इंदु मल्होत्रा के शपथ पर रोक की याचिका को चीफ जस्टिस ने किया खारिज,केंद्र के फैसले को बताया जायज

मुद्दा , नई दिल्ली, बृहस्पतिवार , 26-04-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर इंदु मल्होत्रा के शपथ पर रोक लगाने के लिए कोर्ट में 100 वकीलों द्वारा दायर याचिका को चीफ जस्टिस ने खारि कर दिया है। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह की अगुवाई में दायर की गयी इस याचिका की सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा कि इस तरह से सोचा भी नहीं जा सकता है। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार के जोसेफ के नाम को रोकने के फैसले को भी उचित ठहरा दिया। उनका कहना था कि ये उनके अधिकार क्षेत्र में आता है।

जोसेफ की फाइल रोके जाने के बाद चौतरफा ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या जस्टिस केएम जोसेफ से केंद्र सरकार उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन थोप दिए जाने के फैसले को खारिज कर दिए जाने की अदावत निभा रही है? वर्ना क्या वजह है कि सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा दिए गए दो नामों में से एक इंदु मल्होत्रा के सुप्रीम कोर्ट का जज बनने का रास्ता साफ हो गया है पर जोसेफ के नाम पर खामोशी छाई हुई है?

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की कोलेजियम ने 10 जनवरी को अपनी अंतिम बैठक में सुप्रीम कोर्ट में बतौर जज नियुक्ति के लिए दो नामों केएम जोसेफ और इंदु मल्होत्रा की संस्तुति की थी। इनमें से इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति का रास्ता साफ हो चुका है। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा ऐसी पहली महिला होंगी जो बार से सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज की कुर्सी पर पहुंच रही हैं। उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ग्रहण करने के लिए राष्ट्रपति का अनुज्ञा पत्र मिल चुका है। वे शुक्रवार को शपथ लेंगी। लेकिन, उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ के नाम पर केंद्र सरकार चुप्पी साधे हुए है। 

जोसेफ वही जज हैं जिन्होंने 2016 में भाजपा के नेतृत्व वाली इसी केंद्र सरकार के उत्तराखंड पर अवैध रूप से राष्ट्रपति शासन लगाकर राज करने के मंसूबे पर पानी फेर दिया था। यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या जस्टिस जोसेफ के उस फैसले को लेकर केंद्र सरकार उनसे अदावत रखती है। फिर भी जस्टिस जोसेफ के आंध्र प्रदेश तबादले औऱ उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में उनके प्रमोशन की कोलेजियम की सिफारिश को केंद्र सरकार ने रोक दिया है। सवाल यह है कि विधि मंत्रालय जोसेफ की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति की संस्तुति को कब तक दबाए रख सकती है। कोलेजियम उनके नाम को दोबारा भेजती है तो केंद्र सरकार पर उनकी नियुक्ति के लिए वॉरंट जारी करने की नैतिक बाध्यता बन जाएगी। इस मसले पर केंद्र सरकार और कोलेजियम के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। सूत्रों की मानें तो कोलेजियम इस बात पर अडिग है कि जोसेफ की नियुक्ति तक अन्य नामों की संस्तुति नहीं की जाएगी। केंद्र सरकार भी `वरिष्ठता` और `क्षेत्रीय विविधता` जैसे तर्कों की आड़ लेकर जोसेफ का नाम रोके रखने के लिए जिद पर अड़ी दिखाई दे रही है।

एनडीए सरकार बनने के कुछ हफ्तों बाद ही वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त करने की कोलेजियम की संस्तुति को रोक दिया गया था। सुब्रमण्यम 2002 के गुजरात दंगों के मामलों में काफी दिलचस्पी ले रहे थे और यूपीए नेतृत्व के निकट बताए जाते थे। फिलहाल, जस्टिस केएम जोसेफ का नाम रोक दिए जाने से चीफ जस्टिस दीपक मिश्र पर भी दबाव होगा। हाल में महाभियोग को लेकर अनचाही सुर्खियों में रहे चीफ जस्टिस पहले ही अपने वरिष्ठ सहयोगियों और कई पूर्ववर्तियों की तरफ से निरंतर सवालों के घेरे में हैं। सुप्रीम कोर्ट के भविष्य को लेकर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों पर सरकार की `तालेबंदी` को लेकर भी सीनियर जज लगातार चुनौती दे रहे हैं। अब दो नामों में से एक को चुन लेने और एक को ठंडे बस्ते में डालने की केंद्र की इस हठधर्मिता से भी चीफ जस्टिस पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।

जस्टिस जे चेलमेश्वर 21 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों को लिखकर आग्रह कर चुके हैं कि सभी जज सीजेआई से हाई कोर्ट्स में जजों की नियुक्तियों में सरकार की दखल के मसले पर चर्चा के लिए फुल कोर्ट बुलाएं। 

कोलेजियम के ही एक अन्य सदस्य जस्टिस कुरियन जोसेफ ने भी 9 अप्रैल को चीफ जस्टिस मिश्र समेत सभी जजों को कड़ा पत्र लिखा था और कोलेजियम की संस्तुतियों पर सरकार की चुप्पी के मसले पर सुनवाई के लिए सात वरिष्ठतम जजों की पीठ गठित करने की मांग की थी। उन्होंने इस बात पर रोष जाहिर किया था कि इंदु मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसेफ के नामों की संस्तुति किए तीन महीने बीत जाने के बावजूद सरकार इस बारे में निष्क्रिय बनी हुई है। जस्टिस कुरियन जोसेफ ने इसे सत्ता का दुरुपयोग और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को चुनौती करार दिया था। 

रविवार को कोलेजियम के दो अन्य सदस्य जस्टिस रंजन गोगोई औऱ मदन लोकुर भी चीफ जस्टिस को पत्र लिखकर न्यायपालिका के भविष्य और दूसरे संस्थागत मसलों पर चर्चा के लिए `फुल कोर्ट` बुलाने की मांग कर चुके हैं। चीफ जस्टिस मिश्र अक्तूबर में अवकाश ग्रहण करेंगे तो माना जाता है कि जस्टिस गोगोई उनकी जगह लेंगे।

इस मामले में एक और पक्ष सामने आ रहा है। जिसमें कहा जा रहा है कि इंदु मल्होत्रा को अकेले शपथ दिलाना पूरी तरह से अवैधानिक होगा। क्योंकि कोलेजियम ने दोंनों नामों को एक साथ भेजा है लिहाजा उन्हें सरकार अलग नहीं कर सकती है। पूरी सिफारिश को एक साथ खारिज करे या फिर उसे मंजूरी दे। सरकार मनमाने तरीके से पिक और चूज के हिसाब से नहीं काम कर सकती है। सरकार के इस रवैये से कई जजों की सीनियारिटी भी प्रभावित हो सकती है। जो साफ तरीके से न्यायपालिका की स्वतंत्रता में दखलंदाजी के बराबर है। इसके साथ ही कहा जा रहा है कि अगर इंदु मल्होत्रा शपथ भी ले लेती हैं तो वो अवैधानिक होगा। ऐसे में अगर कोलेजियम उन्हें अकेले शपथ दिलाना ही चाहती है तो उसे अलग से उनके नाम को सरकार के पास भेजना होगा।

गोपाल सुब्रमण्यम की नियुक्ति के दौरान भी तब के सीजेआई औऱ कोलेजियम ने यही कहा था कि कोलेजियम द्वारा तय किए गए नामों में सरकार पिक और चूज की नीति नहीं अपना सकती है।








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