बथानी टोला और लक्ष्मणपुर बाथे के बाद अब हैबसपुर नरसंहार के आरोपी भी बरी

इंसाफ की मांग , , शनिवार , 02-06-2018


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प्रदीप सिंह

पटना। बिहार के बहुचर्चित हैबसपुर नरसंहार कांड के सभी 28 आरोपियों को अदालत ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। 20 वर्ष से अधिक पुराने मामले के स्पीड ट्रायल में यह फैसला आया है। एससी/एसटी कोर्ट के विशेष न्यायाधीश मनोज कुमार सिंह की अदालत ने साक्ष्य के अभाव और संदेह का लाभ देते हुए नरसंहार के आरोपियों रामायण तिवारी, शिवानंद शर्मा, नवल सिंह, भूतल सरदार, गजेन्द्र सिंह उर्फ महेश्वरी समेत 28 आरोपियों को बरी कर दिया। 

पटना जिले के हैबसपुर गांव में दलितों के सामूहिक नरसंहार की यह न तो पहली घटना थी और न ही नरसंहार के दोषियों का अदालत से एक-एक करके बरी होने का मामला पहला है। नब्बे के दशक में बिहार में दलितों के नरसंहार की घटना आम हो गई थी। हैबसपुर नरसंहार उसमें से सिर्फ एक घटना है। 23 मार्च 1997 को पटना जिले के हैबसपुर गांव में 10 दलितों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हैबसपुर रनिया तालाब थाना क्षेत्र में आता है। इस घटना को अंजाम देने में रणवीर सेना की संलिप्तता रही। रणवीर सेना के तथाकथित सदस्यों ने जघन्यता की सारी हदें पार करते हुए गांव छोड़ने से पहले सूखे कुएं के घेरे पर खून से ‘‘रणवीर सेना’’ लिख दिया था   

दरअसल, हैबसपुर नरसंहार के पहले राघोपुर में ऊंची जाति के 6 लोगों की हत्या कर दी गई थी थी। माना जाता है कि इसी के प्रतिशोध में रणवीर सेना ने हैबसपुर की घटना को अंजाम दिया था। घटना में करीब मांझी, सुरेश मांझी, किशुन मांझी, भोपाली मांझी, शकुनी मांझी, राजकुमार मांझी समेत 10 दलितों की हत्या कर दी गई थी। 

दर्ज केस के अनुसार, लंगड़ और उसके समर्थक 23 मार्च, 1997 को होली के एक दिन पहले हथियारों से लैस होकर हैबसपुर मुसहरी पहुंचे। करीब 10 दलितों को घर से बुलाया गया। उन्हें कहा गया कि मसूर का खेत काटना है। सभी रात में उसके साथ खेत में चले गए। उसके बाद लंगड़ ने सभी को कतार में खड़ा कर गोली मार दी।  

पुलिस ने इस मामले में 36 लोगों पर चार्जशीट दायर की थी। 8 आरोपियों की ट्रायल के दौरान मौत हो गई। जबकि पुलिस ने इस कांड में 13 आरोपियों को फरार दिखाया था। इस घटना को अंजाम देने वाले मुख्य आरोपी लंगड़ और भोजपुरिया थे। घटना के लगभग दस साल बाद लंगड़ की भी हत्या हो गयी और भोजपुरिया फरार है। रणवीर सेना का कमांडर बनने और इलाके में वर्चस्व कायम करने के लिए काब निवासी लंगड़ ने इस नरसंहार को अंजाम दिया था।  

हैबसपुर नरसंहार में चार मृतकों मांझी, सुरेश मांझी, किशुन मांझी, राजकुमार मांझी की पत्नियां समेत कुल 18 गवाह थे। चार मृतकों की पत्नियों ने भी गवाही में इन आरोपितों की पहचान नहीं कर सकीं। अभियोजन पक्ष के गवाहों ने कहा कि लंगड़ सिंह और भोजपुरिया ने गोली मार कर दलितों का नरसंहार किया था। मृतकों की पत्नियों ने कहा था कि नरसंहार का जिम्मेदार लंगड़ ही था। उसी ने सभी की हत्या की थी। 

90 के दशक में हैबसपुर की तरह मध्य बिहार में नरसंहार की कई घटनाएं हुईं थीं। पटना जिला के अलावा मगध के जहानाबाद, अरवल, औरंगाबाद और शाहाबाद के भोजपुर में नरसंहारों का लंबा दौर चला था। इस दौरान बाथे, बथानी टोला, नाढ़ी, इकवारी, सेनारी, राघोपुर, रामपुर चैरम, मियांपुर जैसे कई कांड हुए थे। प्रतिबंधित नक्सली संगठन और रणवीर सेना के बीच खूनी संघर्ष में सैकड़ों लोगों की जानें गईं थीं। 

क्या बिहार सरकार फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देगी ?  

मुख्य आरोपी लंगड़ की हत्या हो गई। जिनको आरोपी बनाया गया, उन्हें कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। सवाल यह है कि इतना बड़ा नरसंहार लंगड़ ने अकेले नहीं किया होगा। उसके साथ और भी लोग होंगे। पुलिस ने जांच के दौरान उन लोगों को क्यों नहीं पकड़ा। क्यों नहीं आरोपी बनाया। क्यों नहीं चार्जशीट किया। दूसरा सवाल यह है कि क्या इस फैसले को सरकार उच्च अदालत में इसे चुनौती देगी और जिन लोगों ने भी नरसंहार किया, उसे सजा दिला पाएगी?

भाकपा-माले ने फैसले का किया प्रतिवाद 

भाकपा-माले ने फैसले का किया प्रतिवाद

एससी/एसटी कोर्ट द्वारा आरोपियों को बरी किए जाने पर भाकपा-माले ने पटना के कारगिल चौक पर प्रतिरोध मार्च निकाला। माले नेताओं ने कहा कि जिस प्रकार पहले के जनसंहारों में कोर्ट ने पर्याप्त साक्ष्य का अभाव बतलाकर रणवीर सेना के सरगनाओं को बरी किया था, हैबसपुर मामले में भी ठीक वही तर्क लाया गया है। जबकि कोबरा पोस्ट के स्टिंग में रणवीर सेना के सरगनाओं ने खुलेआम स्वीकार किया था कि उन्हें भाजपा नेताओं से राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता था, लेकिन उस भाजपा से नीतीश कुमार ने बेशर्मी के साथ गलबहिलयां कर रखी है। भाकपा-माले के कुमार परवेज कहते हैं-

‘‘हैबसपुर कांड में आया फैसला एक राजनीतिक फैसला है, जिसमें दलित-गरीबों की आवाज को दबाने का प्रयास किया गया है। एक तरफ हैबसपुर जनसंहार के आरोपी बरी हो रहे हैं, दूसरी तरफ राघोपुर दियारा में पुलिस-प्रशासन की उपस्थिति में दलितों पर बर्बर हमला किया जा रहा है। और दर्जनों दलित जनसंहार के आरोपी ब्रह्मेश्वर की मूर्ति अनावरण में भाजपा-जदयू के नेता शामिल हो रहे हैं। यह बेहद शर्मनाक है। इससे साफ जाहिर होता है कि भाजपा पूरे बिहार में सामंती-सांप्रदायिक ताकतों का वर्चस्व बनाने के लिए हर हथकंडे अपना रही है।’’ 

हैबसपुर के लोग हैं अवाक 

हैबसपुर नरसंहार कांड के 28 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिये जाने के बाद हैबसपुर मुसहरी के लोग अवाक हैं। फैसले आने के बाद भी पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें  कोर्ट से इंसाफ नहीं मिलेगा, तो भगवान के घर से इंसाफ जरूर मिलेगा। मृतक सबुनी मांझी की पत्नी रमुना कहती हैं कि कोर्ट में हम लोगों का पक्ष ठीक से नहीं रखा गया है। शुरू के दिनों में डर के मारे गांव छोड़ दिया था। हमारे पास खाने को पैसे नही हैं, तो कोर्ट कैसे जाऊं। हैबसपुर मुसहरी के दलित आज भी नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। नरसंहार में मारे गये पीड़ित परिवार को मिली मुआवजा राशि में 80 हजार पंजाब नेशनल बैंक में जमा है। बैंककर्मी पीड़ित परिवारों को सिर्फ हर महीने ब्याज निकालने देते हैं।   

बिहार में नरसंहार की लंबी फेहरिस्त  

90 के दशक में बिहार में नरसंहारों का दौर रहा, जिसमें 18 मार्च 1999 सेनारी नरसंहार हुआ था। इसमें 34 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया  था। वहीं गया जिले के बारा गांव में 12 फरवरी 1992 को अगड़ी जाति के 35 लोगों की गला रेत कर हत्या कर दी गयी थी। इसी दौर में लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार राज्य का सबसे बड़ा व नृशंस नरसंहार माना जाता है, जिसमें बच्चों व गर्भवती महिलाओं को भी निशाना बनाया गया था। 30 नवंबर व 1 दिसंबर 1997 की रात हुए इस नरसंहार में 58 लोगों की हत्या की गयी थी। नरसंहार की फेहरिस्त में 25 जनवरी 1999 की रात जहानाबाद जिले के शंकर बिघा गांव में 22 दलितों की हत्या कर दी गयी थी। वहीं 1996 में भोजपुर जिले के बथानी टोला में नरसंहार में 22 लोगों के हत्या कर दी गयी थी, जिसमें दलित, मुस्लिम व पिछड़ी जाति के लोग थे। 16 जून 2000 की रात औरंगाबाद जिला के मियांपुर का नरसंहार भी राज्य में काले अध्याय के रूप में जाना जाता है। इसमें 35 दलितों की हत्या कर दी गयी थी।

 

   

 








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