सेहत पर सरकारी जोर कम, शोर ज्यादा

एक नज़र इधर भी , , बुधवार , 06-02-2019


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चंद्रप्रकाश झा

एक पुरानी कहावत है, जान है तो जहान है। इसका सीधा अर्थ स्वास्थ्य की सर्वोपरिता से  है। यह सही नहीं कि सेहत के मामले में हिन्दुस्तानी लापरवाह हैं। वे स्वास्थ्य को लेकर आम तौर पर फिक्रमंद रहे हैं। सभी मानते हैं कि  सेहत सम्भालने की अत्यंत प्राचीन पद्धति, आयुर्वेद और योग भारत की ही देन है। भारत,  सेहत संभालने के लिए दुनिया भर की पद्धतियों, झाड़ -फूंक , जड़ी -बूटी, आसान कसरत , कठिन व्यायाम , यूनानी , होमियोपैथी ,  चीनी एक्यूपन्क्चर - एक्यूप्रेसर से लेकर आधुनिक एलोपैथी, नेचुरोपैथी और उत्तर आधुनिक अलटरनेटिव मेडिसिन को भी अपनाने से नहीं हिचका है।

भारत में श्रुति परम्परा से  कायम एक पुराना किस्सा है। इसका लब्बो-लुआब यह है कि कभी किसी जमाने में चीन के एक राजकीय वैद्य ने भारत के अधिकतम ख्याति के वैद्यराज की योग्यता को जांचने-परखने उनके पास एक ऐसे चीनी व्यक्ति को भेजने की व्यवस्था कर दी जो मरणासन्न था। भारतीय वैद्यराज उसे देखते ही सब ताड़ गए। यह भी समझ गए कि चीनी वैद्य ने उस व्यक्ति का उपचार स्वयं करने में असफल रहने के बाद ही उसे कुछेक अन्य चीनियों की टोली संग भारत भिजवाया है। भारतीय वैद्यराज ने चीनियों की टोली से कहा कि वे उस मरणासन्न व्यक्ति को वापस ले जाएं। चीनी टोली ने सहम कर कहा कि उस व्यक्ति का उपचार तो भारत लाने से भी नहीं हो सका और अब वह व्यक्ति वापसी के लम्बे रास्ते में ही परलोक सिधार जाएगा।

ऐसे में वे चीनी वैद्य को क्या जवाब देंगे। भारतीय वैद्यराज ने किंचित मुस्कान के साथ कहा कि उस मरणासन्न व्यक्ति का और कहीं नहीं भारत में ही उपचार संभव है और वह हो जाएगा। बस इतना ध्यान रखना कि यह व्यक्ति चीनी वैद्य के पास वापस पहुंचने के पहले लम्बी यात्रा के भारतीय मार्ग में नीम वृक्ष तले ही सोए, नीम का दातुन कर, सिर्फ नीम के ही पत्ते, फल -फूल खाए , नीम का ही रस पीए। हाँ, यह सुनिश्चित करना कि वह चीन पहुंचने से पहले और कुछ भी नहीं खाए-पीए। नीम भारत में ही मिलेगा, भारत के बाहर शायद ही कहीं। चीन में तो नीम बिल्कुल नहीं मिलेगा, मिलता होता तो तुम्हारे वैद्य को इसे भारत में मेरे अथवा किसी भी वैद्य के पास भेजने की जरुरत नहीं पड़ती।  

वह मरणासन्न व्यक्ति , भारतीय मार्ग में ही पूर्णतया स्वस्थ होकर चीनी वैद्य तक पहुंच गया। चीनियों ने भारतीय वैद्यराज का लोहा मान लिया और उन्हें भारत की अपेक्षाकृत बेहतर सेहत का कुछ राज भी समझ में आ गया।  लेकिन यह किस्सा सैंकड़ों बरस पहले का है। अब भारत में भी सभी जगह नीम के वृक्ष आसानी से देखने को भी नहीं मिलते। भारतीय जड़ी -बूटी के भी भविष्य में  सहज उपलब्धता की संभावना खतरे में पड़ती नजर आती है। भारतीयों का रहन -सहन, पहनावा ही नहीं खान -पान बहुत बदल गया है। मसालों के लिए औपनिवेशिक साम्राज्यों का निशाना बने भारत में मसाला पीसने के लिए सिलबट्टा नगरों में तो नहीं ही दिखता। मसाला पीसने , ग्राइन्डर के इस्तेमाल पर जोर है। गांव -देहात में भी हल्दी,  जीरा,  धनिया और कश्मीरी से लेकर गोल , काली , लाल मिर्च सभी मसालों के पाउडर का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। प्रेशर कूकर के आविष्कार के बाद से लगभग हर रसोई दाल से लेकर भात पकाने  में उसी का इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारे सेहत की " सीटी " बज गई है।

अंग्रेजी में कहावत है ' प्रिवेन्शन इज बेटर दैन रेमेडी " , मतलब व्याधियों के  उपचार से उनके निरोधक उपाय बेहतर है। निरोधक उपायों की कमी की चर्चा संक्षेप में उपरोक्त सन्दर्भों में की जा चुकी है। अब बारी उपचार के उपायों की चर्चा की है। लेकिन मौजूदा हालात क्या हैं ? आम हिन्दुस्तानियों की औसत सेहत कैसी है ? आने वाले कल को क्या होने वाला है ? उपचार की व्यवस्था में अगर किसी गड़बड़ी का अंदेशा है तो उससे बचने के क्या उपाय किए जा सकते हैं। इन उपायों पर कितना खर्च आएगा। इनमें से कितने उपाय लोककल्याणकारी राजकाज की संविधान -सम्मत नीति के तहत सरकार करेगी , कौन - कौन उपाय का ठेका निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य सुविधा और बीमा कम्पनियों के हवाले किये जाएंगे और जन्म से लेकर मृत्यु तक किसी की भी सेहत की कितनी जिम्मेवारी खुद उसके और उसके परिजनों पर होगी ? सवाल बहुत हैं और जवाब बहुत कम। 

सेहत के मुद्दे के समाधान के शॉर्टकट रास्ते नहीं हैं। लेकिन भारत में 1990 के दशक में तथाकथित आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण को प्रोत्साहित करने की  नीति लागू होने के बाद के नतीजों की बानगी इस तथ्य से मिल सकती है कि देश की वाणिज्यिक राजधानी , मुम्बई में इन वर्षों में राजकीय अस्पतालों में इक्का -दुक्का बिस्तर का ही इजाफा हुआ है। बिहार के सहरसा जिले के  बसनही गाँव में भारत की आजादी बाद के शुरुआती दशक में ही खोले गए उस प्राथमिक चिकित्सा केंद्र पर बरसों से कोई डॉक्टर, कम्पाउण्डर, नर्स क्या, किसी मरीज की भी आवाजाही बंद हो गई जहां शिशु जन्म के लिए सीजेरियन ऑपरेशन तक की कामचलाऊ व्यवस्था थी। उस केंद्र के संचालन के लिए सरकार का खर्च अभी भी होता है , लेकिन सिर्फ कागज़ पर। अस्पताल की दीवार पर लिखी सूचना में उसके सम्बद्ध डॉक्टर का मोबाईल नम्बर भी अंकित है।  लेकिन उस केंद्र के इर्द -गिर्द बकरियां चरती हैं। उसके कई मील के दायरे में सूई लगाने तक की कोई सरकारी सुविधा उपलब्ध नहीं है।

मोदी सरकार के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही । सरकारी आंकड़ों के ही मुताबिक़ देश के सकल घरेलू उत्पाद का बामुश्किल 4 प्रतिशत ही इस मद में खर्च होता है जबकि चीन में 8.3 प्रतिशत, रूस  में 7.5 प्रतिशत और अमेरिका में 17.5 प्रतिशत खर्च होता है। चीन की 1.41 अरब आबादी के 97 प्रतिशत को "पब्लिक हेल्थ केयर सिस्टम" की सुविधा प्राप्त है। वर्ष 2019 -20 का पूर्ण बजट आम चुनाव के बाद ही पेश होगा। पिछले वित्त वर्ष 2018 -19 के  बजट की बात करें तो उसमें  मोदी सरकार ने " दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना " शुरू करने की घोषणा की थी।

उक्त योजना को ‘ मोदी केयर ’ के नाम से विभूषित कर दिया गया। इसकी कलई खुलने में देर नहीं लगी।  सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ट्वीट किया -  ‘ मोदी केयर’ का मतलब एक व्यक्ति पर केवल 40 रुपये का सरकारी खर्च। दावा किया गया कि इस योजना से लगभग 50 करोड़ लोगों को लाभ होगा, हर साल प्रत्येक परिवार को 5 लाख रुपये का मेडिकल खर्च दिया जाएगा। पर नए बजट में स्वास्थ्य - परिवार कल्याण  मद में 52 हज़ार 800 करोड़ रुपये का जो प्रावधान किया गया वह पिछ्ले बजट की तुलना में  2.5 प्रतिशत ही अधिक था। केंद्र सरकार की नई स्वास्थ्य नीति में स्वास्थ्य बीमा के लिये 2000 करोड़ रूपये का जो प्रावधान किया गया वह केरल राज्य के बजट में स्वास्थ्य मद में प्रावधानित रकम से भी ज्यादा नहीं है। भारत की सेहत वाकई में खराब -सी लगती है।

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पतत्रकार हैं और प्रतिष्ठित न्यूज़ एजेंसी यूएनआई में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं।)








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