लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की राजनीतिक पारी समाप्त

मुद्दा , , शनिवार , 06-04-2019


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अनिल जैन

आखिरकार लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की संसदीय राजनीति की पारी पर मोदी और शाह की पार्टी ने पूर्ण विराम लगा ही दिया। चुनाव में उम्मीदवारी हासिल करने की हर कोशिश नाकाम हो जाने के बाद इंदौर की सांसद सुमित्रा महाजन ने आज आखिरकार हार मान ली। पार्टी नेतृत्व की सलाह पर उन्होंने अपनी विदाई का सम्मानजनक रास्ता निकालने के लिए खुद ही चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया। हालांकि पार्टी नेतृत्व उन्हें बहुत पहले ही उन्हें यह संकेत साफ तौर पर दे चुका था कि इस बार पार्टी उन्हें लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाएगी। लेकिन महाजन उन संकेतों को नजरअंदाज करते हुए टिकट हासिल करने की कोशिशों में जुटी हुई थीं। अपनी तमाम कोशिशें नाकाम हो जाने के बाद महाजन ने शहीदाना अंदाज में यह ऐलान किया कि पार्टी नेतृत्व उन्हें टिकट देने में संकोच कर रहा है लिहाजा उन्होंने खुद ही तय किया है कि अब वे चुनाव नहीं लडेंगीं। उन्होंने यह ऐलान मीडिया के लिए जारी एक बयान में किया।

हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से मिले तमाम संकेतों के आधार पर पार्टी में आमतौर पर माना जा रहा है कि उम्र के लिहाज से पार्टी के मार्गदर्शक नेताओं की श्रेणी में शुमार हो चुकीं 76 वर्षीय सुमित्रा महाजन की राजनीतिक पारी अब समाप्त हो गई है। लेकिन खुद सुमित्रा महाजन और उनके गिने-चुने करीबी कार्यकर्ता ऐसा मानने को तैयार नहीं थे। उनका मानना था कि इंदौर में पार्टी के पास सुमित्रा महाजन का कोई विकल्प फिलहाल नहीं है। यही वजह है कि महाजन ने जहां एक ओर अपने कार्यकर्ताओं और समर्थक वर्गों के नेताओं से मिलने-जुलने का सिलसिला जारी रखा हुआ था, वहीं दूसरी ओर वे टिकट हासिल करने की कोशिशों में भी जुटी हुई थीं। 

सुमित्रा महाजन ने इंदौर क्षेत्र का लगातार आठ मर्तबा लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया। हर चुनाव में सुमित्रा महाजन की दावेदारी पार्टी में चुनौतीविहीन रही और उन्हें आसानी से टिकट मिलता रहा। लेकिन इस बार उन्हें टिकट के लिए जबदरदस्त संघर्ष करना पड़ रहा और जिसमें वे अंतत: नाकाम रहीं। क्योंकि पार्टी ने 75 वर्ष से अधिक की उम्र वाले नेताओं को टिकट न देने के फैसले पर सख्ती से अमल किया है। 

सुमित्रा महाजन भी अपने जीवन के 77 वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी हैं। इसके बावजूद वे अपनी दावेदारी से पीछे हटने का तैयार नहीं थीं। उन्होंने पिछले एक महीने से पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थक वर्गों के नेताओं से मिलने-जुलने का सिलसिला जारी रखा हुआ है। हालांकि इसी दौरान पिछले रविवार को वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंदौर सहित देश के विभिन्न शहरों में हुए 'मैं भी चौकीदार’ कार्यक्रम में उन्होंने शिरकत नहीं की थी।

इस बारे में उनके करीब समर्थकों की ओर से मासूम दलील दी गई कि सुमित्रा महाजन चूंकि इस समय भी लोकसभा अध्यक्ष हैं, लिहाजा उन्होंने औपचारिक तौर पर पार्टी के कार्यक्रम में शामिल होना उचित नहीं समझा। इस बारे में इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और स्टेट प्रेस क्लब के अध्यक्ष प्रवीण खारीवाल का कहना है कि लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए सुमित्रा महाजन ने पिछले पांच वर्षों के दौरान कभी भी खुद को पार्टी की राजनीतिक गतिविधियों से दूर नहीं रखा और अब जबकि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और वे खुद पार्टी के टिकट के लिए दावेदारी जता रही हैं, उनकी ओर से दी जा रही दलील पर कौन भरोसा करेगा? खारीवाल का मानना है कि महाजन ने इस कार्यक्रम से दूरी बनाकर एक तरह से अपनी खिन्नता जाहिर की थी, जिसका कोई असर पार्टी नेतृत्व पर नहीं हुआ।

महाजन के समर्थकों को भी पूरा यकीन था कि इंदौर से महाजन ही पार्टी की उम्मीदवार होंगी। महाजन के संसदीय प्रतिनिधि अशोक डागा ने पिछले दिनों तो बाकायदा सोशल मीडिया में लिखा भी था कि इंदौर से सुमित्रा महाजन ही चुनाव लड़ेंगी, कुछ लोग नाहक ही अफवाह फैलाकर भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल उनके समर्थकों का मानना था कि लोकसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए भी सुमित्रा महाजन ने पांच साल तक एक निष्ठावान कार्यकर्ता के रूप में जिस तरह पार्टी की सेवा की है और सदन में भी कई मौकों पर विपक्ष की आलोचना सहते हुए भी सरकार की मदद की है, उसके मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह उनकी दावेदारी को नजरअंदाज नहीं करेंगे। बताया जाता है कि खुद सुमित्रा महाजन भी पार्टी नेतृत्व के समक्ष अपनी सेवाओं की दुहाई दे चुकी थीं। उन्होंने अपनी आखिरी कोशिश के तहत 'चितपावन कार्ड' का भी इस्तेमाल किया।

चितपावन ब्राह्मण समुदाय से आने वाली महाजन ने अपने टिकट के सिलसिले मे अपने सजातीय पूर्व राज्यपाल जस्टिस वीएस कोकजे और संघ नेतृत्व के विश्वस्त माने जाने वाले विनय सहस्त्रबुद्धे को मोर्चे पर तैनात किया। कोकजे इस समय विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष हैं और सहस्त्रबुद्धे राज्यसभा सदस्य होने के साथ ही पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की हैसियत से मध्य प्रदेश के प्रभारी हैं। दोनों ने पिछले एक सप्ताह के दौरान संघ के वरिष्ठ नेताओं के साथ ही भाजपा के संगठन महासचिव रामलाल और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से मुलाकात कर सुमित्रा महाजन को ही इंदौर से उम्मीदवार बनाने की पैरवी की थी। लेकिन मोदी-शाह के सामने किसी की नहीं चली और आखिरकार सुमित्रा महाजन की संसदीय राजनीति पर पूर्ण विराम लग गया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)








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