संवैधानिक संस्थाओं को ठेंगे पर रख रही है सरकार

गुजरात की जंग , , शनिवार , 11-11-2017


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जनचौक स्टाफ

संस्थाएं लोकतंत्र का हाथ-पैर, नांक और कान होती हैं। लोकतंत्र इन्हीं के सहारे चलता और काम करता है। ऐसे में अगर संस्थाओं को खत्म कर दिया जाए तो किसी लोकतंत्र के वजूद की कल्पना की जा सकती है? कोई भी लोकतंत्र अपनी संस्थाओं के साथ ही बढ़ता है जवान होता है और फिर परिपक्व होता है। ऐसे में किसी संस्था को उसकी भूमिका से बेदखल करने का मतलब लोकतंत्र को क्षति पहुंचाना है। और ऊपर से ये काम अगर निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए किया जाने लगे तो समझिए कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बज गयी है। योजना आयोग के बाद चुनाव आयोग के साथ सरकार के रवैये से ये खतरा बिल्कुल साफ-साफ दिखने लगा था। लेकिन शीर्ष संस्था संसद तक बात इतनी जल्दी पहुंच जाएगी इसका किसी को अनुमान नहीं था। बताया जा रहा है कि सारे नियमों और परंपराओं को तोड़कर सरकार शीतकालीन सत्र को आगे बढ़ा रही है। हर साल 15 नवंबर के आस-पास शुरू होने वाले इस सत्र को तकरीबन एक महीना टाला जा सकता है। इसके पीछे प्रमुख वजह गुजरात का चुनाव बताया जा रहा है। 

दरअसल सरकार को लग रहा है कि संसद के चलने से उसका कई तरीके से घाटा हो सकता है। मसलन बीजेपी ने अपनी बड़ी फोर्स गुजरात चुनावों के प्रचार में लगा दी है। इसमें तकरीबन 15 से 20 कैबिनेट मंत्री हैं जिन्हें अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का पूरा केंद्रीकरण गुजरात में है। सरकार से लेकर पार्टी द्वारा देश के किसी भी कोने में कोई भी काम अब गुजरात को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है। ऐसे में संसद चलने से प्रचार में लगी पूरी फोर्स को वहां से शिफ्ट करना पड़ जाएगा। जो उसकी चुनावी संभावनाओं के लिहाज से नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसके साथ ही माना जा रहा है कि जीएसटी से लेकर नोटबंदी और महंगाई से लेकर विदेश नीति समेत तमाम मोर्चों पर सरकार रक्षात्मक स्थिति में है। उसके पास किसी चीज का काई जवाब नहीं है। ऐसे में विपक्ष अगर उसे संसद के भीतर मुद्दा बनाता है तो उसका पूरा घाटा गुजरात को ही उठाना पड़ेगा। 

आमतौर पर संसद का शीतकालीन सत्र नवंबर के दूसरे हफ्ते में शुरू हो जाता है। दिवाली के बाद अक्सर सत्र की शुरुआत होती है। लेकिन इस बार दिवाली थोड़ी पहले पड़ गयी इसलिए नवंबर का दूसरा सप्ताह सत्र के लिहाज से बिल्कुल मुफीद माना जा रहा था। लिहाजा अगर अपने समय पर सत्र को शुरू होना होता तो अब तक राजनीतिक मामलों के कैबिनेट कमेटी की बैठक हो जानी चाहिए थी। जो अभी तक नहीं हुई। नियम के मुताबिक सत्र के शुरू होने के 15 दिन पहले उसकी घोषणा हो जानी चाहिए। जिससे अपने-अपने क्षेत्रों में गए सांसद सत्र के लिए समय से लौट सकें। पिछले साल सत्र 16 नवंबर को शुरू हो गया था। 

दरअसल जीएसटी और नोटबंदी दो ऐसे मुद्दे हैं जो सरकार के गले की फांस बन गए हैं। व्यापार के लिए जाने जाने वाले गुजरात के लोगों ने इन्हें अपने जीवन-मरण से जोड़ लिया है। और सरकार के पास इनका कोई जवाब देते नहीं सूझ रहा है। ऊपर से सोशल मीडिया के मोर्चे पर भी पार्टी मात खाती दिख रही है। न उसका बुलेट ट्रेन का मुद्दा काम कर रहा है। न ही मोदी का चेहरा। आलम ये है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष और कैबिनेट मंत्रियों को घर-घर प्रचार में उतरना पड़ रहा है। लिहाजा पार्टी अपनी हताशा भरी कोशिश के तहत चुनाव को सांप्रदायिक रंग देने में जुट गयी है। ‘राम’ बनाम ‘हज’ का मामला उसी कड़ी में लाया गया। साथ ही बीजेपी के स्थानीय नेता लोगों से कहने से नहीं चूक रहे हैं कि कांग्रेस के आने पर पुराना माफिया राज फिर से वापस आ जाएगा। लिहाजा समय के साथ इस लाइन पर प्रचार के और बढ़ने की आशंका है।

सत्र को लेकर सरकार के नये रुख ने कांग्रेस को बीजेपी पर हमले का नया मुद्दा और मौका मिल गया है। जिसमें उसने कहना शुरू कर दिया है कि पीएम मोदी संसद का सामना करने से डर रहे हैं और वो संसद छोड़कर भाग रहे हैं। इसके साथ ही उसने संसद के प्रति सरकार के इस रवैये को बेहद घातक और लोकतंत्र पर हमला करार दिया है। इस बीच एक और खबर आ रही है जिसमें जीडीपी की दूसरी तिमाही के नतीजे को भी सार्वजनिक करने पर सरकार ने रोक लगा दी है। 






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