सच के ज्यादा करीब होती हैं सेवानिवृत्त शख्सियतों की "उलटबासियां"

देश-दुनिया , , शुक्रवार , 15-06-2018


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दीपांकर शिवमूर्ति

जैसे कि राजनेताओं और नौकरशाहों को सेवानिवृत्ति के बाद ही इलहाम होता है!
रॉ और आईएसआई के पूर्व प्रमुखों एएस दौलत और असद दुर्रानी ने मिलकर अपने अनुभवों को ‘द स्पाई क्रानिकल्स’ में समेटा तो काफी हंगामा हुआ। भारत से भी ज्यादा पाकिस्तान में। दौलत साहब को तो कम बोलने वाले के तौर पर जाना जाता है, जबकि दुर्रानी साहब को थोड़ा मुंहफट माना जाता है।

पाकिस्तानी मीडिया में आम राय है कि जनरल दुर्रानी ने ऐसी बातें कहीं जिससे मुल्क मुश्किल में पड़ सकता है और दौलत साहब ऐसे किसी विवादित बयान से बचे रहे। अब तो जनरल दुर्रानी के कोर्ट मार्शल की भी तैयारियां चल रहीं हैं।
पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि दोनों पूर्व प्रमुखों ने मजबूती से हिंदुस्तान और पाकिस्तान के दरम्यान बातचीत से मसाइल को हल करने और दोस्ताना ताल्लुक पर ज़ोर दिया। जबकि चीफ़ के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान दोनों को ही हार्डलाइनर्स के तौर पर जाना जाता था।

ताजा मामला पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय में दिये गए भाषण का है। आडवाणी ने इसे इतिहास की महत्वपूर्ण घटना बताते हुए कहा कि प्रणब मुखर्जी और मोहन भागवत ने विचारधाराओं एवं मतभेदों से परे संवाद का सही अर्थों में सराहनीय उदाहरण पेश किया है। आडवाणी ने आगे कहा कि मुखर्जी और भागवत ने भारत में एकता के महत्व को रेखांकित किया जो बहुलतावाद समेत सभी तरह की विविधता को स्वीकार व सम्मान करती है। उन्होंने भागवत की ओर से वार्ता के माध्यम से देश के विभिन्न वर्गों तक पहुँच बनाने के प्रयासों की तारीफ की।
यही तो हैं प्रणब दा। अगर अरुण जेटली उनको अपना पसंदीदा राजनेता बताते हैं या फिर राष्ट्रपति पद पर उनका कार्यकाल खत्म होने पर मोदी उनको भावुक खत लिखते हैं तो इसमे कुछ भी असामान्य नहीं।

ज़िंदगी भर खांटी कांग्रेसी रहे प्रणब दा के संघ मुख्यालय में दिये गए भाषण की प्रतिक्रियाएं देखिए। कांग्रेस जो उन्हे नागपुर न जाने के लिए मना रही थी, प्रेस कान्फ्रेंस कर कहती है कि दादा ने तो सारी लाइनें कांग्रेस की ही बोली हैं और संघ व सरकार को आईना ही दिखाया है। वहीं दूसरी तरफ संघ और बीजेपी कह रहे हैं कि प्रणब दा और भागवत का भाषण एक दूसरे के पूरक हैं।
तो सार यह है कि कांग्रेस खुश और बीजेपी और संघ भी ख़ुश! लेफ्ट लिबरल्स भी इसे लोकतान्त्रिक संवाद और विचारधारा से आगे सहिष्णुता और सौहार्द्र की अजीम मिसाल घोषित कर रहे हैं।
हालांकि यह ‘मुखर्जी-भागवत संवाद’ एकतरफा नहीं है, जैसा कि बहुत लोग समझ रहे हैं। इससे प्रणब दा का कद तो बढ़ता ही है, संघ को भी स्वीकार्यता बढ़ाने में मदद मिलेगी। एक स्वयंसेवक के प्रधानमंत्री और दुनिया का सबसे बड़ा ‘सांस्कृतिक’(?) संगठन होने के बावजूद संघ में एक तरह का ‘बौद्धिकता का टोटा’ (intellectual deficit) है। इस संवाद से संघ को यह खाली जगह भरने में मदद मिलेगी।

यह मुलाक़ात अमित शाह और बीजेपी द्वारा चलाये जा रहे ‘संपर्क फार समर्थन’ सरीखा ही है, जिसमें वो समाज में अपने उत्कृष्ट कार्य के लिए जाने वाले प्रसिद्ध हस्तियों से मिल रहे हैं। पब्लिक रिलेशन में चतुर सुजान शाह जानते हैं कि मत और समर्थन न भी मिले, तब भी उनके और बीजेपी पदाधिकारियों के साथ सेलिब्रिटीज की तस्वीरें तो वायरल होंगी ही!
दूसरी उम्मीद भी की जा सकती है कि संवाद के बाद संघ भी अल्पसंख्यकों को लेकर अधिक सहिष्णु और उदार होगा। संघ प्रमुख ने अपने भाषण में कहा कि भारत-भूमि पर पैदा हर पुत्र भारतीय है। और यह पहली बार हो रहा है कि आरएसएस मुख्यालय में ईद मनाई जाएगी। हालांकि यह दीगर होगा कि बातों से ज्यादा इसका धरातल पर कितना अनुसरण होता है।
वहीं चुनाव आसन्न पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट से हटाये गए और चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य ठहराए गए पूर्व प्रधानमंत्री के बयान से कहर बरपा है। उन्होंने कहा कि मुझे बताइये, क्या हमें मुंबई में 150 लोगों के कत्ल की इजाजत देनी चाहिए? उनके इस बयान के बाद कजा की आमद लाज़िम था। क्योंकि यह किसी पूर्व राष्ट्राध्यक्ष द्वारा मुंबई हमलों में पाकिस्तानियों के हाथ होने का स्पष्ट कबूलनामा था।

पाकिस्तानी मीडिया में इस बात पर मंथन चल रहा है कि इस चुनावी मौसम में एक मंझे हुए सियासतदान ने ऐसा बयान देने की जहमत क्यों उठाई? ऐसा इसलिए कि इस बयान से चुनावों में उनकी पार्टी पीएमएल(एन) को नुकसान उठाने के ज्यादा अंदेशे हैं।
इतना ही नहीं जब उनके भाई शाहबाज़ शरीफ और पार्टी के प्रवक्ता लीपापोती में लगे थे कि मियां साहब के बयान का गलत मतलब निकाला गया तो उन्होने मजबूती से दोहराया कि वे अपने बयान पर कायम हैं। इससे पहले भी उन्होंने चेतावनी दी थी कि उनके दिल में कई राज़ दफ्न हैं जिनका वो कभी भी फ़ाश कर सकते हैं।

सियासतदानों और नौकरशाहों के पदमुक्त हो जाने के बाद के बयानों और क्रियाकलापों को देखना हमेशा बहुत दिलचस्प होता है। क्योंकि तब वो ज्यादा साफ़गोई और मुखरता से बोलते हैं जिससे प्रतिष्ठानों में पर्दे के पीछे होने वाले क्रियाकलापों की दुर्लभ झलकियां मिलती हैं।
(दीपांकर यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र हैं।)








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