इशरत समेत 4 लोगों के फर्जी एनकाउंटर का क्या है गोपीनाथ पिल्लई और मोदी से रिश्ता?

ज़रा सोचिए... , , शनिवार , 14-04-2018


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गिरीश मालवीय

कल छोटी सी खबर आयी कि 'इशरत जहां एनकाउंटर मामले के याचिकाकर्ताओं में से एक गोपीनाथ पिल्लई की शुक्रवार को सड़क हादसे में मौत हो गई'

खबर देख कर हैरानी हुई कि केरल के रहने वाले गोपीनाथ पिल्लई का इशरतजहां एनकाउन्टर से क्या संबंध हो सकता है कल फिर फुर्सत निकाल कर इस केस के बारे में जितनी जानकारी जुटा सकता था जुटाने की कोशिश की है।

कहानी की शुरुआत केरल से होती है एक सवर्ण हिन्दू परिवार के लड़के प्राणेश पिल्लई को पड़ोस में रहने वाली साजिदा से प्रेम हो जाता है घर वाले मानते नहीं हैं लेकिन प्राणेश साजिदा से शादी करने के लिए अपना धर्म तक बदल लेता है और इस्लाम कबूल कर लेता है। इस कड़ी में प्राणेश अपना नाम बदलकर जावेद शेख रख लेता है।

ओर केरल छोड़कर साजिदा के साथ निकाह कर मुंबई में रहने लगता है। दुबई भी आना जाना लगा रहता है साल 2003 तक इन दोनों के 3 बच्चे भी हो जाते हैं लेकिन इस बीच वह कुछ आपराधिक गतिविधियों में भी शामिल होता है। वह नकली नोटों की तस्करी के रैकेट में पकड़ा जाता है, यहीं इशरतजहां से उसकी पहली मुलाकात होती है इशरत कॉलेज में पढ़ती है वह इशरत को सेल्समैन कम सेकेट्री की जॉब देता है फीस चुकाने के लिये वह यह नौकरी कर लेती है।

इशरत कारोबारी दौरे पर जावेद के साथ पुणे और फिर लखनऊ तक जाती है वह अपनी मां को बताती है कि वह जावेद का काम छोड़ने वाली है क्योंकि कालेज खुल जाएंगे एक आखिरी ट्रिप पर वह पुणे जाती है।

अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के अधिकारी 15 जून, 2004 को अहमदाबाद शहर के बाहरी इलाके में महाराष्ट्र के मुम्ब्रा की इशरत जहां, जावेद शेख उर्फ प्राणेश, जीशान जौहर और अमजद राणा को कथित फर्जी मुठभेड़ में मार गिराते हैं।

पुलिस का दावा था कि ये सभी एक आतंकवादी संगठन से ताल्लुक रखते थे और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे।

गोपीनाथ पिल्लई पुलिस के इस दावे को मानने को तैयार नहीं होते कि प्राणेश उर्फ जावेद एक आतंकवादी था। वह इस झूठे एनकाउन्टर के खिलाफ याचिका दायर करते हैं।

2004 से 2009 तक इस मामले में कुछ भी नहीं होता है। 2009 में अहमदाबाद के मजिस्ट्रेट एसपी तमांग इस पूरी घटना की जांच करते हैं और इसे फर्ज़ी मुठभेड़ बताते हैं और इसमें 22 पुलिस अधिकारियों को दोषी पाया जाता है। वह अपनी रिपोर्ट में कहते हैं कि बंजारा की टीम ने इशरत जहां और उसके तीनों साथियों का कोल्ड ब्लडेड मर्डर किया है।

गुजरात हाईकोर्ट रातों-रात सुनवाई कर तमांग की रिपोर्ट पर स्टे लगाते हुए जांच के लिए एसआईटी का गठन कर देता है लेकिन सब उलझता जाता है।

दिसंबर 2011 को गुजरात हाईकोर्ट ने इशरत जहां एनकाउंटर केस की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप देता है।

2013 में सीबीआई आईपीएस अफसर जीएल सिंघल को गिरफ्तार करती है। पुलिस अफसर जेजी परमार और तरुण बारोट को भी गिरफ्तार किया जाता है। बताया जाता है कि एनकाउंटर में ये दोनों अफसर शामिल थे।

4 जून 2013 को सीबीआई ने इशरत जहां एनकाउंटर केस में आईपीएस डीजी वंजारा गिरफ्तार कर जेल भेज देती है वंजारा की अगुवाई में ही एनकाउंटर को अंजाम दिया गया था। सीबीआई जांच में यह साबित हुआ था कि यह एक फर्जी एनकाउंटर का मामला था और पुलिस का यह दावा कि उसने ‘आत्मरक्षा’ में गोली चलाई थी, झूठ है।

जुलाई 2013 में गुजरात के डीजीपी पीपी पांडे सहित गुजरात पुलिस के सात अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। फरवरी 2014 में एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट में 4 आईबी अधिकारियों का नाम भी शामिल किया जाता है।

जैसे ही मोदी सरकार सत्ता में आती है सीबीआई का केस कमजोर कर दिया जाता हैं, सभी आरोपियों को राहत दे दी जाती है।

कुछ दिन पहले ही 2004 में डीजीपी रहे पीपी पाण्डेय की डिस्चार्ज याचिका को सीबीआई की एक विशेष अदालत अनुमति दे देती है।

पीपी पाण्डेय पहले अधिकारी हैं जिन्हें बरी किया गया है उनकी रिहाई से अधिकारियों को दोषमुक्त सिद्ध किए जाने का सिलसिला शुरू हो सकता है।

गोपीनाथ पिल्लई यह कभी नहीं मान पाए कि उनका बेटा प्राणेश उर्फ जावेद शेख आतंकवादी था, इसलिए वह लगातार अदालतों में लड़ते रहे। पीपी पाण्डेय के बरी होने के खिलाफ भी वह याचिका लगाने वाले थे लेकिन इससे पहले उनकी सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है।

(गिरीश मालवीय सोशल मीडिया पर तमाम विषयों पर लिखते रहते हैं। आप आजकल इंदौर में रहते हैं।)








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