झारखंड में पत्थलगड़ी हंगामे के बीच गैंगरेप और देशद्रोह के मुकदमे का सच

ग्राउंड रिपोर्ट , , मंगलवार , 21-08-2018


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विशद कुमार

आदिवासी परंपरा का रूढ़ प्रथा पत्थलगड़ी को लेकर चर्चे में रहा झारखंड का खूंटी जिला 19 जून 2018 को उस वक्त पुन: सुर्खियों में आ गया जब जिले के कोचांग गांव के एक मिशनरी स्कूल से एक नाट्य टीम की लड़कियों को उठा लिया गया और पांच घंटे के बाद उन्हें वापस स्कूल पर छोड़ दिया गया। बाद में पता चला कि उनके साथ दुष्कर्म हुआ है।

घटना के दूसरे दिन पुलिस पीड़िताओं को नहीं खोज पाई, लेकिन 21 जून को पुलिस को सफलता मिली और पुलिस ने पीड़िताओं को पूछताछ के लिए अपने साथ ले गई। पुलिस पीड़िताओं से तीन हफ्ते तक पूछताछ करती रही। तीन दिनों तक चली यह पूछताछ इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली घटना मानी जा सकती है। चूंकि मामला सामूहिक बलात्कार से संबंधित था इसलिए पुलिस के इस गैरकानूनी कदम का किसी ने खुलकर विरोध नहीं किया, फिर भी कुछ लोगों ने जब पुलिस के इस गैरकानूनी कदम पर सवाल उठाए गए तो कहा गया कि पीड़िताओं की सुरक्षा के तहत उन्हें सुरक्षित जगह रखा गया है।

मजे की बात तो यह है कि पुलिस की सुरक्षा कवच इतना कठोर रहा कि पीड़िताओं को उनके परिवार वालों से भी मिलने की इजाजत नहीं थी जो पीड़िताओं के साथ हुए दुष्कर्म की घटना पर ही सवाल खड़ा करता है। इस सवाल का दूसरा पहलू यह रहा है कि जिस एनजीओ द्वारा पीड़िताओं को स्कूल पर नाटक मंचन के लिए लाया गया था, उस एनजीओ का नाम अभी तक पता नहीं चल पाया है और न ही उस एनजीओ के अगुआ संजय शर्मा का, जो उन लड़कियों को नाटक के लिए ले गया था।दूसरी तरफ इस घटना के बहाने पत्थलगड़ी समर्थकों को बड़ी आसानी से खामोश कर दिया गया है। जिसने थोड़ी सुगबुगाहट दिखाई उस पर फर्जी मुकदमे दायर करके उनकी भी नकेल कस दी गई। इसी कड़ी में फेसबुक पर पोस्ट करने को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता फादर स्टेन स्वामी सहित 20 लोगों पर देश द्रोह का मामला दर्ज कर लिया गया।

जांच टीम

खूंटी में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना, घाघरा और आस-पास के गांवों में प्रशासन के दमन, बेतला टाईगर रिर्जव में प्रशासन और सरकार द्वारा विस्थापन और 20 सामाजिक कार्यकताओं पर राजद्रोह के मुकदमे को लेकर 10 लोगों की एक टीम ने पिछले 17 अगस्त से लेकर 19 अगस्त तक क्षेत्र में जाकर गांवों वालों से मिलकर स्थिति का जायजा लिया।

डब्लूएसएस, सीडीआरओ और स्थानीय सामाजिक कार्यकताओं की 10 सदस्यीय टीम ने झारखण्ड में विभिन्न जगहों पर हो रहे मानवाधिकारों के हनन के मामले की जांच में पाए गए तथ्यः  

20 जून को पुलिस को सामूहिक बलात्कार की घटना की जानकारी मिली, लेकिन एफआइआर या मीडिया में चल रहे खबरों के मुताबिक यह स्पष्ट नहीं है कि, उन्हें घटना की जानकारी कहां से मिली। जांच टीम के पुलिस अधिकारी से पूछ-ताछ करने पर यह पता चला कि महिला थाना को घटना की जानकारी एस पी ऑफिस से मिली थी। एसपी से इसके बारे में पूछने पर उन्होंने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया। 20 जून की रात से ही पुलिस ने पीड़िताओं से संपर्क   साधने की कोशिश की। पर, वे 21 जून को पीड़िताओं तक पहुंच पाए।

सामूहिक बलात्कार से जूझ रही पांचों महिलाओं को उनकी रक्षा के नाम पर, गैर कानूनी रुप से पुलिस हिरासत में  तीन हफ्ते तक रखा गया।पुलिस की हिरासत में 3 हफ्ते तक उन्हें किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा था, केवल एनसीडब्लू की टीम उनसे मिल पाई। यहां तक की एक पीड़िता के परिजनों के अनुसार उनकों भी पीड़िता से घटना के दो-तीन दिन बाद केवल थाने में पुलिस वालों की मौजूदगी में पांच-दस मिनट के लिए मिलने दिया गया। प्रशासन की इस कार्यवाई को एसपी ने दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए सही बताया है। महिलाओं को मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की बात प्रशासन द्वारा की गई थी, परन्तु परिवार और एसपी से बात करने पर पता चला कि अभी तक केवल एक लाख रुपये दिए गए हैं।

फादर आलफान्स पर एफआईआर में षडयंत्र करना, जबदस्ती रोककर रखना और सामूहिक बलात्कार रेप के जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। फादर के बारे में एफआईआर में यह आरोप लगाया गया है कि, उन्होंने नन को रोक लिया जबकि बाकी लड़कियों को जानबूझ कर मोटर साइकिल पर सवार चार लोगों के साथ जंगल में जाने दिया। परन्तु जांच टीम को अन्य सूत्रों से यह पता चला है कि फादर खुद उस परिस्थिति में डरे हुए थे। मामले में बिना ठोस आधार के इतने गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।

इस मामले में संजय शर्मा का कोई पता नहीं चला है, कि वह कहां है। घटना के दिन महिलाओं के साथ गई दोनों सिस्टर का भी कोई पता नहीं है। वह भी काफी डरे हुए हैं और किसी से बात नहीं कर रहे। इसके अलावा, इस मामले में पत्थलगड़ी आंदोलन को भी गैर कानूनी दबाव बना करके दबाया जा रहा है।

26 जून को घाघरा में पुलिस के जवानों ने यह कहकर अंदर घुसने की कोशिश की कि वहां रेप के मामले के आरोपी पत्थलगड़ी में शामिल होने वाले हैं। जबकि घाघरा गांव में पत्थलगड़ी को लेकर ग्राम सभा हो रही थी जहां आस-पास के गांव के लोग आए थे। वहां पुलिस और गांव वालों के बीच झड़प हुई जिसके कारण एक व्यक्ति की मौत हो गई और कई घायल हैं, जबकि कई महिलाओं पर यौन हिंसा हुई है। घाघरा में भी पुलिस ने करीब दो हफ्तों तक कैम्प किया था और आज भी पुलिस की गश्त उस इलाके में होती रहती है। साथ ही, कोचांग में अर्धसैनिक बलों के पांच कैम्प लगाए गए थे जिसमें से तीन कैम्प अभी भी वहां है।

कोचांग में गैंग रेप की घटना के बाद, फिलहाल कैम्प कोचांग के स्कूल में लगा है जिसके कारण गांव के बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। कैम्प लगाने के लिए गांव के लोगों के ऊपर जमीन देने का दबाव बनाया जा रहा है, जबकि छोटा नागपुर टेनेन्सी एक्ट के अंर्तगत गैर आदिवासियों को जमीन नहीं दी जा सकती। ऐसा नहीं करने पर गांव वालों को धमकाया जा रहा है कि कैम्प के लिए जमीन नहीं देने पर उनपर मुकदमा कर दिया जाएगा। कोचांग और आस-पास के इलाकों में ग्राम प्रधान और गांव वालों पर राजद्रोह और अन्य धाराओं के अंर्तगत कई एफआईआर डाले गए हैं। परन्तु आज तक उनके खिलाफ वारंट नहीं निकला है।

इन सभी घटनाक्रमों के कारण पूरे इलाके में डर का माहौल है। पुलिस लोगों पर फर्जी मुकदमा करके उन्हें चुप्पी साधने पर मजबूर कर रही है।

पीड़ितों से बात करती जांच टीम की सदस्य

घाघरा में पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा दमन की जांच में पाए गए तथ्यः

घाघरा गांव में पत्थलगड़ी को लेकर ग्राम सभा हो रही थी जहां आस-पास के गांव के लोग आए थे। वहां पुलिस यह कहकर पहुंच गई कि कोचांग में पांच महिलाओं के साथ हुए गैंग रेप के मामले में शामिल अपराधी वहां आए हुए हैं, और गांव वालों पर लाठी चार्ज किया, आंसू गैस छोड़े गए और फायरिंग की गई। उस क्रम में एक व्यक्ति बिरसा मुंडा की मौत लाठी से मारे जाने के कारण हो गई जिसकी पुष्टी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में की गई है। इस मामले में बिरसा मुंडा के परिजनों को उनकी मौत के तीन दिन बाद थाने के दो-तीन चक्कर लगाने के बाद उनका शरीर परिजनों को सौंपा गया। इस मामले में पुलिस ने 302 के अंर्तगत मामला दर्ज कर दिया। इसके अलावा घाघरा के लोगों के उपर राजद्रोह के दो मुकदमें डाले गए हैं।

27 जून को सीआरपीएफ, रेफ, जेएएफ और होम गार्ड के जवान घाघरा और उससे सटे गांवों में घुस गए। घाघरा से सटे 8 गांव है जहां पुलिस गई थी, पर उनमें से केवल 3 से 4 गांवों में पत्थलगड़ी हुई थी। पुलिस जब उन गावों में घुसी जहां पत्थलगड़ी हुई थी, उनमें से दो गावों में लोगों को पीटा गया, और बाकी के लोग पुलिस के आने की सूचना पाकर अपने घरों को छोड़कर चले गए थे। इन गांवों में लोगों को मारा-पीटा गया, जिसमें कुछ लोगों को चोट पहुंची, एक बच्ची का हाथ भी टूट गया।

जबकि, बाकी गांवों में पुलिस ने लोगों के घर में घुसकर तलाशी ली। घाघरा में उस दौरान एक महिला के साथ रेप होने की पुष्टि की गई है। जबकि, बाकी महिलाओं के साथ भी यौन हिंसा होने की बात बताई गई है। इसके साथ ही, गांव में लोगों के घरों में घुस कर अर्धसैनिक बलों द्वारा मार-पीट, तोड़-फोड़ और लूट-पाट की गई थी। चर्च में अर्धसैनिक बलों ने घुसकर पेशाब किया और नुकसान पहुंचाया।

जांच टीम

बेतला टाइगर रिजर्व - फैक्ट फांडिंग टीम की जांच में पाए गए तथ्यः

जांच टीम विजयपुर गांव, रुध पंचायत, गारु ब्लाक, लातेहार जिला में जांच के लिए गई। वहां टीम 4 गांव के लोगों से मिली। विजयपुर, पांडरा, गुटवा और गोपकर।

21 फरवरी, 2018 को वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एक गेजेट निकाला गया जिसमें बेतला टाईगर रिजर्व का कोर एरिया बढ़ा कर इसमें 398 गांवों को शामिल किया गया है। वन प्रमण्डल पदाधिकारी ने इन गावों के इको डेवेलपमेंट कमिटी को 27 अप्रैल 2018 को एक नोटिस जारी किया कि वे इन गांवों के विस्थापन के लिए सहमति दे दें। इको डेवेलपमेंट कमिटी में वन विभाग के लोग भी होते हैं, जिसके कारण विजयपुर की ग्राम सभा में यह तय किया गया कि इको विकास समिति को सहमति देने का कोई हक नहीं है।

वन अधिकार कानून के अर्तगत ग्राम सभा को ही सहमति देने या नहीं देने का अधिकार है। कई गांवों ने विस्थापन के लिए सहमति देने से इंकार कर दिया है। 80 गांव वालों पर वन विभाग द्वारा वन उपज जमा करने के लिए फर्जी मामले डाले जा रहे है। वन अधिकार कानून के अंर्तगत ग्राम सभा को वन उपज के उपर मालिकाना हक है। मिटिंग में उपस्थित 4 गांव वालों पर विस्थापन के लिए सहमति देने के लिए प्रशासन द्वारा काफी दबाव बनाया गया है।

20 सामाजिक कार्यकताओं पर राजद्रोह - जांच में पाए गए तथ्यः

झारखण्ड के 20 सामाजिक कार्यकताओं के खिलाफ एफ आई आर दर्ज किया गया है जिसमें राजद्रोह, देश से जंग लडने, षडयंत्र करने जैसे संगीन आपराधिक धाराएं लगाई गई हैं। एफआईआर में यह धाराएं फेसबुक पोस्ट के आधार पर लगाई गई है। इसमें कई लोगों पर ये धाराएं केवल फेसबुक पोस्ट को पसंद करने के लिए डाली गई है। इस मामले में अभी तक अभियुक्तों के खिलाफ वारंट नहीं निकला है। यह भी जानना बहुत जरुरी है कि जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुआ है वह सभी पढ़े-लिखे तबके से आते हैं और गरीब आदिवासियों और हाशिये पर रह रहे समाज के सवालों पर काम करते रहे हैं। ये सभी सरकार और पुलिस की असंवैधानिक और दमनकारी नीतियों और प्रशासनिक कार्यवाईयों के उपर सवाल उठाते रहे है।

                         (विशद कुमार स्वतंत्र पत्रकार हैं और रांची में रहते हैं।)





 








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