इंडिया टुडे: एंकरों को नफरत फैलाने की छूट लेकिन सवाल उठाने वाली संपादक हुई बर्खास्त

मीडिया की आज़ादी , नई दिल्ली, मंगलवार , 13-02-2018


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जनचौक ब्यूरो

DailyO की पत्रकार अंगशुकांता चक्रवर्ती को उनके संस्थान ने नौकरी से बर्खास्त कर दिया है। अंगशुकांता DailyO में राजनीतिक एडिटर की पोस्ट पर थीं। ये पद उन्हें पिछले साल ही प्रोमोशन देकर दिया गया था। अंगशुकांता की पहचान बतौर कॉलमिस्ट एक ऐसे पत्रकार की थी, जो राजनीतिक घटनाओं पर तीखी नजर रखती हैं, उनके ज्यादातर कॉलम आज के 

राजनीतिक हालात पर सत्ता के सामने सत्ता की दीवार की तरह होते थे। उनके कॉलम्स असहज सरकार के लिए असहज सवाल लिए होते थे।

अब आपके मन में सवाल आएगा कि अंगशुकांता को आखिर कंपनी से क्यों निकाला गया? राजनीतिक मामलों पर अच्छी पकड़ और काव्यात्मक भाषा वाली अंगशुकांता को सिर्फ सोशल मीडिया पर अपने ट्वीट के लिए निकाला गया ।

दरअसल इस ट्वीट में अंगशुकांता के जनमानस के गुस्से के अलावा एक पत्रकार की चिंता भी जाहिर होती है। क्या ये बात ज्यादातर टीवी चैनल्स पर लागू नहीं होती है। क्या भड़कीले अंदाज़ में उन्मादी डिबेट ज्यादातर न्यूज़ चैनल्स का चरित्र नहीं बन गया है। बस इसी ट्वीट के बाद अंगशुकांता को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

 

जबकि ट्वीट में ना तो किसी कंपनी का, ना किसी शख्स का नाम लिखा गया है, सच तो ये है कि ये ट्वीट तकरीबन सभी चैनल्स पर लागू होता है। हैरानी की बात ये है कि सोशल मीडिया पर विचारों को लेकर की गई ये बर्खास्तगी इंडिया टुडे ग्रुप की ओर से की गई है,जिसकी सोशल मीडिया पॉलिसी के मुताबिक किसी भी कर्मचारी की ओर से सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए विचार उनके अपने निजी और व्यक्तिगत विचार हैं, जिनका कंपनी के साथ कोई लेना-देना नहीं है।

 

 

अंगशुकांता की बहन की फेसबुक पोस्ट।

तब सवाल ये है कि किसी के निजी विचार के आधार पर किसी की बर्खास्तगी कैसे की जा सकती है? सवाल ये भी है कि चैनल के ही एंकर रोहित सरदाना के सोशल मीडिया ट्वीट्स को लेकर कई विवाद रहे हैं, लेकिन चैनल ने उनके खिलाफ़ कभी कोई एक्शन नहीं लिया, ग्रुप के ही दूसरे कर्मचारी अभिजीत मजूमदार को लेकर भी ऐसे ही विवाद रहे हैं, लेकिन वो अभी भी चैनल में काम कर रहे हैं। 

अंगशुकांता मानवाधिकारों, अल्पसंख्यक समुदायों, महिलाओं, आदिवासियों पर मुखरता से लिखती रहीं हैं। मौजूदा सरकार को लेकर उनकी आलोचनात्मक नजर को सोशल मीडिया पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी की ओर से सराहना ही नहीं हजारों की संख्या में शेयर किया जाता रहा है। मेन स्ट्रीम मीडिया के शोरगुल और भक्तिकाल में वो एक मुखर आवाज़ हैं, लेकिन ये अफसोस है कि ऐसी आवाज़ों के लिए देश के बड़े न्यूज़रुम्स में जगह रोज कम हो रही है। अंगशुकांता के बाद अगला नंबर किसी का भी हो सकता है। इसलिए अभिव्यक्ति की आजादी और असहज करने वाले सवाल उठाने वालों के साथ आना बहुत जरूरी है।

 










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