने के लिये तथा टिकाऊ शांति और समाज की स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिये हमारे प्राचीन हिंदू विचारों और आचरण ने आर्थिक सत्ता को राज्य के अधिकार से अलग रखा। इसने संपत्ति पैदा करने वाले लोगों को राजनीतिक सत्ता से वंचित रखा। (वही, पृ. 101)

इसी आधार पर वर्ण व्यवस्था को हिंदू राष्ट्र की मुख्य शक्ति बताते हुए उन्होंने लिखा : ईरान, मिस्र, रोम, यूरोप तथा चीन तक के सभी राष्ट्रों को मुसलमानों ने जीत कर उपने में मिला लिया, क्योंकि उनके यहां वर्ण व्यवस्था नहीं थी। सिंध, बलूचिस्तान, कश्मीर तथा उत्तर पश्चिम के सीमांत प्रदेश और पूर्वी बंगाल में लोग मुसलमान हो गये क्योंकि इन क्षेत्रों में बौद्ध धर्म ने वर्ण व्यवस्था को कमजोर बना दिया था।

यह है आर एस एस का मूलभूत दृष्टिकोण। जहां तक राजनीतिक सत्ता को आर्थिक अधिकारों से शून्य करने के बारे में प्राचीन भारतीय चिंतन की दुहाई देने का प्रश्न है, यह एक कोरी बकवास के अलावा कुछ नहीं है। प्राचीन भारतीय चिंतन में अर्थनीति और राजनीति के बारे में सबसे श्रेष्ठ पुस्तक कौटिल्य काअर्थशास्त्रकही जा सकती है। जिन्होंने भी इसे पढ़ा है वे यह जानते हैं कि हमारे प्राचीन चिंतन के नाम पर राजनीति को अर्थनीति से अलग करने की बात सफेद झूठ के अलावा और कुछ नहीं है। सच्चाई सिर्फ यह है कि गोलवलकर का उद्देश्य प्राचीन भारतीय चिंतन के वैशिष्ट्य को बताने का कभी नहीं रहा। वे एन-केन-प्रकारेण जनतंत्र और समानता के मूल्यबोध के खिलाफ तानाशाही और वर्ण-व्यवस्था के मूल्यों का प्रचार करना चाहते थे और इसीलिये उन्होंने प्राचीनता की भी दुहाई दी।

हरिजनों और पिछड़ी हुई जातियों के उत्थान के लिये विशेष संवैधानिक व्यवस्थाओं का भी आरएसएस हमेशा से कट्टर विरोधी रहा है। इस बारे में गोलवलकर का कहना थासरकार ने कुछ वर्गों को हरिजन, आदिवासी और पिछड़े हुए वर्ग करार कर ईष्‍​र्या और अलगाव का रास्ता साफ किया है। उन्हें विशेषाधिकार तथा विशेष आर्थिक सुविधाएं दी गयी हैं ताकि उन पर नियंत्रण रखा जा सके। (गोलवलकर, वही, पृ. 111)

 

 










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