रोहतक: हुड्डा केंद्रित चुनाव में माकपा की दावेदारी

मुद्दा , , सोमवार , 03-12-2018


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धीरेश सैनी

हरियाणा के नगर निगम चुनाव में अपनी दिलचस्पी रोहतक नगर निगम में है। भाजपा के लिए रोहतक का मतलब है, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा (औऱ उनके सांसद बेटे दीपेंद्र) की घेराबंदी। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की दुर्गति के बावजूद पुराने रोहतक जिले (रोहतक, सोनीपत, झज्जर) में भूपेंद्र सिंह हुड्डा कोटे के केंडिडेट जीतकर आए थे। लेकिन रोहतक शहरी सीट की हार ने हुड्डा के इस संतोष में भी तीखी चुभन छोड़ दी थी। रोहतक से भाजपा के विधायक मनीष ग्रोवर प्रदेश मंत्रिमंडल में शामिल हैं। दो जाट मंत्री कैप्टन अभिमन्यु और ओमप्रकाश धनखड़ लगातार रोहतक में हुड्डा ऑपरेशन में सक्रिय रहते ही हैं। हुड्डा के सिर पर सरकार ने गिरफ्तारी की तलवार भी लटका रखी है।

भाजपा के मनमोहन गोयल

भारतीय जनता पार्टी ने मनमोहन गोयल को रोहतक नगर निगम का उम्मीदवार घोषित किया है। फिलहाल यहां प्रभावी किसी बड़ी पार्टी से वही अकेले उम्मीदवार हैं तो अभी वही मजबूत नज़र आ रहे हैं। लालाजी ने विधानसभा चुनाव के दौरान ऐन वक़्त पर कांग्रेस से भाजपा में एंट्री मारी थी। वे प्रदेश के पूर्व मंत्री सेठ श्रीकिशन दास के बेटे हैं जिन्हें पद्मश्री से भी नवाजा गया था। कहा जाता है कि मनमोहन गोयल के पिता की प्रतिमा की स्थापना में हुड्डा ने (मुख्यमंत्री रहते) रोड़ा अटकाया था, जिस वजह से वे भाजपा में शामिल हुए। लेकिन, बात इतनी नहीं थी। रोहतक में हुड्डा खेमे से बीबी बत्रा (पूर्व विधायक) की उम्मीदवारी के चलते गोयल के लिए कोई स्कोप नहीं था तो व्यापारी बुद्धि के लिए भाजपा से बेहतर क्या जगह हो सकती थी?

उन्होंने विधानसभा टिकट के लिए दावेदारी जताई थी पर बार-बार हार का सामना करते हुए भी रोहतक में अपने समर्थकों में लोकप्रिय हो चुके आरएसएस के स्वयंसेवक मनीष ग्रोवर के मुकाबले उन्हें तरजीह मिलनी ही नहीं थी। गोयल को नवीन जिंदल परिवार में अपनी नजदीकी रिश्तेदारी की वजह से भी भाजपा में ऊपर तक पहुंच वाला माना जाता है। आप मुस्करा सकते हैं कि कांग्रेस नेता नवीन जिंदल परिवार में रिश्तेदारी से भाजपा में ऊपर पहुंच का क्या मतलब। असल में नवीन जिंदल कांग्रेस में हैं पर इस परिवार के वरिष्ठ सदस्य सज्जन जिंदल की केंद्र सरकार के शीर्ष से नजदीकी मानी जाती है। 

मनमोहन गोयल के पक्ष में तर्क है कि उनका अपने पिता की तरह वैश्य समाज के अलावा सभी तबकों में प्रभाव है। भाजपा के टिकट की वजह से एक बड़ा वोट बैंक तो है ही। ये सब उनके पक्ष में असरदार बातें हैं। हालांकि ऐसी सब बातों को चुनाव की ठोस ज़मीन पर इम्तिहान देना पड़ा करता है। गोयल रोहतक की ताकतवर वैश्य संस्थाओं के प्रधान रहे हैं और वैश्य समाज के बीच यह उनके व्यक्तिगत प्रभाव की एक और वजह मानी जाती है। लेकिन वैश्य संस्थाओं की अंदरुनी राजनीति और बतौर प्रधान कामकाज के तौर-तरीकों को लेकर नाराजगी भी कम नहीं हैं। गोयल के लिए पहली चुनौती अपने आधार कास्ट वोटर्स के बीच इस विरोध को दूर करना ही रहेगी। उनकी अगली चुनौतियां हुड्डा कैम्प से उम्मीदवार घोषित होने के बाद शुरू होंगी। मसलन, हुड्डा कैम्प से पंजाबी केंडिडेट आता है तो मंत्री मनीष ग्रोवर और खुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पंजाबी वोटों को किस हद तक गोयल के पक्ष में ला सकते हैं।

हुड्डा कैम्प के केंडिडेट की इंतजार

नगर निगम में कांग्रेस भले ही सिंबल पर चुनाव न लड़ाए पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा रोहतक के इस चुनाव में भाजपा के लिए रास्ता खुला छोड़ना अफोर्ड नहीं कर सकते हैं। उम्मीद है कि उनके कैम्प से आजकल में कोई पंजाबी नाम घोषित कर दिया जाएगा। मोटे तौर पर सीताराम सचदेवा, राजीव गुगनानी, गुलशन ईश पुनियानी आदि नाम चर्चा में बताए जाते हैं। भाजपा के लगभग एकतरफा उभार से पहले रोहतक के पंजाबी समुदाय में हुड्डा लोकप्रिय रहे हैं। उनकी पत्नी आशा हुड्डा पंजाबी में धाराप्रवाह बोलकर ही पंजाबी इलाकों में कैम्पेन चलाती रही हैं और चौटाला रेजीम के कथित भय के माहौल में कैम्प के लोगों के साथ खड़े होने की भावुक यादें भी दिलाती रही हैं।

रोहतक से कांग्रेस के एक बड़े पंजाबी नेता पूर्व सांसद शादीलाल बत्रा को हुड्डा का ही नजदीकी गिना जाता था। हालांकि, पूर्व विधायक बीबी बत्रा को लेकर हुड्डा के मोह की वजह से शादीलाल बत्रा अंदरुनी तौर पर नाराज भी कम नहीं रहे हैं। बीबी बत्रा रोहतक से हुड्डा के विश्वसनीय विधायक रह चुकने के बावजूद ड्रांइगरूम से बाहर निकलकर लोकप्रिय पंजाबी नेता की छवि नहीं बना सके हैं। जाहिर है कि पंजाबी वोटों की जिम्मेदारी भी अपने केंडिडेट से ज्यादा हुड्डा परिवार को ही अपने कंधों पर उठानी होगी।

रोहतक नगर निगम में रोहतक से लगे गांवों और रोहतक में आकर बसे ग्रामीणों की वजह से जाट मतदाताओं की बड़ी संख्या है। जेल की चौखट पर बैठे हुड्डा के लिए उनके गृह नगर के जाट मतदाताओं का रुझान क्या रहेगा, यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा। किसी पंजाबी केंडिडेट को खड़ा कर उसके पक्ष में जाटों का लगभग एकमुश्त मतदान कराने में हुड्डा सफल हो जाते हैं तो भाजपा के मंसूबे धरे रह सकते हैं।

लेकिन, सवाल यही है कि हुड्डा पंजाबी मतों को किस हद तक लुभा सकते हैं या भाजपा के पंजाबी सीएम और मंत्री पंजाबी मतों को बंटने से किस हद तक रोक सकते हैं। या फिर यह कि भाजपा केंद्रीय मंत्रियों वीरेंद्र सिंह व प्रदेश सरकार के मंत्रियों कैप्टन अभिमन्यु, ओमप्रकाश धनखड़ और स्थानीय जाट नेताओं के जरिये जाट मतदाताओं को हुड्डा से कितना छिटका सकते हैं। हुड्डा के लिए असल चुनौती आरएसएस-भाजपा के पैंतरों से निपटना होगी। मसलन, दंगे याद दिलाकर हुड्डा के पक्ष में जाट एकजुटता का भय प्रचारित कर गैर जाट वोटों को बटोर लेने की रणनीति की काट क्या होगी, यह भी हुड्डा की एक कठिन परीक्षा होगी।

माकपा की जगमती सांगवान

फिलहाल जाट तबके से जुड़े प्रत्याशी की बात की जाए तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) माकपा की जगमती सांगवान चर्चित शख्सियत हैं। जगमती ने पितृसत्ता और खाप-पंचायतों से जकड़े समाज में जेनुइन प्रतिरोध की राजनाति की है। उन्होंने भारी खतरे उठाए और पीड़ितों के पक्ष में फील्ड में पहुंचने से लेकर सेमिनारों व मीडिया तक पक्ष तैयार करने में अहम भूमिका अदा की। एक जमाने की वॉलीबॉल की इस नामी खिलाड़ी की एक्टिविस्ट की इस भूमिका को माकपा ने पहचाना भी। हिंदी पट्टी की अनेकों शख्सियतों को गुमनामी में छोड़ देने की माकपा की पुरानी रवायत के विपरीत जगमती अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) की जनरल सेक्रेट्री चुनी गईं और उन्हें माकपा की सेंट्रल कमेटी में भी जगह मिली।

अफसोस यह कि वे माकपा के ओछे विवाद (`करात बनाम येचुरी`) में एक मोहरे की तरह चीखती-चिल्लाती हुई इस्तीफे के रास्ते झटके से शिखर से कूदकर पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासन के गर्त तक भी जा पहुंची थीं। 20 जून 2016 को पार्टी की सेंट्रल कमेटी की मीटिंग के दौरान त्रिपुरा के तत्कालीन मुख्यमंत्री माणिक सरकार की अध्यक्षता में चल रहे सत्र के बीच में जगमती सांगवान बंगाल चुनाव में अपनाई गई रणनीति (कांग्रेस के साथ गठजोड़) को लेकर चर्चा के लिए खड़ी हो गई थीं। माणिक सरकार ने उस सत्र के समापन का इंतजार करने की बात कही थी तो वे इस्तीफे की बात कहते हुए मीटिंग से बाहर निकल गई थीं। कम्युनिस्टों की पॉजिटिव खबरों को लेकर उदासीन रहने वाले मीडिया ने उन्हें तुरंत हाथों-हाथ लिया था और उन्होंने भी कैमरों के सामने गुस्सा जाहिर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। तब पार्टी में उनकी `गॉडफादर` मानी जाने वाली करात दंपति के पास भी उनके निष्कासन की सर्वसम्मति में अपनी सम्मति शामिल करने के अलावा कोई चारा नहीं था।

बहरहाल, उनकी माकपा में वापसी हो चुकी है लेकिन उन्हें उनके कद और उनकी क्षमताओं के मुताबिक जिम्मेदारी देने के बजाय पार्टी ने उन्हें रोहतक के नगर निगम चुनाव में उतार दिया है। माकपा का यह काफी हैरान करने वाला फैसला है। पार्टी प्रदेश के किसी भी निगम का चुनाव नहीं लड़ रही है लेकिन रोहतक में जगमती सांगवान की इमेज के इर्द-गिर्द चुनाव लड़ा जा रहा है।

एक सवाल यह है कि क्या इस उम्मीदवारी के पीछे उनकी अपनी इच्छा रही है? या हरियाणा की माकपा पर प्रभावी उनका परिवार या उनके पति माकपा के वरिष्ठ नेता इंद्रजीत की रणनीति के तहत उनकी उम्मीदवारी घोषित की गई? पूर्व में पैदा हुई अवांछित स्थिति से हुए इमेज के घाटे की सम्मानजनक वोटों के जरिए भरपाई करने की रणनीति? जो भी हो यह सवाल माकपा जैसी प्रतिबद्ध कही जाने वाली पार्टी के सामने रहेगा ही कि पूरे प्रदेश में केवल एक सीट पर एक इमेज को केंद्रित चुनाव में काडर की ताकत झोकने से पार्टी का कुल नफा-नुकसान क्या है। योग्यता के ईमानदार पैमानों पर जगमती सर्वश्रेष्ठ प्रत्याशी हैं।

शहर के स्वतंत्र बुद्धिजीवियों ने उनके चुनाव को लेकर उत्साह भी दिखाया है। कांग्रेस के एक बुद्धिजीवी नेता ने फेसबुक पर यह उम्मीद भी जताई है कि चुनाव में एक पक्ष दक्षिणपंथी भाजपा के मनमोहन गोयल हों तो दूसरा माकपा की प्रगतिशील जगमती सांगवान। उन्होंने संकेतों में यह भी उम्मीद जताई कि सिंबल पर चुनाव न लड़ रही कांग्रेस का समर्थन भी जगमती सांगवान को मिले। आशा की इस अति को खारिज न करें तो यह सवाल पैदा होता है कि कांग्रेस से गठजोड़ के विरोध में इस्तीफा देकर निकल चुकीं जगमती की आत्मा क्या ऐसे `अनैतिक` प्रस्ताव को स्वीकार कर सकेगी। फिलहाल सबसे तेज व प्रभावी चुनाव अभियान जगमती सांगवान का ही चल रहा है और शुरुआत में उनका ज्यादा जोर रोहतक के ग्रामीण टच वाले आउटर इलाके ही हैं। यही वे इलाके हैं जहां से हुड्डा को भी सबसे ज्यादा दरकार है। हुड्डा कैम्प से मजबूत प्रत्याशी आता है तो भाजपा विरोधी स्वतंत्र बुद्धिजीवियों के लिए भी यह निर्णय लेना कठिन होगा कि वे जगमती सांगवान के साथ जाएं या भाजपा को हराने की रणनीति के तहत हुड्डा कैम्प के कैंडिडेट को वोट दें।  

(धीरेश सैनी जनचौक के रोविंग एडिटर हैं।)         


         

 








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