कश्मीर फिर शोक की घाटी बनने की राह पर !

ज़रा सोचिए... , , रविवार , 16-04-2017


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जनचौक ब्यूरो

कश्मीर संकट एक नये दौर में पहुंच गया है। श्रीनगर लोकसभा उपचुनाव में मतदान की ऐतिहासिक गिरावट और फारुक अब्दुल्ला की जीत ने इसके संकेत दे दिए हैं। चुनाव में तब भी इससे ज्यादा वोट पड़े थे जब घाटी में आतंकियों का वर्चस्व हुआ करता था। ऐसे में पिछले तीन सालों में ऐसा क्या हो गया जिससे हालात सुधरने की जगह और खराब हो गए। यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है।

समारोह सरीखा माहौल

पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान घाटी में समारोह सरीखा माहौल था। कुछ विधानसभाओं में तो 60 से लेकर 75 फीसदी तक मतदान हुए। माना जा रहा था कि सरकार के गठन के साथ ही सूबा पटरी पर आ जाएगा। सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि घाटी में गिनती के आतंकी बचे थे और उनका या फिर हुर्रियत कांफ्रेंस समेत दूसरे अलगाववादी समूहों को जनता ने दरकिनार कर दिया है।

पीडीपी-बीजेपी गठबंधन बड़ा झटका

चुनाव के बाद पीडीपी का बीजेपी के साथ गठबंधन घाटी के लोगों के लिए किसी बड़े धक्के से कम नहीं था। इसके पहले पीडीपी को सूबे में रेडिकल्स के नजदीक माना जाता था। ऐसे में उसका एक कट्टर हिंदूवादी पार्टी जिसका मुस्लिम सवालों पर एक आलोचनात्मक रुख रहा हो और कश्मीर समस्या पर भी बिल्कुल अलग नजरिया हो उससे समझौता करना कोई सकारात्मक संकेत नहीं था।

ताकत के बल पर समाधान

बाद में जिस बात का डर था आखिर वही हुआ। बातचीत कर समस्या सुलझाने की जगह उसका जोर ताकत के जरिये समस्याओं को हल करने पर था। ये पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक का मामला हो या फिर कश्मीर के भीतर आतंकियों समेत लोगों के प्रदर्शन से निपटने दोनों में दिखा। पैलेट गन से प्रदर्शनकारियों का सामना करने के उसके तरीके ने पूरी घाटी को सरकार के खिलाफ खड़ा कर दिया।

पैलेट गन या आंख फोड़ने की मशीन

आतंकी बुरहान वानी को पकड़कर बंद करने की जगह उसे दिनदहाड़े एनकाउंटर में मारकर सरकार ने मानो आफत मोल ले ली हो। उसके बाद हालात बद से बदतर होते गए। एक तरफ प्रदर्शनों का सिलसिला बढ़ा तो उससे निपटने में पैलेट गनों का कहर भी बढ़ता गया। समय के साथ घाटी देश से दूर होती गई।

जुमले से बाहर नहीं निकली सरकार

इसी का नतीजा था कि नाराज होकर पीडीपी के सांसद तारिक हमीद कर्रा ने श्रीनगर लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया। मोदी ने टेर्ररिज्म और टूरिज्म की भले ही जुमलेबाजी की हो लेकिन सत्ता में रहने के अपने तीन साल के दौरान कश्मीरियों का दिल जीतने के लिए उन्होंने कोई पहल नहीं की।

सरकार की तरफ से न ही ऐसा कोई कार्यक्रम दिया गया जिसमें घाटी के लोग शरीक होते। कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए बातचीत तक की कोई पहल नहीं हो पायी। अगर कोई शुरुआत हुई भी तो उसमें सरकार की ओर से रोड़े ज्यादा अटकाए गए।

अलगाववादियों को तोहफा

आखिर में हालात इस कदर बदतर हो गए कि श्रीनगर लोकसभा उप चुनाव के दौरान किसी अलगाववादी संगठन को अलग से चुनाव बहिष्कार का आह्वान ही नहीं करना पड़ा। जनता खुद इसके लिए तैयार थी और उसने आगे बढ़कर इसको सफल बनाया। अनायास नहीं है कि एक उपचुनाव में 8 लोगों की मौत हो जाती है।

 सच बात तो ये है कि इतनी मौतों और मतदान के कम प्रतिशत के बाद चुनाव की पवित्रता ही खत्म हो जाती है। बावजूद इसके अगर सरकार उसे मान्यता देती है तो उसकी लोकतंत्र और जनता के प्रति कोई जवाबदेही न होने का ही दूसरा उदाहरण है।

महबूबा ने खोया विश्वास

अब हालात वहां पहुंच गए हैं जहां से वापस लौटना मुश्किल होगा। चुनाव में पीडीपी के खिलाफ एनसी नेता फारुक अब्दुल्ला की जीत बताती है कि चुनी हुई महबूबा सरकार ने जनता का विश्वास भी खोना शुरू कर दिया है।

ऐसे में अगर वो कुछ करना भी चाहे तो उसको उस स्तर पर सहयोग नहीं मिलेगा। शायद इसी का नतीजा है कि अब्दुल्ला ने जीतते ही केंद्र सरकार और राज्यपाल से सरकार की बर्खास्तगी की मांग शुरू कर दी है।

घाटी में वीडियो वार

इस बीच वीडियो के जरिये आई नई-नई घटनाओं ने घाटी में नई बहस शुरू कर दी है। किसी वीडियो में लोगों द्वारा सुरक्षाकर्मी के पीटने के दृश्य हैं तो कहीं सुरक्षा बलों द्वारा युवक को गाड़ी की बोनट पर बैठाकर परेड कराने का वायरल वीडियो है। इसके जरिये घाटी में अपनी तरह का वीडियो वार चल रहा है। लेकिन घाटी के लिहाज से युवक को बोनट पर घुमाये जाने की घटना चर्चे में है। इसको लेकर लोगों में गहरा रोष है।

सेनाध्यक्ष को चेताया

मामले की गंभीरता को देखते हुए और चुनाव में अपनी हालत से परेशान मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी घटना का तत्काल संज्ञान लिया। उन्होंने इस मसले पर न केवल पुलिस से रिपोर्ट मांगी बल्कि सीधे सेना अध्यक्ष बिपिन रावत से बातचीत की।

उनका कहना था कि पिछले सालों में सेना ने जितना कमाया था उतना इस घटना से गवां दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि इस तरह की घटना की आइंदा पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। मामले की जांच कर मुफ्ती ने दोषियो को दंडित करने की मांग भी की है। महबूबा का दबाव काम करने लगा है और बताया जा रहा है कि सेनाध्यक्ष बिपिन रावत और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकर अजीत डोवाल के बीच कश्मीर मसले पर बातचीत हुई है।

सुधार की राह पर था कश्मीर

दरअसल विधानसभा चुनाव और उसके बाद हालात सुधरते दिख रहे थे। मानो कश्मीर के सुधार की गाड़ी शांति की पटरी पर राजधानी एक्सप्रेस की स्पीड से चल रही थी। लेकिन पीडीपी-बीजेपी का गठबंधन उसमें अचानक लगाया गया ब्रेक साबित हुआ। इतना ही नहीं मामला आगे बढ़ने की बजाय गाड़ी को उल्टी दिशा में मोड़ दिया गया। जिसमें बातचीत कम बल का प्रयोग ज्यादा था।

90 के दशक की ओर कश्मीर

आखिर में कश्मीर एक बार फिर 90 के दशक की ओर जाता दिख रहा है। जहां पाकिस्तान, कट्टरपंथी तत्वों, अलगाववादियों और आतंकियों के लिए उर्वर जमीन मौजूद है। अगर 3 सालों की नरेंद्र मोदी सरकार की यही उपलब्धि है तो इस पर जरूर उसे फिर से विचार करना चाहिए।       










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