गुजरात में कारपोरेटी चमक पर भारी पड़ रहा है जिंदगियों का अंधेरा

गुजरात की जंग , अहमदाबाद , बृहस्पतिवार , 07-12-2017


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महेंद्र मिश्र

अहमदाबाद। गुजरात एक अजीब किस्म के दोहरेपन का शिकार है। जो दिखाया जा रहा है वो है नहीं। जो है वो दिखाया नहीं जा रहा है। इन्हीं दोनों पासों के बीच गुजराती एक नकली छवि ढोने के लिए मजबूर हैं और उससे उन्हें बांध भी दिया गया है। चूंकि वो एक बड़ी छवि है लिहाजा उससे निकलना उनके लिए बहुत मुश्किल है। जब तक कि कोई उसके समानांतर एक नयी और उससे बड़ी तथा वास्तविक छवि को आगे लाने का प्रयास नहीं किया जाता है। ये कई रूपों में देखा जा सकता है। मसलन बाहर छवि कारपोरेट गुजरात की है लेकिन किराना से लेकर आम दुकानों में सामान बिल्कुल लोकल मेड हैं। ब्रांडेड सामान ढूंढने से भी मिलना मुश्किल है। बड़े-बड़े सरकारी अस्पताल हैं लेकिन डाक्टर और नर्स नदारद हैं। प्राइमरी स्कूलों की सुंदर बिल्डिंग हैं लेकिन उनमें शिक्षक और शिक्षा की गुणवत्ता गायब है। सम्मोहित कर लेने वाले फ्लैट हैं लेकिन उनमें रहने वाली महिलाएं और बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। 

ऐसे में एक चमचमाती दुनिया के इन अंधेरों की तरफ निगाह बहुत मुश्किल से जा पाती है। लेकिन ये बात साफ हो जाती है कि सरकारें जिसके लिए बनती हैं वो काम यहां नहीं हो रहा है। व्यवस्था इंसान के लिए नहीं बनी है बल्कि इंसान व्यवस्था के लिए इस्तेमाल हो रहा है। कारपोरेट की चक्की में पिसकर वो पूंजी निर्माण का महज साधन बन कर रह गया है। पैसा इंसान की नहीं बल्कि इंसान पैसे की गुलामी कर रहा है।

बताया जाता है कि मोदी के मुख्यमंत्री रहते ऊपर के सरकारी अधिकारियों से लेकर महकमों के निचले कर्मचारियों तक को ये आदेश था कि कोई नकारात्मक चीज बाहर नहीं आनी चाहिए। हर तरफ सकारात्मक ही सकारात्मक दिखना चाहिए। कहीं कोई चीज अगर बड़ा मुद्दा बनती थी जिससे सरकार की छवि बिगड़ने की आशंका हो तो उसे ठीक करने का यहां एक नायाब रास्ता निकाल लिया गया था। उस समस्या के निदान के लिए उस क्षेत्र से जुड़ा कोई बड़ा इवेंट कर दिया जाता था। नतीजतन उसके शोर में सब कुछ दब जाता था। समस्याओं को हल करने का ये अद्भुत तरीका था। जिसमें समस्याएं तो हल नहीं होती थीं लेकिन हल होने का शोर ज्यादा होता था। 

इसका एक नायाब उदाहरण स्कूलों में ड्रापआउट रेट के बढ़ने और गुणवत्ता में कमी का मुद्दा है। इसको हल करने के लिए सरकार ने पूरे सूबे में प्रवेशोत्सव और गुणोत्सव के नाम से कार्यक्रम शुरू कर दिया। इसके तहत हर साल चार साल की उम्र पूरी करने वाले बच्चों का स्कूलों के रजिस्टर में नाम दर्ज करा दिया जाता था। इस काम में ऊपर से लेकर नीचे तक की नौकरशाही को लगा दिया जाता था। जिसमें पुलिस महकमे के डीजीपी से लेकर स्थानीय पुलिसकर्मी और सचिव से लेकर स्थानीय क्लर्क तक शामिल होते थे। उसी तरह से गुणोत्सव में भी चंद प्रतिभाशाली बच्चों को पुरस्कार दिला कर गुणात्मकता को ठीक करने की खानापूर्ति कर ली जाती थी। लेकिन इन समस्याओं के पीछे जो असली वजहें थीं न तो उन पर गौर करने की जरूरत समझी गयी और न ही उन्हें दूर करने का कोई सचेतन प्रयास किया गया। समस्या जस की तस बनी रहती थी। मसलन इसी शिक्षा के मामले में प्रवेश के दूसरे दिन से 17 फीसदी बच्चे पढ़ने नहीं जाते थे। यह सरकार का ही आंकड़ा है। गुणवत्ता सुधारने के लिए जरूरी उपायों पर काम करने की जगह इवेंट आयोजन के जरिये उसकी कमी को पूरा करने का नायाब तरीका निकाला गया।

गुजरात को ब्रांड के तौर पर पेश करने की ख्वाहिश का ही नतीजा है कि हर नयी चीज को मोदी सबसे पहले पकड़ने की कोशिश करते थे। लेकिन इसका मकसद सुधार करने या फिर चीजों को दुरुस्त करने से ज्यादा अपने नाम को आगे करना रहता था। इस मामले में गुजरात प्रशासन में सुधार से जुड़ा एक उदाहरण बेहद सटीक है। यूपीए सरकार के दौर में डिजिटाइजेशन की योजना के तहत प्रशासन के ई गवर्नेंस का अभियान चलाया गया। इसके तहत अहमदाबाद कलेक्ट्रेट को मॉडल के तौर पर विकसित करने के लिए चिन्हित किया गया। इस कड़ी में एक साफ्टवेयर इंजीनियर ने प्रशासन को एक ऐसा साफ्टवेयर मुहैया कराया जिसमें कलेक्टर को विभिन्न खिड़कियों पर पेंडिंग कामों और उनकी प्रगति की अद्यतन जानकारी मिल सकती थी। और इसके जरिये प्रशासन के पूरे काम में पारदर्शिता भी आती। जो हर लिहाज से जनता के हित में था। इसको पहले बड़े स्तर पर प्रचारित और प्रसारित किया गया।

इसके जरिये प्रशासन और सरकार ने खूब सराहना बटोरी। स्थानीय प्रशासन ने इसके बल पर कई अवार्ड जीते। ये सब कुछ एक दौर में होने के बाद फिर पूरी योजना को डंप कर दिया गया। पूरी बेवसाइट पुराने ढर्रे पर चलने लगी। जो किसी काम की जगह मोदी के चेहरा दर्शन के लिए जानी जाती थी। दरअसल यहां मकसद प्रशासन के कामों में पारदर्शिता और चुस्ती लाना नहीं था बल्कि उसके जरिये अपनी छवि को चमकाना था। जिसके पूरा होने के बाद पूरी योजना को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया गया। जबकि आगे उसे अहमदाबाद के बाद दूसरे शहरों और जिलों के साथ ही अन्य सभी विभागों में लागू किया जाना चाहिए था। लेकिन उसकी न तो जरूरत समझी गयी और न ही उस दिशा में कोई प्रयास हुआ। ऐसा करने से सरकार और प्रशासन की कमियां बाहर आतीं और फिर एक नकारात्मक छवि बनने की आशंका थी ऐसे में उसे आगे बढ़ाने का मोदी और सरकार के लिए कोई मतलब ही नहीं था।






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